बिहार की राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते हैं, जो सिर्फ चुनावी जीत तक सीमित नहीं रहते, बल्कि जनता के भरोसे की पहचान बन जाते हैं। मिथिलेश कुमार तिवारी भी उन्हीं नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने जमीन से जुड़कर अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई है। गोपालगंज के बैकुंठपुर क्षेत्र से निकलकर बिहार सरकार में शिक्षा मंत्री बनने तक का उनका सफर संघर्ष, मेहनत और संगठन के प्रति समर्पण की कहानी माना जाता है।
गोपालगंज के गांव से शुरू हुआ सफर
मिथिलेश तिवारी का जन्म साल 1971 में गोपालगंज जिले के बैकुंठपुर प्रखंड के डुमरिया गांव में हुआ था। उनका बचपन सामान्य पारिवारिक परिस्थितियों में बीता। परिवार आर्थिक रूप से बेहद मजबूत नहीं था, लेकिन शिक्षा और संस्कार को हमेशा प्राथमिकता दी गई। उनके पिता देव नारायण तिवारी सरकारी सेवा में थे और बच्चों की पढ़ाई को लेकर काफी सजग रहते थे।
संघर्षों के बीच पूरी की पढ़ाई
मिथिलेश तिवारी ने जीवन की शुरुआती चुनौतियों को बहुत करीब से देखा। पढ़ाई के दौरान उन्होंने ट्यूशन पढ़ाकर अपनी शिक्षा पूरी की। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने मेहनत को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया। यही संघर्ष आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन की मजबूत नींव बना।
छात्र राजनीति से मिली पहचान
पटना में पढ़ाई के दौरान मिथिलेश तिवारी छात्र राजनीति से जुड़े। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा ने उनके राजनीतिक जीवन को नई दिशा दी। उनकी भाषण शैली, संगठन क्षमता और कार्यकर्ताओं के साथ मजबूत जुड़ाव ने उन्हें जल्द ही भाजपा के सक्रिय नेताओं की कतार में खड़ा कर दिया।
संगठन में लगातार बढ़ता गया कद
युवा मोर्चा से लेकर पार्टी संगठन के कई अहम पदों पर उन्होंने काम किया। कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद और संगठन के प्रति निष्ठा उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी गई। इसी वजह से पार्टी के भीतर उनकी पहचान लगातार मजबूत होती चली गई।
हार के बाद भी नहीं छोड़ा मैदान
राजनीति में सफलता उन्हें आसानी से नहीं मिली। साल 2005 के विधानसभा चुनाव में हार मिलने के बावजूद उन्होंने क्षेत्र से दूरी नहीं बनाई। लंबे समय तक राजनीतिक अवसरों का इंतजार किया, लेकिन जनता के बीच सक्रिय बने रहे। यही कारण रहा कि धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई।
बैकुंठपुर में खूब चर्चित हुआ नारा
इसी दौरान बैकुंठपुर क्षेत्र में एक नारा काफी चर्चित हुआ —
“जातिवाद बीमारी है, दवा मिथिलेश तिवारी है।”
यह नारा सिर्फ चुनावी प्रचार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि क्षेत्र में उनकी सामाजिक स्वीकार्यता और लोकप्रियता का प्रतीक बन गया।
2015 का चुनाव बना बड़ा मोड़
साल 2015 का विधानसभा चुनाव मिथिलेश तिवारी के राजनीतिक जीवन का अहम पड़ाव साबित हुआ। उन्होंने मजबूत राजनीतिक समीकरणों के बीच जीत दर्ज कर पहली बार बिहार विधानसभा में प्रवेश किया। इसके बाद पार्टी संगठन में उनकी भूमिका और प्रभाव दोनों लगातार बढ़ते गए।
पार्टी नेतृत्व के भरोसेमंद चेहरों में शामिल
मिथिलेश तिवारी भाजपा के उन नेताओं में माने जाते हैं, जिन पर संगठन महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भरोसे के साथ सौंपता रहा है। बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों के संचालन से लेकर संगठनात्मक रणनीति तक, उनकी सक्रिय भूमिका लगातार चर्चा में रही।
क्रिकेट की राजनीति में भी निभाई भूमिका
विधानसभा राजनीति के अलावा मिथिलेश तिवारी बिहार क्रिकेट से जुड़े मुद्दों को लेकर भी सक्रिय रहे। बिहार क्रिकेट को नई पहचान दिलाने और पुराने विवादों के खिलाफ आवाज उठाने में उनकी भूमिका चर्चा का विषय रही है।
गांव से जुड़ी भाषा ने दिलाया जनसमर्थन
मिथिलेश तिवारी की सबसे बड़ी ताकत उनका जनता से सीधा जुड़ाव माना जाता है। उनके भाषणों में गांव और समाज की झलक साफ दिखाई देती है। यही वजह है कि कार्यकर्ता और आम लोग खुद को उनसे जुड़ा हुआ महसूस करते हैं।
शिक्षा मंत्री बनने के बाद बढ़ीं उम्मीदें
अब बिहार सरकार में शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी मिलने के बाद उनके राजनीतिक कद में और वृद्धि हुई है। शिक्षा विभाग जैसे अहम मंत्रालय की जिम्मेदारी मिलने को पार्टी नेतृत्व के भरोसे और राजनीतिक रणनीति दोनों से जोड़कर देखा जा रहा है। बिहार के युवा और शिक्षा व्यवस्था को लेकर अब उनसे बड़ी उम्मीदें जुड़ गई हैं।
युवाओं के लिए प्रेरणा बनी कहानी
गोपालगंज के छोटे से गांव से निकलकर बिहार की सत्ता के केंद्र तक पहुंचने का मिथिलेश तिवारी का सफर हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा माना जा रहा है। यह कहानी बताती है कि राजनीति में सिर्फ विरासत नहीं, बल्कि मेहनत, संगठन और जनता का भरोसा भी बड़ी पहचान दिला सकता है।

