By Malay Ojha | Published: 28 August 2026 at 12:19 PM
सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में श्रावणी उपाकर्म के अवसर पर संस्कृत परंपरा और गुरु-शिष्य संबंधों को लेकर विशेष आयोजन किया गया। इस दौरान गंगा स्नान, ऋषि पूजन, जनेऊ पूजन और ब्रह्मकर्म की परंपरा निभाई गई। कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि शिक्षक केवल पढ़ाने तक सीमित न रहें, बल्कि विद्यार्थियों को संस्कार और अच्छे कर्म की सीख देकर उन्हें श्रेष्ठ नागरिक बनाने की भूमिका निभाएं।
कुलपति ने कहा कि जब शिक्षक श्रेष्ठ गुरु की भूमिका निभाएंगे और विद्यार्थियों में अच्छे संस्कार विकसित होंगे, तभी श्रेष्ठ भारत का निर्माण संभव होगा। उन्होंने कहा कि संस्कृत, संस्कार और भारतीय संस्कृति से जुड़ी परंपराएं विद्यार्थियों को जिम्मेदारी, अनुशासन और अच्छे कर्म की दिशा दिखाती हैं। ऐसे विद्यार्थी आगे चलकर देश की पहचान को दुनिया के स्तर पर मजबूत करने में योगदान देंगे।
गंगा तट पर हुआ श्रावणी उपाकर्म
कार्यक्रम के तहत वेद विभागाध्यक्ष प्रो. महेंद्र नाथ पांडेय के नेतृत्व में शिक्षक और विद्यार्थी सुबह करीब 9:30 बजे गंगा तट पहुंचे। वहां स्नान के बाद श्रावणी उपाकर्म की परंपरा के अनुसार पूजन किया गया। इसके बाद विश्वविद्यालय के वेद विभाग में दोपहर से पहले विशेष पूजन का आयोजन किया गया।
जनेऊ पूजन और ब्रह्म गांठ का महत्व बताया
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. महेंद्र पांडेय ने श्रावणी उपाकर्म में जनेऊ पूजन और ब्रह्म गांठ की परंपरा के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि परंपरा के अनुसार पहले स्नान कर नए जनेऊ की पूजा की जाती है। जनेऊ की गांठ में ब्रह्म और उसके धागों में सप्तऋषियों का प्रतीकात्मक वास माना जाता है। पूजन के बाद जनेऊ धारण किया जाता है और आवश्यकता के अनुसार पूरे वर्ष इसका उपयोग किया जाता है।
द्विजन्म के रूप में भी मनाया जाता है पर्व
मुख्य अतिथि और विश्वविद्यालय के वरिष्ठ आचार्य प्रो. रामपूजन पाण्डेय ने कहा कि श्रावणी पर्व को द्विजन्म से भी जोड़ा जाता है। उनके अनुसार मनुष्य का पहला जन्म माता-पिता से होता है, जबकि गुरु के सानिध्य में ज्ञान और संस्कार प्राप्त करना उसके दूसरे जन्म की तरह माना गया है।
गुरु से मिलते हैं संस्कार और जिम्मेदारी का बोध
प्रो. पाण्डेय ने कहा कि प्राचीन गुरुकुल परंपरा में विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का बोध कराया जाता था। नैतिकता, चरित्र, संस्कार, संस्कृति और दया-भाव शिक्षा का अहम हिस्सा थे। उन्होंने कहा कि गुरु के प्रति सम्मान और समर्पण की भावना इस परंपरा की खास पहचान रही है।
सप्तऋषि, गौरी-गणेश का हुआ पूजन
वेद विभाग में कुलपति के आशीर्वाद और प्रो. रामपूजन पाण्डेय की अध्यक्षता में षोडशोपचार विधि से सप्तऋषि, गौरी और गणेश का पूजन किया गया। आयोजन का उद्देश्य संस्कृत, संस्कृति और संस्कार के साथ दया, करुणा और राष्ट्रीय भावना को मजबूत करने का संदेश देना रहा।
शिक्षकों और विद्यार्थियों ने लिया हिस्सा
कार्यक्रम का आयोजन वेद विभागाध्यक्ष प्रो. महेंद्र पाण्डेय के निर्देशन में हुआ। डॉ. विजय कुमार शर्मा ने आचार्य और संयोजक की भूमिका निभाई। इस मौके पर प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो. रामपूजन पाण्डेय, प्रो. महेंद्र पाण्डेय, प्रो. दिनेश कुमार गर्ग, डॉ. मधुसूदन मिश्र, डॉ. ज्ञानेन्द्र सांपकोटा, डॉ. पप्पू चौबे, डॉ. संजय कुमार तिवारी, संतोष दुबे सहित बड़ी संख्या में शिक्षक और विद्यार्थी मौजूद रहे।
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