Saturday, March 14, 2026

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इस कुलपति ने नंबर वन बना दिया मगध विश्वविद्यालय को

पटना ।लंबे समय तक अव्यवस्था, विलंब और अविश्वास के दौर से गुजरती रही है। ऐसे समय में यदि कोई कुलपति न सिर्फ़ अपने विश्वविद्यालय को पटरी पर लाए, बल्कि पूरे राज्य और देश के शिक्षा जगत में एक उदाहरण के रूप में उभरे, तो उस पर गंभीरता से बात की जानी चाहिए। मगध विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. शशि प्रताप शाही आज उसी श्रेणी में खड़े नज़र आते हैं।डॉ. शाही का कार्यकाल यह साबित करता है कि विश्वविद्यालयों की बदहाली कोई स्थायी नियति नहीं, बल्कि नेतृत्व की कमी का परिणाम रही है। समय पर परीक्षाएं, पारदर्शी मूल्यांकन, छात्रों की समस्याओं का त्वरित समाधान और शैक्षणिक वातावरण की पुनर्स्थापना—ये सभी वे बुनियादी काम हैं, जिन्हें वर्षों से “असंभव” मान लिया गया था। डॉ. शशि प्रताप शाही ने इन्हें संभव कर दिखाया।लेकिन जो बात उन्हें अन्य कुलपतियों से अलग करती है, वह केवल प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि उनका मानवीय और संवादात्मक दृष्टिकोण है। सादगीपूर्ण जीवन, सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता और आम आदमी से सीधा जुड़ाव—ये गुण आज के अकादमिक नेतृत्व में दुर्लभ होते जा रहे हैं। छात्रों से सीधा संवाद कर उनकी समस्याएं सुनना और समाधान की दिशा में ठोस पहल करना, उन्हें एक “दफ़्तर तक सीमित कुलपति” बनने से रोकता है।डॉ. शाही यह समझते हैं कि विश्वविद्यालय केवल इमारतों और फाइलों से नहीं चलता, बल्कि विश्वास, संवाद और संवेदनशीलता से चलता है। यही कारण है कि मगध विश्वविद्यालय में आज भय का नहीं, भरोसे का माहौल दिखता है। छात्र, शिक्षक और कर्मचारी—तीनों यह महसूस करते हैं कि उनकी बात सुनी जा रही है।आज जब देश की उच्च शिक्षा प्रणाली गुणवत्ता, जवाबदेही और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की चुनौती से जूझ रही है, तब डॉ. शशि प्रताप शाही का मॉडल यह संकेत देता है कि सुधार ऊपर से आदेश देकर नहीं, बल्कि भीतर से व्यवस्था को समझकर किया जाता है। मगध विश्वविद्यालय में हुआ परिवर्तन बिहार के अन्य विश्वविद्यालयों के लिए ही नहीं, बल्कि देश भर के शैक्षणिक संस्थानों के लिए अनुकरणीय उदाहरण बन चुका है।यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि डॉ. शशि प्रताप शाही अब केवल एक विश्वविद्यालय के कुलपति नहीं रहे, बल्कि भारतीय शिक्षा जगत में एक भरोसेमंद चेहरे के रूप में स्थापित हो चुके हैं—एक ऐसा चेहरा, जो भीड़ में खोता नहीं, बल्कि दिशा दिखाता है।— #अनूप नारायण सिंह

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इस कुलपति ने नंबर वन बना दिया मगध विश्वविद्यालय को

पटना ।लंबे समय तक अव्यवस्था, विलंब और अविश्वास के दौर से गुजरती रही है। ऐसे समय में यदि कोई कुलपति न सिर्फ़ अपने विश्वविद्यालय को पटरी पर लाए, बल्कि पूरे राज्य और देश के शिक्षा जगत में एक उदाहरण के रूप में उभरे, तो उस पर गंभीरता से बात की जानी चाहिए। मगध विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. शशि प्रताप शाही आज उसी श्रेणी में खड़े नज़र आते हैं।डॉ. शाही का कार्यकाल यह साबित करता है कि विश्वविद्यालयों की बदहाली कोई स्थायी नियति नहीं, बल्कि नेतृत्व की कमी का परिणाम रही है। समय पर परीक्षाएं, पारदर्शी मूल्यांकन, छात्रों की समस्याओं का त्वरित समाधान और शैक्षणिक वातावरण की पुनर्स्थापना—ये सभी वे बुनियादी काम हैं, जिन्हें वर्षों से “असंभव” मान लिया गया था। डॉ. शशि प्रताप शाही ने इन्हें संभव कर दिखाया।लेकिन जो बात उन्हें अन्य कुलपतियों से अलग करती है, वह केवल प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि उनका मानवीय और संवादात्मक दृष्टिकोण है। सादगीपूर्ण जीवन, सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता और आम आदमी से सीधा जुड़ाव—ये गुण आज के अकादमिक नेतृत्व में दुर्लभ होते जा रहे हैं। छात्रों से सीधा संवाद कर उनकी समस्याएं सुनना और समाधान की दिशा में ठोस पहल करना, उन्हें एक “दफ़्तर तक सीमित कुलपति” बनने से रोकता है।डॉ. शाही यह समझते हैं कि विश्वविद्यालय केवल इमारतों और फाइलों से नहीं चलता, बल्कि विश्वास, संवाद और संवेदनशीलता से चलता है। यही कारण है कि मगध विश्वविद्यालय में आज भय का नहीं, भरोसे का माहौल दिखता है। छात्र, शिक्षक और कर्मचारी—तीनों यह महसूस करते हैं कि उनकी बात सुनी जा रही है।आज जब देश की उच्च शिक्षा प्रणाली गुणवत्ता, जवाबदेही और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की चुनौती से जूझ रही है, तब डॉ. शशि प्रताप शाही का मॉडल यह संकेत देता है कि सुधार ऊपर से आदेश देकर नहीं, बल्कि भीतर से व्यवस्था को समझकर किया जाता है। मगध विश्वविद्यालय में हुआ परिवर्तन बिहार के अन्य विश्वविद्यालयों के लिए ही नहीं, बल्कि देश भर के शैक्षणिक संस्थानों के लिए अनुकरणीय उदाहरण बन चुका है।यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि डॉ. शशि प्रताप शाही अब केवल एक विश्वविद्यालय के कुलपति नहीं रहे, बल्कि भारतीय शिक्षा जगत में एक भरोसेमंद चेहरे के रूप में स्थापित हो चुके हैं—एक ऐसा चेहरा, जो भीड़ में खोता नहीं, बल्कि दिशा दिखाता है।— #अनूप नारायण सिंह

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