पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद राज्य की राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। 293 सीटों में से इस बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 206 सीटों पर बड़ी जीत दर्ज की है, जबकि तृणमूल कांग्रेस को 80 सीटें मिली हैं। इसके अलावा उन्नयन पार्टी, कांग्रेस और वामपंथी-सेक्युलर गठबंधन को सीमित सफलता मिली है। भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी की हार ने राज्य की राजनीति में बड़ा संदेश दिया है।
सरकार बनाने के लिए 148 सीटों का बहुमत जरूरी होता है, जिसे भाजपा ने आसानी से पार कर लिया है। इस परिणाम ने राज्य की जातीय, सामाजिक और लैंगिक प्रतिनिधित्व की तस्वीर भी बदल दी है।
भाजपा की ऐतिहासिक बढ़त
भाजपा ने दोनों चरणों में मजबूत प्रदर्शन किया। पहले चरण में 152 में से 117 सीटें और दूसरे चरण में 141 में से 91 सीटें जीतकर पार्टी ने निर्णायक बढ़त हासिल की। उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना और मुर्शिदाबाद को छोड़कर लगभग सभी जिलों में भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस से बेहतर प्रदर्शन किया।
सामाजिक प्रतिनिधित्व में बदलाव
इस बार विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या 42 से घटकर 36 रह गई है। तृणमूल कांग्रेस से 32 मुस्लिम विधायक, कांग्रेस से 2 और अन्य दलों से 2 विधायक चुने गए हैं।
महिलाओं की भागीदारी में कमी
महिला विधायकों की संख्या भी पिछली बार के 46 से घटकर 34 रह गई है।
तृणमूल कांग्रेस से 14 और भाजपा से 20 महिला विधायक विधानसभा पहुंची हैं।
जातीय प्रतिनिधित्व में बदलाव
- कायस्थ विधायकों की संख्या में वृद्धि दर्ज हुई है
- ब्राह्मण विधायकों की संख्या में गिरावट आई है
- दलित विधायक लगभग 70 और आदिवासी विधायक 16 के आसपास हैं
- दलितों के लिए 68 सीटें आरक्षित हैं
सबसे अमीर विधायक और विवादित चेहरे
- भाजपा के दिलीप साहा (नबाग्राम) सबसे अमीर विधायक बने, संपत्ति लगभग 43 करोड़ रुपये
- तृणमूल कांग्रेस के अहमद जावेद खान की संपत्ति लगभग 39 करोड़ रुपये, लेकिन भारी कर्ज भी दर्ज
- दिनहाटा से भाजपा विधायक अजय राय पर सबसे ज्यादा 20 मामले दर्ज हैं
उम्र और अनुभव का रिकॉर्ड
- 82 वर्षीय सोभनदेव चट्टोपाध्याय राज्य के सबसे बुजुर्ग विधायक बने
- उन्होंने बालीगंज सीट से तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की
बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 ने राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया है। भाजपा की प्रचंड जीत ने सत्ता संतुलन बदल दिया है, वहीं सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसे महिला, मुस्लिम और जातीय समीकरणों में भी स्पष्ट बदलाव देखने को मिला है। यह चुनाव परिणाम आने वाले वर्षों में बंगाल की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।

