पटना।संतान की चाह में वर्षों तक इलाज, अनगिनत जांच, दवाइयों के लंबे कोर्स और भारी खर्च उठाने के बाद भी जब किसी दंपति की गोद सूनी रह जाती है, तो टूटता सिर्फ एक सपना नहीं, बल्कि पूरा जीवन जैसे ठहर सा जाता है। समाज का दबाव, परिवार की अपेक्षाएं और भीतर ही भीतर घुटती उम्मीद — यह सब मिलकर निसंतान दंपतियों के जीवन को एक अंतहीन पीड़ा में बदल देता है। बिहार में ऐसे हजारों दंपति हैं, जो संतान की आस में दर-दर भटकते रहे और अंत में निराशा को ही अपनी नियति मान बैठे।लेकिन कंकड़बाग स्थित वूमेन’स हॉस्पिटल और फर्टिलिटी रिसर्च सेंटर आज ऐसे ही टूटते विश्वास और बिखरते सपनों के लिए एक मजबूत सहारा बनकर खड़ा है। यहां के अनुभवी गायनी–एंडोस्कोपी विशेषज्ञ डॉ. संजीव कुमार और डॉ. कुमारी अनुराग ने अपने कौशल, संवेदनशीलता और ईमानदार चिकित्सा पद्धति से हजारों दंपतियों के जीवन में मातृत्व और पितृत्व की खुशियां लौटा दी हैं।
इस संस्थान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां बांझपन के इलाज को सीधे महंगे और जटिल आईवीएफ की राह पर नहीं धकेला जाता। बल्कि सबसे पहले यह समझने की कोशिश की जाती है कि असल समस्या की जड़ कहां है। इसके लिए यहां आधुनिक गायनी–एंडोस्कोपी तकनीक (Fertility Enhancing Surgery) का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे उन कारणों की पहचान हो पाती है, जो सामान्य जांच में सामने नहीं आ पाते।
ट्यूबल ब्लॉकेज, फाइब्रॉइड, ओवरी सिस्ट, एंडोमेट्रियोसिस और पेल्विक इंफ्लेमेशन जैसी कई गंभीर समस्याएं वर्षों तक गर्भधारण में बाधा बनी रहती हैं। यहां इनका इलाज एंडोस्कोपी के माध्यम से बिना बड़े चीरे, सुरक्षित और अत्यंत सटीक तरीके से किया जाता है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि बड़ी संख्या में दंपति आईवीएफ कराए बिना ही प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करने में सफल हो रहे हैं।
डॉ. संजीव कुमार और डॉ. कुमारी अनुराग की कार्यशैली ही इस संस्थान को बाकी भीड़ से अलग बनाती है। यहां मरीज को सिर्फ एक केस फाइल नहीं, बल्कि एक इंसान, एक सपना और एक परिवार की उम्मीद माना जाता है। इलाज तय करते समय मरीज की पीड़ा, उसकी मानसिक स्थिति और उसकी आर्थिक क्षमता — तीनों को बराबर महत्व दिया जाता है।
आज के दौर में जहां कई निजी केंद्र हर मरीज को जल्दबाजी में आईवीएफ की ओर धकेल देते हैं, वहीं इस केंद्र में पहले नैचुरल कन्सेप्शन की हर संभावना को पूरी ईमानदारी से आजमाया जाता है। कम खर्च, पारदर्शी इलाज, बेहतर सफलता दर और मरीजों से आत्मीय व्यवहार — यही इस संस्थान की असली पहचान बन चुकी है।
बिहार जैसे राज्य में, जहां आज भी बांझपन का इलाज आम लोगों की पहुंच से बाहर माना जाता है, यह संस्थान गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यहां इलाज कराने पहुंचे कई दंपति बताते हैं कि डॉक्टरों ने उन्हें सिर्फ दवा या ऑपरेशन ही नहीं दिया, बल्कि उस टूट चुकी उम्मीद को भी नया सहारा दिया, जिसे वे सालों पहले खो चुके थे।
यही वजह है कि आज इस केंद्र से इलाज कराकर हजारों घरों में किलकारियां गूंज रही हैं, और यह सिलसिला लगातार आगे बढ़ता जा रहा है।
कंकड़बाग, पटना का वूमेन’स हॉस्पिटल और इनफर्टिलिटी रिसर्च सेंटर अब सिर्फ एक अस्पताल नहीं, बल्कि उन दंपतियों के लिए नई जिंदगी की शुरुआत का नाम बन चुका है, जो संतान की आस में आखिरी बार किसी चमत्कार की उम्मीद लेकर यहां तक पहुंचते हैं। यह संस्थान साबित कर रहा है कि अगर चिकित्सा ईमानदार हो, नीयत साफ हो और तकनीक सही हाथों में हो, तो मातृत्व की राह में खड़ी सबसे बड़ी दीवार भी गिराई जा सकती है।
यह भी उल्लेखनीय है कि यह संस्थान नॉर्थ ईस्ट इंडिया का पहला रियल हैंड्स-ऑन ट्रेनिंग सेंटर है, जहां पिछले कई वर्षों से बिहार, झारखंड, नेपाल और आसपास के राज्यों के डॉक्टरों को एंडोस्कोपी की व्यावहारिक ट्रेनिंग दी जा रही है। इसका उद्देश्य है कि यह आधुनिक और प्रभावी इलाज ज्यादा से ज्यादा मरीजों तक, कम खर्च और सरल तरीके से पहुंच सके।

