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पश्चिम बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 38.1 लाख अपीलों का मांगा पूरा ब्योरा; 75,443 वोटरों को मिली राहत

By Malay Ojha | Published: 25 August 2026 at 09:39 PM

पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। अदालत को बताया गया कि एसआईआर से जुड़े अपीलीय न्यायाधिकरणों के सामने करीब 38.1 लाख अपीलें लंबित हैं। इनमें लगभग 31 लाख अपीलें ऐसे लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल किए जाने के खिलाफ हैं, जबकि करीब 7 लाख अपीलें उन लोगों ने की हैं, जिनके नाम सूची से हटाए गए हैं। इस बीच अदालत ने चुनाव आयोग से लंबित और निपटाई गई अपीलों का विस्तृत ब्योरा मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे गए आंकड़ों के मुताबिक अपीलीय न्यायाधिकरणों में लंबित मामलों की संख्या बहुत बड़ी है। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने यह आंकड़ा सूचना के अधिकार के तहत मिले जवाब के आधार पर अदालत के सामने रखा। उनके मुताबिक करीब 38 लाख 10 हजार अपीलें लंबित हैं। अदालत ने अब चुनाव आयोग से इन मामलों की पूरी स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।

80 फीसदी अपीलें नाम शामिल करने के खिलाफ
सुनवाई में सामने आया कि लंबित अपीलों में करीब 31 लाख मामले ऐसे हैं, जिनमें किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल किए जाने पर आपत्ति जताई गई है। यह संख्या कुल लंबित अपीलों की करीब 80 प्रतिशत बैठती है। इसके मुकाबले करीब 7 लाख अपीलें उन लोगों की हैं, जिनके नाम विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद मतदाता सूची से बाहर हो गए हैं।

हटाए गए मतदाताओं की अपील पहले सुनने की मांग
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत के सामने यह मुद्दा उठाया कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनकी अपीलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनका तर्क था कि नाम हटने की स्थिति में संबंधित व्यक्ति के मतदान के अधिकार पर सीधा असर पड़ता है। इसलिए ऐसे मामलों का जल्दी निपटारा जरूरी है।

83 हजार मामलों में हो चुका फैसला
सुनवाई के दौरान एक और महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने आया। अदालत को बताया गया कि अब तक करीब 83 हजार अपीलों का निपटारा किया जा चुका है। इनमें से 75,443 मामलों में मतदाताओं के नाम दोबारा सूची में शामिल करने का आदेश दिया गया। यानी जिन मामलों पर फैसला हुआ, उनमें 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में सूची से बाहर किए गए लोगों को राहत मिली।

75,443 को राहत का मतलब क्या है?
इस आंकड़े को लेकर सावधानी जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मतदाता सूची से हटाए गए सभी नाम गलत तरीके से हटाए गए थे। इसका सीधा मतलब इतना है कि जिन मामलों की अपील पर फैसला हुआ, उनमें बड़ी संख्या में लोगों को दोबारा मतदाता सूची में शामिल करने का आदेश दिया गया। इससे अपील की व्यवस्था के जरिए अपना पक्ष रखने और राहत पाने की अहमियत सामने आती है।

अब चुनाव आयोग से मांगी गई पूरी तस्वीर
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा है कि वह हलफनामा दाखिल कर लंबित अपीलों की स्थिति स्पष्ट करे। अदालत यह जानना चाहती है कि कुल कितने मामले लंबित हैं, उनमें कितने बाहर किए गए मतदाताओं की ओर से हैं और कितने किसी व्यक्ति का नाम सूची में शामिल किए जाने के खिलाफ हैं। साथ ही निपटाए गए मामलों और उनमें मिले परिणामों का भी पूरा विवरण मांगा गया है।

अतिरिक्त न्यायाधिकरण की जरूरत पर भी जवाब
अदालत ने चुनाव आयोग से यह भी बताने को कहा है कि लंबित अपीलों के तेजी से निपटारे के लिए कितने अतिरिक्त अपीलीय न्यायाधिकरणों की जरूरत हो सकती है। आयोग को यह जानकारी भी देनी है कि मौजूदा व्यवस्था को बेहतर बनाने और मामलों को समयबद्ध तरीके से निपटाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

कोलकाता और हावड़ा चुनाव का मुद्दा उठा
सुनवाई के दौरान दिसंबर में होने वाले कोलकाता और हावड़ा नगर निगम चुनावों का भी जिक्र आया। दलील दी गई कि इन क्षेत्रों से जुड़े मतदाता सूची विवादों को प्राथमिकता से निपटाया जा सकता है, ताकि चुनाव से पहले स्थिति स्पष्ट हो। हालांकि अदालत का ध्यान केवल इन दो नगर निगम क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा और उसने सभी लंबित अपीलों के निपटारे की व्यवस्था पर जानकारी मांगी।

31 विधानसभा सीटों को लेकर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान तृणमूल कांग्रेस की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने 31 विधानसभा क्षेत्रों का मुद्दा उठाया। उनका दावा था कि कुछ सीटों पर जीत का अंतर उन मतदाताओं की संख्या से कम था, जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि एक सीट पर जीत का अंतर 401 मत था, जबकि हटाए गए मतदाताओं की संख्या 8,785 बताई गई। एक अन्य सीट पर जीत का अंतर 316 मत बताया गया। इन दावों के आधार पर अदालत ने भी सवाल किए कि ऐसे मामलों में कानूनी स्थिति क्या होगी और क्या चुनाव याचिकाएं दायर की गई हैं।

अदालत ने पूछा- हटाए गए कितने लोगों ने अपील की?
इन दलीलों के बीच अदालत का एक अहम सवाल यह भी रहा कि जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, उनमें से कितने लोगों ने इस फैसले के खिलाफ अपील की है। यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सिर्फ नाम हटने की संख्या और उसके खिलाफ दायर अपीलों की संख्या एक जैसी नहीं हो सकती। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट अब चुनाव आयोग से अलग-अलग आंकड़े मांग रहा है।

मतदान के अधिकार को लेकर अदालत की चिंता
सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटने पर उसके मतदान के अधिकार पर सीधा असर पड़ता है। इसी वजह से बाहर किए गए मतदाताओं की अपीलों को जल्दी सुनने का मुद्दा उठा। अदालत ने लंबित मामलों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर उनकी स्थिति सामने रखने को कहा है, ताकि यह साफ हो सके कि किस तरह के मामले सबसे ज्यादा लंबित हैं।

सुप्रीम कोर्ट की नजर अब निपटारे की रफ्तार पर
मामले की सुनवाई में अदालत की चिंता केवल आंकड़े जानने तक सीमित नहीं रही। अब मुख्य सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर लंबित अपीलों का निपटारा किस तरह और कितनी तेजी से किया जाएगा। चुनाव आयोग ने भी न्यायाधिकरणों के साथ समन्वय और व्यवस्था में जरूरी सुधारों पर काम करने की बात कही है। आयोग की ओर से इस प्रक्रिया से जुड़ी व्यवस्थागत समस्याओं और समाधान की जानकारी अदालत के सामने रखने की बात कही गई है।

2029 के लोकसभा चुनाव से पहले प्रक्रिया पूरी करने पर जोर
सुनवाई के दौरान यह भी संकेत मिला कि मतदाता सूची से जुड़े मामलों को लंबे समय तक लंबित नहीं रखा जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि संसदीय चुनाव आने से काफी पहले इन मामलों को सुलझा लिया जाना चाहिए। इसका मतलब है कि एसआईआर से जुड़े विवादों के निपटारे की प्रक्रिया को अब केवल वर्तमान स्थानीय चुनावों के संदर्भ में नहीं, बल्कि अगले बड़े चुनाव से पहले पूरी व्यवस्था को साफ करने के नजरिए से भी देखा जा रहा है।

अब चुनाव आयोग के जवाब पर टिकी नजर
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब चुनाव आयोग को लंबित और निपटाई गई अपीलों का विस्तृत ब्योरा अदालत के सामने रखना होगा। खास तौर पर यह साफ होना है कि कितने मामले नाम हटाए जाने के खिलाफ हैं, कितने नाम जोड़े जाने पर आपत्ति से जुड़े हैं और कितने मामलों में मतदाताओं को राहत मिली है। इन आंकड़ों के आधार पर आगे अदालत यह तय कर सकती है कि अपीलों के जल्द निपटारे के लिए और क्या कदम जरूरी हैं।

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पश्चिम बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 38.1 लाख अपीलों का मांगा पूरा ब्योरा; 75,443 वोटरों को मिली राहत

By Malay Ojha | Published: 25 August 2026 at 09:39 PM

पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। अदालत को बताया गया कि एसआईआर से जुड़े अपीलीय न्यायाधिकरणों के सामने करीब 38.1 लाख अपीलें लंबित हैं। इनमें लगभग 31 लाख अपीलें ऐसे लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल किए जाने के खिलाफ हैं, जबकि करीब 7 लाख अपीलें उन लोगों ने की हैं, जिनके नाम सूची से हटाए गए हैं। इस बीच अदालत ने चुनाव आयोग से लंबित और निपटाई गई अपीलों का विस्तृत ब्योरा मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे गए आंकड़ों के मुताबिक अपीलीय न्यायाधिकरणों में लंबित मामलों की संख्या बहुत बड़ी है। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने यह आंकड़ा सूचना के अधिकार के तहत मिले जवाब के आधार पर अदालत के सामने रखा। उनके मुताबिक करीब 38 लाख 10 हजार अपीलें लंबित हैं। अदालत ने अब चुनाव आयोग से इन मामलों की पूरी स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।

80 फीसदी अपीलें नाम शामिल करने के खिलाफ
सुनवाई में सामने आया कि लंबित अपीलों में करीब 31 लाख मामले ऐसे हैं, जिनमें किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल किए जाने पर आपत्ति जताई गई है। यह संख्या कुल लंबित अपीलों की करीब 80 प्रतिशत बैठती है। इसके मुकाबले करीब 7 लाख अपीलें उन लोगों की हैं, जिनके नाम विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद मतदाता सूची से बाहर हो गए हैं।

हटाए गए मतदाताओं की अपील पहले सुनने की मांग
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत के सामने यह मुद्दा उठाया कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनकी अपीलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनका तर्क था कि नाम हटने की स्थिति में संबंधित व्यक्ति के मतदान के अधिकार पर सीधा असर पड़ता है। इसलिए ऐसे मामलों का जल्दी निपटारा जरूरी है।

83 हजार मामलों में हो चुका फैसला
सुनवाई के दौरान एक और महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने आया। अदालत को बताया गया कि अब तक करीब 83 हजार अपीलों का निपटारा किया जा चुका है। इनमें से 75,443 मामलों में मतदाताओं के नाम दोबारा सूची में शामिल करने का आदेश दिया गया। यानी जिन मामलों पर फैसला हुआ, उनमें 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में सूची से बाहर किए गए लोगों को राहत मिली।

75,443 को राहत का मतलब क्या है?
इस आंकड़े को लेकर सावधानी जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मतदाता सूची से हटाए गए सभी नाम गलत तरीके से हटाए गए थे। इसका सीधा मतलब इतना है कि जिन मामलों की अपील पर फैसला हुआ, उनमें बड़ी संख्या में लोगों को दोबारा मतदाता सूची में शामिल करने का आदेश दिया गया। इससे अपील की व्यवस्था के जरिए अपना पक्ष रखने और राहत पाने की अहमियत सामने आती है।

अब चुनाव आयोग से मांगी गई पूरी तस्वीर
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा है कि वह हलफनामा दाखिल कर लंबित अपीलों की स्थिति स्पष्ट करे। अदालत यह जानना चाहती है कि कुल कितने मामले लंबित हैं, उनमें कितने बाहर किए गए मतदाताओं की ओर से हैं और कितने किसी व्यक्ति का नाम सूची में शामिल किए जाने के खिलाफ हैं। साथ ही निपटाए गए मामलों और उनमें मिले परिणामों का भी पूरा विवरण मांगा गया है।

अतिरिक्त न्यायाधिकरण की जरूरत पर भी जवाब
अदालत ने चुनाव आयोग से यह भी बताने को कहा है कि लंबित अपीलों के तेजी से निपटारे के लिए कितने अतिरिक्त अपीलीय न्यायाधिकरणों की जरूरत हो सकती है। आयोग को यह जानकारी भी देनी है कि मौजूदा व्यवस्था को बेहतर बनाने और मामलों को समयबद्ध तरीके से निपटाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

कोलकाता और हावड़ा चुनाव का मुद्दा उठा
सुनवाई के दौरान दिसंबर में होने वाले कोलकाता और हावड़ा नगर निगम चुनावों का भी जिक्र आया। दलील दी गई कि इन क्षेत्रों से जुड़े मतदाता सूची विवादों को प्राथमिकता से निपटाया जा सकता है, ताकि चुनाव से पहले स्थिति स्पष्ट हो। हालांकि अदालत का ध्यान केवल इन दो नगर निगम क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा और उसने सभी लंबित अपीलों के निपटारे की व्यवस्था पर जानकारी मांगी।

31 विधानसभा सीटों को लेकर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान तृणमूल कांग्रेस की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने 31 विधानसभा क्षेत्रों का मुद्दा उठाया। उनका दावा था कि कुछ सीटों पर जीत का अंतर उन मतदाताओं की संख्या से कम था, जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि एक सीट पर जीत का अंतर 401 मत था, जबकि हटाए गए मतदाताओं की संख्या 8,785 बताई गई। एक अन्य सीट पर जीत का अंतर 316 मत बताया गया। इन दावों के आधार पर अदालत ने भी सवाल किए कि ऐसे मामलों में कानूनी स्थिति क्या होगी और क्या चुनाव याचिकाएं दायर की गई हैं।

अदालत ने पूछा- हटाए गए कितने लोगों ने अपील की?
इन दलीलों के बीच अदालत का एक अहम सवाल यह भी रहा कि जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, उनमें से कितने लोगों ने इस फैसले के खिलाफ अपील की है। यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सिर्फ नाम हटने की संख्या और उसके खिलाफ दायर अपीलों की संख्या एक जैसी नहीं हो सकती। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट अब चुनाव आयोग से अलग-अलग आंकड़े मांग रहा है।

मतदान के अधिकार को लेकर अदालत की चिंता
सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटने पर उसके मतदान के अधिकार पर सीधा असर पड़ता है। इसी वजह से बाहर किए गए मतदाताओं की अपीलों को जल्दी सुनने का मुद्दा उठा। अदालत ने लंबित मामलों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर उनकी स्थिति सामने रखने को कहा है, ताकि यह साफ हो सके कि किस तरह के मामले सबसे ज्यादा लंबित हैं।

सुप्रीम कोर्ट की नजर अब निपटारे की रफ्तार पर
मामले की सुनवाई में अदालत की चिंता केवल आंकड़े जानने तक सीमित नहीं रही। अब मुख्य सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर लंबित अपीलों का निपटारा किस तरह और कितनी तेजी से किया जाएगा। चुनाव आयोग ने भी न्यायाधिकरणों के साथ समन्वय और व्यवस्था में जरूरी सुधारों पर काम करने की बात कही है। आयोग की ओर से इस प्रक्रिया से जुड़ी व्यवस्थागत समस्याओं और समाधान की जानकारी अदालत के सामने रखने की बात कही गई है।

2029 के लोकसभा चुनाव से पहले प्रक्रिया पूरी करने पर जोर
सुनवाई के दौरान यह भी संकेत मिला कि मतदाता सूची से जुड़े मामलों को लंबे समय तक लंबित नहीं रखा जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि संसदीय चुनाव आने से काफी पहले इन मामलों को सुलझा लिया जाना चाहिए। इसका मतलब है कि एसआईआर से जुड़े विवादों के निपटारे की प्रक्रिया को अब केवल वर्तमान स्थानीय चुनावों के संदर्भ में नहीं, बल्कि अगले बड़े चुनाव से पहले पूरी व्यवस्था को साफ करने के नजरिए से भी देखा जा रहा है।

अब चुनाव आयोग के जवाब पर टिकी नजर
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब चुनाव आयोग को लंबित और निपटाई गई अपीलों का विस्तृत ब्योरा अदालत के सामने रखना होगा। खास तौर पर यह साफ होना है कि कितने मामले नाम हटाए जाने के खिलाफ हैं, कितने नाम जोड़े जाने पर आपत्ति से जुड़े हैं और कितने मामलों में मतदाताओं को राहत मिली है। इन आंकड़ों के आधार पर आगे अदालत यह तय कर सकती है कि अपीलों के जल्द निपटारे के लिए और क्या कदम जरूरी हैं।

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