By Malay Ojha | Published: 31 July 2026 at 09:01 AM
अमेरिका में पढ़ाई करने का सपना देखने वाले विदेशी छात्रों के लिए डोनाल्ड ट्रंप सरकार एक बड़ा बदलाव लाने पर विचार कर रही है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी करने के लिए विदेशी छात्रों से 1 लाख डॉलर यानी करीब 96 लाख रुपये तक की फीस ली जा सकती है। यह प्रस्ताव अभी अंतिम नहीं है, लेकिन अगर इसे मंजूरी मिलती है तो अमेरिका में पढ़ाई के बाद काम करने की योजना बना रहे हजारों भारतीय छात्रों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
यह संभावित फीस ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग यानी ओपीटी कार्यक्रम से जुड़ी हो सकती है। इसी व्यवस्था के तहत अमेरिका में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों को अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सीमित अवधि तक वहां काम करने का मौका मिलता है। रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में छात्र अपनी पढ़ाई के क्षेत्र के हिसाब से एक से तीन साल तक काम कर सकते हैं। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित 1 लाख डॉलर की फीस छात्रों से ली जाएगी या विश्वविद्यालयों और नौकरी देने वाली कंपनियों को इसका भुगतान करना होगा।
अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ
सबसे अहम बात यह है कि अमेरिकी सरकार ने ओपीटी पर 1 लाख डॉलर की फीस लगाने की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। यह मामला अभी विचार और चर्चा के स्तर पर बताया जा रहा है। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग की ओर से भी कहा गया है कि जब तक किसी नीति की औपचारिक घोषणा नहीं होती, तब तक उसे अंतिम नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद इस संभावित कदम ने विदेशी छात्रों, विश्वविद्यालयों और उन कंपनियों के बीच चिंता पैदा कर दी है, जो हर साल अमेरिकी विश्वविद्यालयों से पढ़ाई पूरी करने वाले प्रतिभाशाली छात्रों को नौकरी देती हैं।
ओपीटी विदेशी छात्रों के लिए इतना अहम क्यों?
अमेरिका में पढ़ाई करने वाले विदेशी छात्रों के लिए ओपीटी केवल नौकरी का विकल्प नहीं है, बल्कि यह उनके अमेरिकी करियर की शुरुआत का एक अहम रास्ता माना जाता है। पढ़ाई पूरी करने के बाद इसी व्यवस्था के जरिए छात्र अपने विषय से जुड़े काम का अनुभव हासिल करते हैं। विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित जैसे क्षेत्रों में पढ़ाई करने वाले छात्रों को काम करने की अवधि तीन साल तक मिल सकती है। इस वजह से बड़ी संख्या में विदेशी छात्र अमेरिकी विश्वविद्यालयों में दाखिला लेते समय ओपीटी को भी अपने भविष्य की योजना का हिस्सा मानते हैं।
बड़ी कंपनियों के लिए भी बड़ा झटका
ओपीटी का इस्तेमाल अमेरिका की कई बड़ी कंपनियां प्रतिभाशाली विदेशी छात्रों को नौकरी देने के लिए करती हैं। खासतौर पर तकनीक और वित्त से जुड़ी कंपनियां अमेरिकी विश्वविद्यालयों से पढ़ाई पूरी करने वाले छात्रों को पहले ओपीटी के तहत नौकरी देती हैं और बाद में उनके लिए एच-1बी जैसे लंबे समय के कार्य वीजा का रास्ता तलाशती हैं। ऐसे में अगर ओपीटी पर भारी फीस लगाई जाती है तो इसका असर केवल छात्रों पर नहीं, बल्कि उन कंपनियों पर भी पड़ सकता है जो दुनिया भर से प्रतिभाशाली युवाओं को अमेरिका में काम करने का मौका देती हैं।
ट्रंप सरकार पहले भी लगा चुकी है भारी शुल्क
ओपीटी को लेकर सामने आई यह खबर ऐसे समय में आई है, जब ट्रंप प्रशासन विदेशी कामगारों से जुड़े वीजा नियमों को लगातार सख्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इससे पहले सरकार ने नए एच-1बी आवेदनों के लिए 1 लाख डॉलर के भुगतान की व्यवस्था लागू करने की घोषणा की थी, जिसका मकसद अमेरिकी कामगारों की सुरक्षा और वीजा व्यवस्था में कथित दुरुपयोग को रोकना बताया गया था।
एच-1बी के बाद अब ओपीटी पर नजर?
वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, एच-1बी से जुड़ी 1 लाख डॉलर की फीस के खिलाफ तकनीकी कंपनियों और कारोबारी समूहों की ओर से विरोध हुआ था। इसके बाद इस शुल्क का दायरा उन विदेशी विशेषज्ञों तक सीमित किया गया जो सीधे एच-1बी वीजा के जरिए अमेरिका आ रहे हैं। ओपीटी से जुड़ा संभावित शुल्क इससे अलग स्थिति पैदा कर सकता है, क्योंकि इसका सीधा असर उन विदेशी छात्रों पर पड़ेगा जो पहले से अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं और पढ़ाई के बाद वहीं काम करने की उम्मीद रखते हैं।
भारतीय छात्रों पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका
अगर यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो भारतीय छात्रों को इसका बड़ा असर झेलना पड़ सकता है। अमेरिका में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों में भारत की हिस्सेदारी काफी बड़ी है और भारतीय छात्र बड़ी संख्या में अमेरिकी विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के लिए जाते हैं। ऐसे में पढ़ाई के बाद नौकरी करने के लिए करीब 96 लाख रुपये की संभावित फीस सामने आने से उन परिवारों की चिंता बढ़ सकती है, जो भारी खर्च करके अपने बच्चों को अमेरिका पढ़ने भेजते हैं।
भारतीय छात्रों के लिए अमेरिका का आकर्षण केवल वहां की डिग्री तक सीमित नहीं है। पढ़ाई के बाद ओपीटी के जरिए काम करने का मौका भी अमेरिका को चुनने की एक बड़ी वजह रहा है। छात्र पढ़ाई के दौरान खर्च और कर्ज का बोझ उठाते हैं और उन्हें उम्मीद रहती है कि डिग्री पूरी करने के बाद कुछ साल काम करके अनुभव हासिल करने के साथ अपनी आर्थिक स्थिति भी मजबूत कर सकेंगे। ऐसे में अगर काम करने के इस रास्ते पर ही करीब 96 लाख रुपये का अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है, तो कई छात्रों के लिए अमेरिका जाना आर्थिक रूप से बेहद मुश्किल हो सकता है।
आलोचकों ने बताया प्रतिभा को रोकने वाला कदम
प्रस्ताव की खबर सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी इसका विरोध शुरू हो गया है। आलोचकों का कहना है कि दुनिया के प्रतिभाशाली छात्रों के लिए अमेरिका लंबे समय से उच्च शिक्षा और बेहतर करियर का बड़ा केंद्र रहा है। अगर पढ़ाई के बाद नौकरी करने के लिए इतनी बड़ी रकम देनी पड़ेगी तो कई छात्र अमेरिका के बजाय दूसरे देशों का रुख कर सकते हैं।
इसका असर अमेरिकी विश्वविद्यालयों पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है। विदेशी छात्रों से मिलने वाली फीस कई संस्थानों की आय का अहम हिस्सा होती है। इसके अलावा, तकनीक और वित्त जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली कंपनियां भी विदेशी छात्रों से मिलने वाली प्रतिभा पर निर्भर रहती हैं। इसलिए संभावित शुल्क को लेकर यह बहस केवल आव्रजन नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र पर भी पड़ सकता है।
अमेरिकी सरकार ओपीटी के नियम भी बदल सकती है
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग ओपीटी की मौजूदा व्यवस्था में व्यापक बदलाव पर भी काम कर रहा है। हाल में विदेशी छात्रों के वीजा की अवधि से जुड़े नियमों में बदलाव की दिशा में कदम उठाए गए हैं। नई व्यवस्था के तहत कई छात्रों को पढ़ाई के बाद ओपीटी का इस्तेमाल करने के लिए वीजा अवधि बढ़ाने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। इससे विदेशी छात्रों के लिए अमेरिका में पढ़ाई पूरी करने के बाद काम करने की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक जटिल हो सकती है।
अभी छात्रों को क्या करना चाहिए?
फिलहाल विदेशी छात्रों और अमेरिका में पढ़ाई की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों को इस प्रस्ताव को अंतिम नियम नहीं मानना चाहिए। 1 लाख डॉलर की संभावित फीस को लेकर अभी सरकार की ओर से कोई अंतिम फैसला सामने नहीं आया है। यह भी साफ नहीं है कि भविष्य में अगर ऐसा नियम आता है तो शुल्क कितना होगा और इसे छात्र, विश्वविद्यालय या नौकरी देने वाली कंपनी में से कौन चुकाएगा।
हालांकि, इस घटनाक्रम से एक बात साफ है कि ट्रंप प्रशासन विदेशी छात्रों और कुशल विदेशी कामगारों से जुड़े आव्रजन नियमों को सख्त करने की दिशा में लगातार कदम उठा रहा है। ऐसे में अमेरिका में पढ़ाई की योजना बना रहे भारतीय छात्रों के लिए केवल विश्वविद्यालय की फीस और रहने का खर्च ही नहीं, बल्कि पढ़ाई के बाद काम करने से जुड़े बदलते नियमों पर भी नजर रखना जरूरी हो गया है।
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