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ट्रंप को क्यों याद आ रहा भारत का चुनाव मॉडल? 24 हजार गैर-नागरिक वोटरों के दावे के बाद अमेरिका में SIR जैसी बहस तेज

By Malay Ojha | Published: 20 August 2026 at 10:37 AM

अमेरिका में मतदाता सूची और मतदान की पात्रता को लेकर बहस अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए दावों के बाद और तेज हो गई है। ट्रंप ने 2020 के चुनावी रिकॉर्ड और नागरिकता से जुड़े आंकड़ों के मिलान का हवाला देते हुए कहा है कि शुरुआती जांच में 24 हजार से ज्यादा ऐसे मतदाता मिले, जिन्हें उन्होंने गैर-नागरिक बताया। इसी के साथ उन्होंने कांग्रेस से सेव अमेरिका एक्ट पारित करने की मांग फिर तेज कर दी है।

ट्रंप की ओर से सामने रखे गए आंकड़ों के मुताबिक करीब 12 करोड़ 80 लाख मतदाता रिकॉर्ड की शुरुआती जांच में 24 हजार से अधिक रिकॉर्ड ऐसे मिले, जिन्हें जांच में गैर-नागरिक बताया गया। अभी करीब 3 करोड़ 20 लाख रिकॉर्ड की जांच बाकी होने की बात भी कही गई है। हालांकि, इन आंकड़ों को सीधे अवैध तरीके से डाले गए मतों की अंतिम और स्वतंत्र रूप से प्रमाणित संख्या मानना उचित नहीं होगा। यह दावा जिस रिकॉर्ड-मिलान पर आधारित है, उसकी पद्धति और अंतिम पुष्टि को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।

ट्रंप के लिए यह मुद्दा इतना अहम क्यों है?
इस पूरे विवाद की असली राजनीतिक अहमियत आने वाले मध्यावधि चुनावों से जुड़ी है। अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को मध्यावधि चुनाव होने हैं। ऐसे में मतदाता सूची की शुद्धता, नागरिकता की पुष्टि और मतदान के लिए पहचान संबंधी नियम रिपब्लिकन राजनीति के बड़े मुद्दों में शामिल हो गए हैं। ट्रंप लंबे समय से चुनावी प्रक्रिया में अधिक कड़े सत्यापन की वकालत करते रहे हैं और अब उसी बहस को कानून का रूप देने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत का उदाहरण अचानक क्यों आया?
ट्रंप ने हाल में भारत की चुनाव व्यवस्था की तारीफ करते हुए फोटो पहचान पत्र के इस्तेमाल को विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से हुई बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि भारत में मतदाताओं की पहचान के लिए फोटो पहचान व्यवस्था लागू है। ट्रंप ने इस उदाहरण का इस्तेमाल अमेरिका में मतदान के दौरान पहचान और नागरिकता के प्रमाण को मजबूत करने की अपनी दलील के समर्थन में किया।

भारत का एसआईआर और अमेरिका की योजना एक जैसी नहीं
यहां सबसे महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। भारत में एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को दोबारा जांचना, पात्र मतदाताओं का सत्यापन करना और अपात्र नामों की पहचान करना है। अमेरिका में ट्रंप जिस व्यवस्था पर जोर दे रहे हैं, उसका केंद्र नागरिकता का प्रमाण और मतदाता पंजीकरण के समय पात्रता की जांच है। प्रस्तावित कानून राज्यों को सरकारी आंकड़ों के आधार पर गैर-नागरिकों की पहचान करने और ऐसे नामों को मतदाता सूची से हटाने की व्यवस्था करने को कहता है। इसलिए इसे भारत के एसआईआर जैसा राजनीतिक नारा जरूर कहा जा सकता है, लेकिन दोनों प्रक्रियाएं कानूनी और प्रशासनिक रूप से बिल्कुल समान नहीं हैं।

सेव अमेरिका एक्ट में क्या है?
ट्रंप जिस कानून को आगे बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, उसका आधिकारिक नाम सेफगार्ड अमेरिकन वोटर एलिजिबिलिटी एक्ट है। प्रस्तावित कानून में संघीय चुनावों के लिए मतदाता पंजीकरण के समय अमेरिकी नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण देने की व्यवस्था का प्रस्ताव है। इसमें ऐसे लोगों के लिए भी प्रक्रिया रखी गई है, जिनके पास तय दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन वे अन्य प्रमाण और शपथपत्र के जरिए अपनी नागरिकता साबित कर सकते हैं।

सरकारी आंकड़ों से मतदाता सूची की जांच का प्रस्ताव
प्रस्तावित कानून का एक बड़ा हिस्सा सरकारी आंकड़ों के इस्तेमाल से जुड़ा है। इसमें गृह सुरक्षा विभाग की व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा से जुड़े रिकॉर्ड, राज्य सरकारों के पहचान संबंधी रिकॉर्ड और अन्य सरकारी आंकड़ों के जरिए नागरिकता की पुष्टि करने की बात कही गई है। अगर किसी व्यक्ति के गैर-नागरिक होने की पुष्टि होती है तो उसे संघीय चुनावों की मतदाता सूची से हटाने का प्रावधान प्रस्तावित है।

ट्रंप की चिंता सिर्फ पहचान पत्र तक सीमित नहीं
ट्रंप की मांग को केवल फोटो पहचान पत्र की बहस के तौर पर देखना अधूरा होगा। इसके पीछे तीन बड़े मुद्दे हैं—कौन मतदान कर सकता है, मतदाता सूची में कौन दर्ज है और सरकार उस पात्रता को किस तरीके से जांच सकती है। यही वजह है कि नागरिकता संबंधी सरकारी रिकॉर्ड को मतदाता सूची से जोड़ने की कोशिश इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।

गैर-नागरिक मतदान पर ट्रंप का पुराना रुख
गैर-नागरिकों के मतदान का मुद्दा ट्रंप की राजनीति में नया नहीं है। उनके प्रशासन ने पहले भी नागरिकता और मतदान पात्रता के आंकड़ों को सरकारी स्तर पर जोड़ने की कोशिश की थी। वर्ष 2019 में ट्रंप प्रशासन ने नागरिकता संबंधी अधिक सटीक आंकड़े तैयार करने के लिए विभिन्न सरकारी विभागों के प्रशासनिक रिकॉर्ड तक पहुंच बढ़ाने का आदेश दिया था। उस समय भी उद्देश्य नागरिक और गैर-नागरिक आबादी की अधिक स्पष्ट तस्वीर तैयार करना बताया गया था।

लेकिन आंकड़े और उनका मतलब, दोनों अलग बातें हैं
यही वह जगह है जहां ट्रंप के दावे को सावधानी से समझने की जरूरत है। किसी रिकॉर्ड में गैर-नागरिक की पहचान होना और उस व्यक्ति का वास्तव में चुनाव में अवैध मतदान करना दो अलग बातें हैं। रिकॉर्ड मिलान में नाम, जन्मतिथि, पता या दूसरे आंकड़ों की समानता के कारण गलत पहचान की संभावना भी रहती है। हाल की जांचों पर रिपोर्टिंग में भी ऐसे मामलों में गलत मिलान और बाद में दावों के कमजोर पड़ने की बात सामने आई है।

क्या 24 हजार वोट चुनाव का नतीजा बदल सकते थे?
ट्रंप ने 2020 के चुनाव को लेकर भी लंबे समय से यह दावा किया है कि अगर कथित अवैध मतों और गड़बड़ियों को हटा दिया जाता तो नतीजा अलग हो सकता था। लेकिन 24 हजार से अधिक गैर-नागरिक रिकॉर्ड मिलने का दावा अपने आप यह साबित नहीं करता कि इतने लोगों ने मतदान किया, वे सभी अवैध रूप से मतदान कर रहे थे या उनके मत किसी खास उम्मीदवार के पक्ष में गए। इसलिए इस आंकड़े को चुनाव परिणाम बदलने का प्रमाण मानना अलग दावा होगा, जिसके लिए अलग और ठोस सबूत चाहिए।

क्या गैर-नागरिक मुख्य रूप से डेमोक्रेट को वोट देते हैं?
ट्रंप की राजनीतिक दलील का एक हिस्सा यह भी है कि गैर-नागरिक मतदाताओं का झुकाव डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर हो सकता है। लेकिन किसी रिकॉर्ड में गैर-नागरिक होने की पहचान से यह स्वतः साबित नहीं होता कि उसने किसे वोट दिया। मतदान गुप्त होता है। इसलिए इस हिस्से को राजनीतिक दावा मानकर ही देखना चाहिए, प्रमाणित तथ्य के तौर पर नहीं।

अमेरिका में भारत जैसा मॉडल क्यों चर्चा में है?
भारत में मतदाता सूची के पुनरीक्षण और पहचान सत्यापन की प्रक्रिया पहले से चुनावी व्यवस्था का हिस्सा है। हाल के वर्षों में एसआईआर के कारण मतदाता सूची, पात्रता, दस्तावेज और नामों के सत्यापन पर देशभर में बड़ी बहस हुई है। अब ट्रंप जब नागरिकता आधारित मतदाता सत्यापन और फोटो पहचान की बात करते हैं तो भारत का उदाहरण सामने आना स्वाभाविक है। यही कारण है कि अमेरिका की मौजूदा बहस को भारत की चुनावी व्यवस्था से जोड़कर देखा जा रहा है।

असली सवाल ट्रंप क्या चाहते हैं?
सीधे शब्दों में देखें तो ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिकी संघीय चुनावों में मतदान की पात्रता को नागरिकता के दस्तावेज से और मजबूती से जोड़ा जाए। वह चाहते हैं कि मतदाता पंजीकरण के समय नागरिकता की पुष्टि हो और सरकारी रिकॉर्ड के जरिए मतदाता सूची की लगातार जांच की जा सके। प्रस्तावित कानून इसी दिशा में राज्यों को अधिक जिम्मेदारी और केंद्र सरकार के आंकड़ों तक पहुंच देने की कोशिश करता है।

क्या अमेरिका में सचमुच एसआईआर आ रहा है?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अमेरिका में भारत जैसा एसआईआर लागू होने जा रहा है। सही बात यह है कि वहां मतदाता सूची की जांच और नागरिकता सत्यापन को लेकर एसआईआर जैसी बहस जरूर तेज हुई है। ट्रंप की फोटो पहचान को लेकर भारत की तारीफ, 24 हजार से ज्यादा गैर-नागरिक मतदाताओं के दावे और सेव अमेरिका एक्ट को आगे बढ़ाने की मांग—इन तीनों घटनाओं ने इस बहस को नई राजनीतिक ताकत दी है। ([The Times of India][7])

चार बिंदुओं में समझिए पूरी कहानी
पहला—मतदाता सूची की जांच: ट्रंप अमेरिकी मतदाता रिकॉर्ड को नागरिकता संबंधी सरकारी आंकड़ों से मिलाने पर जोर दे रहे हैं।
दूसरा—पहचान और नागरिकता का प्रमाण: भारत की फोटो पहचान व्यवस्था का उदाहरण देकर ट्रंप अमेरिका में मतदान के लिए पहचान और नागरिकता का प्रमाण मजबूत करना चाहते हैं।
तीसरा—गैर-नागरिक मतदाताओं का दावा: 2020 के रिकॉर्ड की शुरुआती जांच में 24 हजार से ज्यादा गैर-नागरिक रिकॉर्ड मिलने का दावा किया गया है, लेकिन इसे अवैध रूप से डाले गए 24 हजार वोटों की अंतिम पुष्टि समझना सही नहीं होगा।
चौथा—कानून के जरिए बदलाव: सेव अमेरिका एक्ट के जरिए मतदाता पंजीकरण और मतदाता सूची में नागरिकता सत्यापन को कानूनी रूप से मजबूत करने की कोशिश हो रही है।

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ट्रंप को क्यों याद आ रहा भारत का चुनाव मॉडल? 24 हजार गैर-नागरिक वोटरों के दावे के बाद अमेरिका में SIR जैसी बहस तेज

By Malay Ojha | Published: 20 August 2026 at 10:37 AM

अमेरिका में मतदाता सूची और मतदान की पात्रता को लेकर बहस अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए दावों के बाद और तेज हो गई है। ट्रंप ने 2020 के चुनावी रिकॉर्ड और नागरिकता से जुड़े आंकड़ों के मिलान का हवाला देते हुए कहा है कि शुरुआती जांच में 24 हजार से ज्यादा ऐसे मतदाता मिले, जिन्हें उन्होंने गैर-नागरिक बताया। इसी के साथ उन्होंने कांग्रेस से सेव अमेरिका एक्ट पारित करने की मांग फिर तेज कर दी है।

ट्रंप की ओर से सामने रखे गए आंकड़ों के मुताबिक करीब 12 करोड़ 80 लाख मतदाता रिकॉर्ड की शुरुआती जांच में 24 हजार से अधिक रिकॉर्ड ऐसे मिले, जिन्हें जांच में गैर-नागरिक बताया गया। अभी करीब 3 करोड़ 20 लाख रिकॉर्ड की जांच बाकी होने की बात भी कही गई है। हालांकि, इन आंकड़ों को सीधे अवैध तरीके से डाले गए मतों की अंतिम और स्वतंत्र रूप से प्रमाणित संख्या मानना उचित नहीं होगा। यह दावा जिस रिकॉर्ड-मिलान पर आधारित है, उसकी पद्धति और अंतिम पुष्टि को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।

ट्रंप के लिए यह मुद्दा इतना अहम क्यों है?
इस पूरे विवाद की असली राजनीतिक अहमियत आने वाले मध्यावधि चुनावों से जुड़ी है। अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को मध्यावधि चुनाव होने हैं। ऐसे में मतदाता सूची की शुद्धता, नागरिकता की पुष्टि और मतदान के लिए पहचान संबंधी नियम रिपब्लिकन राजनीति के बड़े मुद्दों में शामिल हो गए हैं। ट्रंप लंबे समय से चुनावी प्रक्रिया में अधिक कड़े सत्यापन की वकालत करते रहे हैं और अब उसी बहस को कानून का रूप देने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत का उदाहरण अचानक क्यों आया?
ट्रंप ने हाल में भारत की चुनाव व्यवस्था की तारीफ करते हुए फोटो पहचान पत्र के इस्तेमाल को विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से हुई बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि भारत में मतदाताओं की पहचान के लिए फोटो पहचान व्यवस्था लागू है। ट्रंप ने इस उदाहरण का इस्तेमाल अमेरिका में मतदान के दौरान पहचान और नागरिकता के प्रमाण को मजबूत करने की अपनी दलील के समर्थन में किया।

भारत का एसआईआर और अमेरिका की योजना एक जैसी नहीं
यहां सबसे महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। भारत में एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को दोबारा जांचना, पात्र मतदाताओं का सत्यापन करना और अपात्र नामों की पहचान करना है। अमेरिका में ट्रंप जिस व्यवस्था पर जोर दे रहे हैं, उसका केंद्र नागरिकता का प्रमाण और मतदाता पंजीकरण के समय पात्रता की जांच है। प्रस्तावित कानून राज्यों को सरकारी आंकड़ों के आधार पर गैर-नागरिकों की पहचान करने और ऐसे नामों को मतदाता सूची से हटाने की व्यवस्था करने को कहता है। इसलिए इसे भारत के एसआईआर जैसा राजनीतिक नारा जरूर कहा जा सकता है, लेकिन दोनों प्रक्रियाएं कानूनी और प्रशासनिक रूप से बिल्कुल समान नहीं हैं।

सेव अमेरिका एक्ट में क्या है?
ट्रंप जिस कानून को आगे बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, उसका आधिकारिक नाम सेफगार्ड अमेरिकन वोटर एलिजिबिलिटी एक्ट है। प्रस्तावित कानून में संघीय चुनावों के लिए मतदाता पंजीकरण के समय अमेरिकी नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण देने की व्यवस्था का प्रस्ताव है। इसमें ऐसे लोगों के लिए भी प्रक्रिया रखी गई है, जिनके पास तय दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन वे अन्य प्रमाण और शपथपत्र के जरिए अपनी नागरिकता साबित कर सकते हैं।

सरकारी आंकड़ों से मतदाता सूची की जांच का प्रस्ताव
प्रस्तावित कानून का एक बड़ा हिस्सा सरकारी आंकड़ों के इस्तेमाल से जुड़ा है। इसमें गृह सुरक्षा विभाग की व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा से जुड़े रिकॉर्ड, राज्य सरकारों के पहचान संबंधी रिकॉर्ड और अन्य सरकारी आंकड़ों के जरिए नागरिकता की पुष्टि करने की बात कही गई है। अगर किसी व्यक्ति के गैर-नागरिक होने की पुष्टि होती है तो उसे संघीय चुनावों की मतदाता सूची से हटाने का प्रावधान प्रस्तावित है।

ट्रंप की चिंता सिर्फ पहचान पत्र तक सीमित नहीं
ट्रंप की मांग को केवल फोटो पहचान पत्र की बहस के तौर पर देखना अधूरा होगा। इसके पीछे तीन बड़े मुद्दे हैं—कौन मतदान कर सकता है, मतदाता सूची में कौन दर्ज है और सरकार उस पात्रता को किस तरीके से जांच सकती है। यही वजह है कि नागरिकता संबंधी सरकारी रिकॉर्ड को मतदाता सूची से जोड़ने की कोशिश इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।

गैर-नागरिक मतदान पर ट्रंप का पुराना रुख
गैर-नागरिकों के मतदान का मुद्दा ट्रंप की राजनीति में नया नहीं है। उनके प्रशासन ने पहले भी नागरिकता और मतदान पात्रता के आंकड़ों को सरकारी स्तर पर जोड़ने की कोशिश की थी। वर्ष 2019 में ट्रंप प्रशासन ने नागरिकता संबंधी अधिक सटीक आंकड़े तैयार करने के लिए विभिन्न सरकारी विभागों के प्रशासनिक रिकॉर्ड तक पहुंच बढ़ाने का आदेश दिया था। उस समय भी उद्देश्य नागरिक और गैर-नागरिक आबादी की अधिक स्पष्ट तस्वीर तैयार करना बताया गया था।

लेकिन आंकड़े और उनका मतलब, दोनों अलग बातें हैं
यही वह जगह है जहां ट्रंप के दावे को सावधानी से समझने की जरूरत है। किसी रिकॉर्ड में गैर-नागरिक की पहचान होना और उस व्यक्ति का वास्तव में चुनाव में अवैध मतदान करना दो अलग बातें हैं। रिकॉर्ड मिलान में नाम, जन्मतिथि, पता या दूसरे आंकड़ों की समानता के कारण गलत पहचान की संभावना भी रहती है। हाल की जांचों पर रिपोर्टिंग में भी ऐसे मामलों में गलत मिलान और बाद में दावों के कमजोर पड़ने की बात सामने आई है।

क्या 24 हजार वोट चुनाव का नतीजा बदल सकते थे?
ट्रंप ने 2020 के चुनाव को लेकर भी लंबे समय से यह दावा किया है कि अगर कथित अवैध मतों और गड़बड़ियों को हटा दिया जाता तो नतीजा अलग हो सकता था। लेकिन 24 हजार से अधिक गैर-नागरिक रिकॉर्ड मिलने का दावा अपने आप यह साबित नहीं करता कि इतने लोगों ने मतदान किया, वे सभी अवैध रूप से मतदान कर रहे थे या उनके मत किसी खास उम्मीदवार के पक्ष में गए। इसलिए इस आंकड़े को चुनाव परिणाम बदलने का प्रमाण मानना अलग दावा होगा, जिसके लिए अलग और ठोस सबूत चाहिए।

क्या गैर-नागरिक मुख्य रूप से डेमोक्रेट को वोट देते हैं?
ट्रंप की राजनीतिक दलील का एक हिस्सा यह भी है कि गैर-नागरिक मतदाताओं का झुकाव डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर हो सकता है। लेकिन किसी रिकॉर्ड में गैर-नागरिक होने की पहचान से यह स्वतः साबित नहीं होता कि उसने किसे वोट दिया। मतदान गुप्त होता है। इसलिए इस हिस्से को राजनीतिक दावा मानकर ही देखना चाहिए, प्रमाणित तथ्य के तौर पर नहीं।

अमेरिका में भारत जैसा मॉडल क्यों चर्चा में है?
भारत में मतदाता सूची के पुनरीक्षण और पहचान सत्यापन की प्रक्रिया पहले से चुनावी व्यवस्था का हिस्सा है। हाल के वर्षों में एसआईआर के कारण मतदाता सूची, पात्रता, दस्तावेज और नामों के सत्यापन पर देशभर में बड़ी बहस हुई है। अब ट्रंप जब नागरिकता आधारित मतदाता सत्यापन और फोटो पहचान की बात करते हैं तो भारत का उदाहरण सामने आना स्वाभाविक है। यही कारण है कि अमेरिका की मौजूदा बहस को भारत की चुनावी व्यवस्था से जोड़कर देखा जा रहा है।

असली सवाल ट्रंप क्या चाहते हैं?
सीधे शब्दों में देखें तो ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिकी संघीय चुनावों में मतदान की पात्रता को नागरिकता के दस्तावेज से और मजबूती से जोड़ा जाए। वह चाहते हैं कि मतदाता पंजीकरण के समय नागरिकता की पुष्टि हो और सरकारी रिकॉर्ड के जरिए मतदाता सूची की लगातार जांच की जा सके। प्रस्तावित कानून इसी दिशा में राज्यों को अधिक जिम्मेदारी और केंद्र सरकार के आंकड़ों तक पहुंच देने की कोशिश करता है।

क्या अमेरिका में सचमुच एसआईआर आ रहा है?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अमेरिका में भारत जैसा एसआईआर लागू होने जा रहा है। सही बात यह है कि वहां मतदाता सूची की जांच और नागरिकता सत्यापन को लेकर एसआईआर जैसी बहस जरूर तेज हुई है। ट्रंप की फोटो पहचान को लेकर भारत की तारीफ, 24 हजार से ज्यादा गैर-नागरिक मतदाताओं के दावे और सेव अमेरिका एक्ट को आगे बढ़ाने की मांग—इन तीनों घटनाओं ने इस बहस को नई राजनीतिक ताकत दी है। ([The Times of India][7])

चार बिंदुओं में समझिए पूरी कहानी
पहला—मतदाता सूची की जांच: ट्रंप अमेरिकी मतदाता रिकॉर्ड को नागरिकता संबंधी सरकारी आंकड़ों से मिलाने पर जोर दे रहे हैं।
दूसरा—पहचान और नागरिकता का प्रमाण: भारत की फोटो पहचान व्यवस्था का उदाहरण देकर ट्रंप अमेरिका में मतदान के लिए पहचान और नागरिकता का प्रमाण मजबूत करना चाहते हैं।
तीसरा—गैर-नागरिक मतदाताओं का दावा: 2020 के रिकॉर्ड की शुरुआती जांच में 24 हजार से ज्यादा गैर-नागरिक रिकॉर्ड मिलने का दावा किया गया है, लेकिन इसे अवैध रूप से डाले गए 24 हजार वोटों की अंतिम पुष्टि समझना सही नहीं होगा।
चौथा—कानून के जरिए बदलाव: सेव अमेरिका एक्ट के जरिए मतदाता पंजीकरण और मतदाता सूची में नागरिकता सत्यापन को कानूनी रूप से मजबूत करने की कोशिश हो रही है।

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