Saturday, March 14, 2026

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डॉ. संजय मयूख : पद से ऊपर व्यक्तित्व, संगठन से गहरा सरोकार

राजनीति में कई चेहरे पद के कारण पहचाने जाते हैं, लेकिन कुछ व्यक्तित्व अपने व्यवहार, आत्मीयता और संगठन के प्रति निष्ठा के कारण याद किए जाते हैं। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और बिहार से दूसरे कार्यकाल के विधान परिषद सदस्य डॉ. संजय मयूख उन विरले नेताओं में हैं, जिनके लिए सत्ता साध्य नहीं, बल्कि संगठन साधना है।भाजपा की राजनीति में उनका कद लगातार बढ़ा है, पर उनके स्वभाव में विनम्रता की वही सहजता आज भी दिखाई देती है। यही कारण है कि वे सिर्फ एक पदाधिकारी नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के लिए भरोसे का नाम माने जाते हैं।एक पुराना प्रसंग याद आता है। जब अरुण कुमार सिन्हा का टिकट कुम्हरार से कटने की चर्चा जोरों पर थी, तब स्वाभाविक रूप से नए नामों पर अटकलें लगनी शुरू हुईं। उन्हीं दिनों मैंने डॉ. मयूख को फोन कर सीधे पूछा—“क्या आप चुनाव लड़ेंगे?” उनका उत्तर बेहद संक्षिप्त और स्पष्ट था—“नहीं।”मीडिया में नाम चल रहा था, संभावनाएं बन रही थीं, लेकिन उन्होंने पद की इच्छा से अधिक संगठन की आवश्यकता को प्राथमिकता दी।आज फिर राजनीतिक हलकों में हलचल है। चर्चा है कि नितिन नवीन का राज्यसभा जाना लगभग तय है, जिससे बांकीपुर विधानसभा सीट रिक्त हो सकती है। संभावित नामों की सूची में एक बार फिर डॉ. संजय मयूख का नाम प्रमुखता से उभर रहा है। हालांकि वे फिलहाल विधान परिषद के सदस्य हैं, फिर भी कयासों का दौर जारी है। मगर संकेत यही हैं कि वे अब भी संगठनात्मक जिम्मेदारियों को ही प्राथमिकता देना चाहते हैं।डॉ. मयूख की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने कभी पद को अपने व्यवहार पर हावी नहीं होने दिया। दिल्ली में हों या पटना में, कार्यकर्ताओं और परिचितों के लिए उनका दरवाजा हमेशा खुला रहता है। व्यस्तता के बीच भी कॉल बैक करना, औपचारिकता से आगे बढ़कर समाधान तक पहुंचना—यह उनका स्वभाव बन चुका है।राजनीति में जहां व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा अक्सर केंद्रीय स्थान ले लेती है, वहां डॉ. मयूख जैसे नेता यह स्मरण कराते हैं कि संगठन की जड़ों को सींचना ही दीर्घकालिक राजनीति की आधारशिला है। उनके चेहरे की मुस्कान, संवाद की आत्मीयता और कार्यकर्ताओं के प्रति स्नेह उन्हें भीड़ से अलग पहचान देता है।वर्ष 2000 की एक और स्मृति उल्लेखनीय है। भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बने नितिन नवीन के पिता स्वर्गीय नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा से पहली मुलाकात भी संजय मयूख जी ने ही करवाई थी। वही दौर था जब ‘आज’ अखबार में हमारी एंट्री हुई थी और कार्यक्षेत्र गर्दनीबाग–जक्कनपुर (तत्कालीन पटना पश्चिम विधानसभा) हुआ करता था।डॉ. संजय मयूख की बार-बार चर्चा इसलिए होती है क्योंकि वे यह संदेश देते हैं कि राजनीति में आने वालों को संघर्ष से घबराना नहीं चाहिए। पद अपने समय पर मिलता है, पर व्यक्तित्व और भरोसा निरंतर साधना से बनता है।

– अनूप

International

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डॉ. संजय मयूख : पद से ऊपर व्यक्तित्व, संगठन से गहरा सरोकार

राजनीति में कई चेहरे पद के कारण पहचाने जाते हैं, लेकिन कुछ व्यक्तित्व अपने व्यवहार, आत्मीयता और संगठन के प्रति निष्ठा के कारण याद किए जाते हैं। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और बिहार से दूसरे कार्यकाल के विधान परिषद सदस्य डॉ. संजय मयूख उन विरले नेताओं में हैं, जिनके लिए सत्ता साध्य नहीं, बल्कि संगठन साधना है।भाजपा की राजनीति में उनका कद लगातार बढ़ा है, पर उनके स्वभाव में विनम्रता की वही सहजता आज भी दिखाई देती है। यही कारण है कि वे सिर्फ एक पदाधिकारी नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के लिए भरोसे का नाम माने जाते हैं।एक पुराना प्रसंग याद आता है। जब अरुण कुमार सिन्हा का टिकट कुम्हरार से कटने की चर्चा जोरों पर थी, तब स्वाभाविक रूप से नए नामों पर अटकलें लगनी शुरू हुईं। उन्हीं दिनों मैंने डॉ. मयूख को फोन कर सीधे पूछा—“क्या आप चुनाव लड़ेंगे?” उनका उत्तर बेहद संक्षिप्त और स्पष्ट था—“नहीं।”मीडिया में नाम चल रहा था, संभावनाएं बन रही थीं, लेकिन उन्होंने पद की इच्छा से अधिक संगठन की आवश्यकता को प्राथमिकता दी।आज फिर राजनीतिक हलकों में हलचल है। चर्चा है कि नितिन नवीन का राज्यसभा जाना लगभग तय है, जिससे बांकीपुर विधानसभा सीट रिक्त हो सकती है। संभावित नामों की सूची में एक बार फिर डॉ. संजय मयूख का नाम प्रमुखता से उभर रहा है। हालांकि वे फिलहाल विधान परिषद के सदस्य हैं, फिर भी कयासों का दौर जारी है। मगर संकेत यही हैं कि वे अब भी संगठनात्मक जिम्मेदारियों को ही प्राथमिकता देना चाहते हैं।डॉ. मयूख की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने कभी पद को अपने व्यवहार पर हावी नहीं होने दिया। दिल्ली में हों या पटना में, कार्यकर्ताओं और परिचितों के लिए उनका दरवाजा हमेशा खुला रहता है। व्यस्तता के बीच भी कॉल बैक करना, औपचारिकता से आगे बढ़कर समाधान तक पहुंचना—यह उनका स्वभाव बन चुका है।राजनीति में जहां व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा अक्सर केंद्रीय स्थान ले लेती है, वहां डॉ. मयूख जैसे नेता यह स्मरण कराते हैं कि संगठन की जड़ों को सींचना ही दीर्घकालिक राजनीति की आधारशिला है। उनके चेहरे की मुस्कान, संवाद की आत्मीयता और कार्यकर्ताओं के प्रति स्नेह उन्हें भीड़ से अलग पहचान देता है।वर्ष 2000 की एक और स्मृति उल्लेखनीय है। भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बने नितिन नवीन के पिता स्वर्गीय नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा से पहली मुलाकात भी संजय मयूख जी ने ही करवाई थी। वही दौर था जब ‘आज’ अखबार में हमारी एंट्री हुई थी और कार्यक्षेत्र गर्दनीबाग–जक्कनपुर (तत्कालीन पटना पश्चिम विधानसभा) हुआ करता था।डॉ. संजय मयूख की बार-बार चर्चा इसलिए होती है क्योंकि वे यह संदेश देते हैं कि राजनीति में आने वालों को संघर्ष से घबराना नहीं चाहिए। पद अपने समय पर मिलता है, पर व्यक्तित्व और भरोसा निरंतर साधना से बनता है।

– अनूप

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