Monday, January 26, 2026

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आसान नहीं आरसीपी की जेडीयू में वापसी

बिहार की राजनीति में एक बार फिर जदयू के अंदरूनी समीकरण चर्चा के केंद्र में हैं। केंद्रीय मंत्री और जदयू के कद्दावर नेता ललन सिंह ने यह साफ कर दिया है कि आरसीपी सिंह की पार्टी में वापसी किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं होगी। यह महज एक बयान नहीं, बल्कि जदयू के भीतर चल रही खींचतान और सत्ता-संतुलन की एक स्पष्ट झलक है।
सूत्रों के मुताबिक, इस मुद्दे की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री खुद एक दिन पहले पटना में ललन सिंह के आवास पर उन्हें मनाने पहुंचे। राजनीतिक गलियारों में यह मुलाकात सामान्य शिष्टाचार से कहीं ज्यादा मानी जा रही है। सवाल सिर्फ किसी एक नेता की वापसी का नहीं है, बल्कि पार्टी की भावी दिशा, अंदरूनी नेतृत्व संतुलन और विश्वास के संकट का है।आरसीपी सिंह कभी नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद और ताकतवर नौकरशाह से नेता बने चेहरों में गिने जाते थे। लेकिन सत्ता और संगठन के समीकरण बदले, और वही आरसीपी सिंह धीरे-धीरे जदयू की मुख्यधारा से बाहर कर दिए गए। अब उनकी संभावित वापसी की अटकलों ने पार्टी के भीतर पुरानी दरारों को फिर से उजागर कर दिया है।ललन सिंह की जिद दरअसल सिर्फ व्यक्तिगत विरोध नहीं, बल्कि संगठन की वर्तमान संरचना और भविष्य की राजनीति को लेकर एक स्पष्ट संदेश है। वह यह जताना चाहते हैं कि जदयू अब पुराने अध्याय को दोबारा खोलने के मूड में नहीं है। उनके सख्त रुख से यह भी संकेत मिलता है कि पार्टी नेतृत्व के भीतर अब समझौते की गुंजाइश सीमित होती जा रही है।मुख्यमंत्री का खुद जाकर समझाने की कोशिश करना इस बात का प्रमाण है कि मामला हल्का नहीं है। यह जदयू के लिए प्रतिष्ठा और संतुलन दोनों का सवाल बन चुका है। अगर ललन सिंह अपनी जिद पर अड़े रहते हैं, तो यह साफ हो जाएगा कि पार्टी के भीतर शक्ति-केंद्रों की अपनी सीमाएं तय हो चुकी हैं और हर फैसला सिर्फ एक धुरी पर नहीं घूमता।कुल मिलाकर, आरसीपी सिंह की वापसी का सवाल अब एक व्यक्ति की राजनीति से ज्यादा जदयू की आंतरिक एकजुटता, नेतृत्व के आपसी भरोसे और भविष्य की रणनीति से जुड़ गया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह टकराव किस मोड़ पर जाकर थमता है—समझौते पर या किसी नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत पर।

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आसान नहीं आरसीपी की जेडीयू में वापसी

बिहार की राजनीति में एक बार फिर जदयू के अंदरूनी समीकरण चर्चा के केंद्र में हैं। केंद्रीय मंत्री और जदयू के कद्दावर नेता ललन सिंह ने यह साफ कर दिया है कि आरसीपी सिंह की पार्टी में वापसी किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं होगी। यह महज एक बयान नहीं, बल्कि जदयू के भीतर चल रही खींचतान और सत्ता-संतुलन की एक स्पष्ट झलक है।
सूत्रों के मुताबिक, इस मुद्दे की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री खुद एक दिन पहले पटना में ललन सिंह के आवास पर उन्हें मनाने पहुंचे। राजनीतिक गलियारों में यह मुलाकात सामान्य शिष्टाचार से कहीं ज्यादा मानी जा रही है। सवाल सिर्फ किसी एक नेता की वापसी का नहीं है, बल्कि पार्टी की भावी दिशा, अंदरूनी नेतृत्व संतुलन और विश्वास के संकट का है।आरसीपी सिंह कभी नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद और ताकतवर नौकरशाह से नेता बने चेहरों में गिने जाते थे। लेकिन सत्ता और संगठन के समीकरण बदले, और वही आरसीपी सिंह धीरे-धीरे जदयू की मुख्यधारा से बाहर कर दिए गए। अब उनकी संभावित वापसी की अटकलों ने पार्टी के भीतर पुरानी दरारों को फिर से उजागर कर दिया है।ललन सिंह की जिद दरअसल सिर्फ व्यक्तिगत विरोध नहीं, बल्कि संगठन की वर्तमान संरचना और भविष्य की राजनीति को लेकर एक स्पष्ट संदेश है। वह यह जताना चाहते हैं कि जदयू अब पुराने अध्याय को दोबारा खोलने के मूड में नहीं है। उनके सख्त रुख से यह भी संकेत मिलता है कि पार्टी नेतृत्व के भीतर अब समझौते की गुंजाइश सीमित होती जा रही है।मुख्यमंत्री का खुद जाकर समझाने की कोशिश करना इस बात का प्रमाण है कि मामला हल्का नहीं है। यह जदयू के लिए प्रतिष्ठा और संतुलन दोनों का सवाल बन चुका है। अगर ललन सिंह अपनी जिद पर अड़े रहते हैं, तो यह साफ हो जाएगा कि पार्टी के भीतर शक्ति-केंद्रों की अपनी सीमाएं तय हो चुकी हैं और हर फैसला सिर्फ एक धुरी पर नहीं घूमता।कुल मिलाकर, आरसीपी सिंह की वापसी का सवाल अब एक व्यक्ति की राजनीति से ज्यादा जदयू की आंतरिक एकजुटता, नेतृत्व के आपसी भरोसे और भविष्य की रणनीति से जुड़ गया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह टकराव किस मोड़ पर जाकर थमता है—समझौते पर या किसी नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत पर।

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