By Malay Ojha | Published: 15 October 2026 at 11:10 AM
मुंबई के ताज होटल में लेखक चेतन भगत ने डॉ. रजनीश कांत की पुस्तक ‘कायरोप्रैक्टर एंड फिजियोथेरेपिस्ट’ का विमोचन किया। टीएस पब्लिकेशन की ओर से प्रकाशित इस किताब में काइरोप्रैक्टिक पद्धति, रीढ़ की हड्डी के स्वास्थ्य और दर्द से जुड़ी समस्याओं की देखभाल के बारे में जानकारी दी गई है। किताब को आम लोगों तक इस पद्धति की बुनियादी जानकारी पहुंचाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
किताब के विमोचन के साथ काइरोप्रैक्टिक का लाइव डेमो
कार्यक्रम के दौरान डॉ. रजनीश कांत ने काइरोप्रैक्टिक तकनीक का लाइव डेमो भी दिया। इस दौरान उन्होंने चेतन भगत की कलाई पर तकनीक का इस्तेमाल किया। डेमो के बाद चेतन भगत ने आराम महसूस होने की बात कही। कार्यक्रम में किन्नर जगतगुरु महामंडलेश्वर हिमांगी सखी जी भी मौजूद रहीं। वहीं, जाने-माने फिजियोथेरेपिस्ट प्रोफेसर डॉ. अली इरानी का आशीर्वाद भी डॉ. रजनीश कांत को मिला।
चेतन भगत के साथ मंच साझा करना खास अनुभव
डॉ. रजनीश कांत ने कहा कि वह बचपन से चेतन भगत के उपन्यास पढ़ते आए हैं और उनकी कहानियों पर बनी फिल्में भी देखते रहे हैं। ऐसे में उनके साथ मंच साझा करना और उनके हाथों अपनी पुस्तक का विमोचन होना उनके लिए खास अनुभव रहा। उन्होंने फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ के चर्चित संदेश का जिक्र करते हुए कहा कि व्यक्ति को वही काम करना चाहिए, जिसमें उसकी रुचि हो। उन्होंने कहा कि वह अपने पसंदीदा क्षेत्र में काम कर रहे हैं और भारत के साथ-साथ दुनिया भर में अपनी पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।
काइरोप्रैक्टिक क्या है, किताब में समझाने की कोशिश
डॉ. रजनीश कांत के मुताबिक, पुस्तक के पहले संस्करण में काइरोप्रैक्टिक क्या है, इसकी शुरुआत कैसे हुई और किन परिस्थितियों में इसका इस्तेमाल किया जाता है, जैसे सवालों के जवाब देने की कोशिश की गई है। उन्होंने इस पद्धति को भारतीय परंपरा से जोड़ते हुए द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण और कुब्जा की कथा का भी उल्लेख किया। हालांकि, यह उनका अपना दृष्टिकोण है। आधुनिक काइरोप्रैक्टिक के इतिहास में अमेरिकी डैनियल डेविड पामर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उन्होंने 1895 में काइरोप्रैक्टिक एडजस्टमेंट किया था और 1907 में पामर स्कूल ऑफ काइरोप्रैक्टिक की स्थापना की थी।
10 अध्यायों में दी गई है काइरोप्रैक्टिक की जानकारी
इस पुस्तक में कुल 10 अध्याय हैं। इनमें काइरोप्रैक्टिक देखभाल की बुनियादी बातें, क्लिनिकल अवलोकन, खिलाड़ियों और सक्रिय जीवनशैली वाले लोगों की देखभाल, बुजुर्गों के लिए काइरोप्रैक्टिक और रीढ़ की हड्डी के स्वास्थ्य से जुड़े विषय शामिल हैं। इसके अलावा इस पद्धति को लेकर प्रचलित गलत धारणाओं, मरीजों को जागरूक करने और खुद की देखभाल पर भी जानकारी दी गई है।
किताब में RKM पद्धति, काइरोप्रैक्टिक क्लिनिक चलाने और बेहतर इलाज के लिए दूसरे विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम करने जैसे विषयों को भी जगह दी गई है।
दर्द के साथ जीने की मजबूरी खत्म करना चाहते हैं डॉ. रजनीश
डॉ. रजनीश कांत का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल दर्द का इलाज करना नहीं, बल्कि लोगों को दर्द से जुड़ी समस्याओं के प्रति जागरूक करना भी है। उन्होंने कहा, “मैं सिर्फ दर्द का इलाज नहीं करता, मैं चाहता हूं कि लोग दर्द के साथ जीना बंद करें।”
उनके मुताबिक, पुस्तक का पहला संस्करण लोगों को काइरोप्रैक्टिक की बुनियादी जानकारी देने की दिशा में एक कदम है। आने वाले संस्करण में वह अपनी व्यक्तिगत तकनीक के बारे में भी विस्तार से जानकारी देने की योजना बना रहे हैं।
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