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7 नवंबर से जंतर-मंतर पर CAPF जवानों की भूख हड़ताल, नए कानून और IPS वर्चस्व के खिलाफ आर-पार की तैयारी

By Malay Ojha | Published: 23 August 2026 at 11:49 AM

केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के सेवानिवृत्त जवान और कर्मचारी अब केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन तेज करने की तैयारी में हैं। ऑल एक्स-पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन ने 7 नवंबर से दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल शुरू करने का ऐलान किया है। संगठन का विरोध नए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026, पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल करने और केंद्रीय बलों में प्रतिनियुक्ति पर आने वाले भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों की बढ़ती भूमिका को लेकर है।

एसोसिएशन के सचिव रणबीर सिंह के मुताबिक, इन मांगों को लेकर सरकार से लंबे समय से बात रखने की कोशिश की गई, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकला। संगठन का कहना है कि अब विरोध प्रदर्शन के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं बचा है। एसोसिएशन ने केंद्रीय गृह मंत्री को पत्र भेजकर नए कानून को वापस लेने की मांग भी की थी, लेकिन उनके अनुसार सरकार की ओर से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला।

नए कानून को लेकर सबसे बड़ी नाराजगी
विवाद की जड़ में इस साल लागू हुआ केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद 9 अप्रैल 2026 को यह कानून अधिसूचित हुआ था। इसका मकसद केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में अधिकारियों की भर्ती, पदोन्नति, प्रतिनियुक्ति और सेवा शर्तों के लिए एक समान व्यवस्था तैयार करना है। हालांकि, कानून में वरिष्ठ पदों पर भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति के लिए तय हिस्से को लेकर केंद्रीय बलों के अपने अधिकारियों और पूर्व जवानों में नाराजगी है।

वरिष्ठ पदों पर प्रतिनियुक्ति का मुद्दा
कानून के मुताबिक महानिरीक्षक स्तर के 50 प्रतिशत पद प्रतिनियुक्ति से भरे जाने हैं। अतिरिक्त महानिदेशक स्तर पर कम से कम 67 प्रतिशत पद प्रतिनियुक्ति से भरे जाएंगे। वहीं विशेष महानिदेशक और महानिदेशक स्तर के पद प्रतिनियुक्ति के जरिए ही भरे जाने का प्रावधान है। इन प्रावधानों ने केंद्रीय बलों के कैडर अधिकारियों के बीच सबसे ज्यादा चिंता पैदा की है, क्योंकि उनका कहना है कि इससे शीर्ष पदों पर पहुंचने के उनके अवसर प्रभावित हो सकते हैं।

रिटायर जवानों ने बताया ‘काला कानून’
रणबीर सिंह ने इस कानून को लेकर कड़ा विरोध जताया है। उनका आरोप है कि जिन अधिकारियों ने वर्षों तक केंद्रीय बलों में सेवा की और जमीनी स्तर पर काम का अनुभव हासिल किया, उनके मुकाबले प्रतिनियुक्ति पर आने वाले अधिकारियों को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। उनका कहना है कि अगर पदोन्नति और वरिष्ठ जिम्मेदारियों में अपने ही कैडर के अनुभव को पीछे किया जाएगा तो जवानों और अधिकारियों के मनोबल पर असर पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी हवाला
एसोसिएशन का कहना है कि नए कानून को समझने के लिए पिछले साल के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी देखना जरूरी है। 2025 में अदालत ने केंद्र को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को महानिरीक्षक स्तर तक धीरे-धीरे कम करने की दिशा में कदम उठाने को कहा था। इसी पृष्ठभूमि में नए कानून को लेकर पूर्व जवानों और अधिकारियों ने सवाल खड़े किए हैं।

सरकार के कानून से क्यों बढ़ा विवाद?
केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के लिए सरकार का तर्क है कि अलग-अलग बलों में अधिकारियों की भर्ती, पदोन्नति और सेवा शर्तों से जुड़े नियम लंबे समय से अलग-अलग व्यवस्था के तहत चलते रहे हैं। इससे विवाद और मुकदमों की स्थिति बनती रही है। नए कानून के जरिए सरकार एक व्यापक कानूनी ढांचा तैयार करना चाहती है, जिससे इन मामलों में एकरूपता लाई जा सके। सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि इससे केंद्रीय बलों और राज्य पुलिस के बीच बेहतर तालमेल बनाने में मदद मिलेगी।

कैडर अधिकारियों की चिंता पदोन्नति को लेकर
दूसरी तरफ, केंद्रीय बलों के कैडर अधिकारियों और उनके संगठनों की चिंता यह है कि वरिष्ठ पदों पर प्रतिनियुक्ति का बड़ा हिस्सा तय हो जाने से उनके लिए पदोन्नति की संभावनाएं सीमित हो सकती हैं। पहले भी केंद्रीय बलों में वरिष्ठ पदों की कमी और पदोन्नति में देरी को लेकर सवाल उठते रहे हैं। नए कानून में प्रतिनियुक्ति का प्रावधान कानूनी रूप से तय हो जाने के बाद इस चिंता ने और जोर पकड़ा है।

पुरानी पेंशन की मांग भी आंदोलन में शामिल
पूर्व जवानों का आंदोलन सिर्फ नए कानून तक सीमित नहीं है। संगठन पुरानी पेंशन व्यवस्था को दोबारा लागू करने की मांग भी उठा रहा है। उनका कहना है कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में लंबे समय तक देश की सुरक्षा और आंतरिक व्यवस्था से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाने वाले कर्मचारियों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक सुरक्षा का सवाल बेहद महत्वपूर्ण है। इसी मांग को आंदोलन के प्रमुख मुद्दों में शामिल किया गया है।

पांच प्रमुख केंद्रीय बलों पर असर
यह कानून मुख्य रूप से सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस और सशस्त्र सीमा बल जैसे प्रमुख केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों से जुड़ी व्यवस्था को प्रभावित करता है। इन बलों की भूमिका सीमा सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा, महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़ी जिम्मेदारियों में अहम है।

अब आंदोलन पर टिकी नजर
एसोसिएशन के ऐलान के बाद आने वाले समय में केंद्र सरकार और पूर्व केंद्रीय बल कर्मियों के बीच इस मुद्दे पर टकराव बढ़ने की संभावना है। एक तरफ सरकार नए कानून को प्रशासनिक और सेवा संबंधी नियमों में एकरूपता लाने वाला कदम बता रही है, वहीं विरोध कर रहे पूर्व जवान इसे अपने कैडर अधिकारियों के अधिकार और भविष्य की पदोन्नति से जोड़कर देख रहे हैं। 7 नवंबर से प्रस्तावित भूख हड़ताल के जरिए संगठन अब सरकार पर अपनी मांगों को लेकर दबाव बनाने की तैयारी में है।

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7 नवंबर से जंतर-मंतर पर CAPF जवानों की भूख हड़ताल, नए कानून और IPS वर्चस्व के खिलाफ आर-पार की तैयारी

By Malay Ojha | Published: 23 August 2026 at 11:49 AM

केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के सेवानिवृत्त जवान और कर्मचारी अब केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन तेज करने की तैयारी में हैं। ऑल एक्स-पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन ने 7 नवंबर से दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल शुरू करने का ऐलान किया है। संगठन का विरोध नए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026, पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल करने और केंद्रीय बलों में प्रतिनियुक्ति पर आने वाले भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों की बढ़ती भूमिका को लेकर है।

एसोसिएशन के सचिव रणबीर सिंह के मुताबिक, इन मांगों को लेकर सरकार से लंबे समय से बात रखने की कोशिश की गई, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकला। संगठन का कहना है कि अब विरोध प्रदर्शन के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं बचा है। एसोसिएशन ने केंद्रीय गृह मंत्री को पत्र भेजकर नए कानून को वापस लेने की मांग भी की थी, लेकिन उनके अनुसार सरकार की ओर से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला।

नए कानून को लेकर सबसे बड़ी नाराजगी
विवाद की जड़ में इस साल लागू हुआ केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद 9 अप्रैल 2026 को यह कानून अधिसूचित हुआ था। इसका मकसद केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में अधिकारियों की भर्ती, पदोन्नति, प्रतिनियुक्ति और सेवा शर्तों के लिए एक समान व्यवस्था तैयार करना है। हालांकि, कानून में वरिष्ठ पदों पर भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति के लिए तय हिस्से को लेकर केंद्रीय बलों के अपने अधिकारियों और पूर्व जवानों में नाराजगी है।

वरिष्ठ पदों पर प्रतिनियुक्ति का मुद्दा
कानून के मुताबिक महानिरीक्षक स्तर के 50 प्रतिशत पद प्रतिनियुक्ति से भरे जाने हैं। अतिरिक्त महानिदेशक स्तर पर कम से कम 67 प्रतिशत पद प्रतिनियुक्ति से भरे जाएंगे। वहीं विशेष महानिदेशक और महानिदेशक स्तर के पद प्रतिनियुक्ति के जरिए ही भरे जाने का प्रावधान है। इन प्रावधानों ने केंद्रीय बलों के कैडर अधिकारियों के बीच सबसे ज्यादा चिंता पैदा की है, क्योंकि उनका कहना है कि इससे शीर्ष पदों पर पहुंचने के उनके अवसर प्रभावित हो सकते हैं।

रिटायर जवानों ने बताया ‘काला कानून’
रणबीर सिंह ने इस कानून को लेकर कड़ा विरोध जताया है। उनका आरोप है कि जिन अधिकारियों ने वर्षों तक केंद्रीय बलों में सेवा की और जमीनी स्तर पर काम का अनुभव हासिल किया, उनके मुकाबले प्रतिनियुक्ति पर आने वाले अधिकारियों को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। उनका कहना है कि अगर पदोन्नति और वरिष्ठ जिम्मेदारियों में अपने ही कैडर के अनुभव को पीछे किया जाएगा तो जवानों और अधिकारियों के मनोबल पर असर पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी हवाला
एसोसिएशन का कहना है कि नए कानून को समझने के लिए पिछले साल के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी देखना जरूरी है। 2025 में अदालत ने केंद्र को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को महानिरीक्षक स्तर तक धीरे-धीरे कम करने की दिशा में कदम उठाने को कहा था। इसी पृष्ठभूमि में नए कानून को लेकर पूर्व जवानों और अधिकारियों ने सवाल खड़े किए हैं।

सरकार के कानून से क्यों बढ़ा विवाद?
केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के लिए सरकार का तर्क है कि अलग-अलग बलों में अधिकारियों की भर्ती, पदोन्नति और सेवा शर्तों से जुड़े नियम लंबे समय से अलग-अलग व्यवस्था के तहत चलते रहे हैं। इससे विवाद और मुकदमों की स्थिति बनती रही है। नए कानून के जरिए सरकार एक व्यापक कानूनी ढांचा तैयार करना चाहती है, जिससे इन मामलों में एकरूपता लाई जा सके। सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि इससे केंद्रीय बलों और राज्य पुलिस के बीच बेहतर तालमेल बनाने में मदद मिलेगी।

कैडर अधिकारियों की चिंता पदोन्नति को लेकर
दूसरी तरफ, केंद्रीय बलों के कैडर अधिकारियों और उनके संगठनों की चिंता यह है कि वरिष्ठ पदों पर प्रतिनियुक्ति का बड़ा हिस्सा तय हो जाने से उनके लिए पदोन्नति की संभावनाएं सीमित हो सकती हैं। पहले भी केंद्रीय बलों में वरिष्ठ पदों की कमी और पदोन्नति में देरी को लेकर सवाल उठते रहे हैं। नए कानून में प्रतिनियुक्ति का प्रावधान कानूनी रूप से तय हो जाने के बाद इस चिंता ने और जोर पकड़ा है।

पुरानी पेंशन की मांग भी आंदोलन में शामिल
पूर्व जवानों का आंदोलन सिर्फ नए कानून तक सीमित नहीं है। संगठन पुरानी पेंशन व्यवस्था को दोबारा लागू करने की मांग भी उठा रहा है। उनका कहना है कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में लंबे समय तक देश की सुरक्षा और आंतरिक व्यवस्था से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाने वाले कर्मचारियों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक सुरक्षा का सवाल बेहद महत्वपूर्ण है। इसी मांग को आंदोलन के प्रमुख मुद्दों में शामिल किया गया है।

पांच प्रमुख केंद्रीय बलों पर असर
यह कानून मुख्य रूप से सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस और सशस्त्र सीमा बल जैसे प्रमुख केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों से जुड़ी व्यवस्था को प्रभावित करता है। इन बलों की भूमिका सीमा सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा, महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़ी जिम्मेदारियों में अहम है।

अब आंदोलन पर टिकी नजर
एसोसिएशन के ऐलान के बाद आने वाले समय में केंद्र सरकार और पूर्व केंद्रीय बल कर्मियों के बीच इस मुद्दे पर टकराव बढ़ने की संभावना है। एक तरफ सरकार नए कानून को प्रशासनिक और सेवा संबंधी नियमों में एकरूपता लाने वाला कदम बता रही है, वहीं विरोध कर रहे पूर्व जवान इसे अपने कैडर अधिकारियों के अधिकार और भविष्य की पदोन्नति से जोड़कर देख रहे हैं। 7 नवंबर से प्रस्तावित भूख हड़ताल के जरिए संगठन अब सरकार पर अपनी मांगों को लेकर दबाव बनाने की तैयारी में है।

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