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रामनगर की रामलीला: भरत का आक्रोश, कैकेयी से बोले- ऐसा करना था तो मुझे जन्म ही क्यों दिया?

By Malay Ojha | Published: 05 October 2026 at 11:47 PM

वाराणसी। रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला में सोमवार को भरत के भाई प्रेम और त्याग की मार्मिक लीला का मंचन हुआ। ननिहाल से अयोध्या लौटे भरत को जब पता चला कि राजा दशरथ का निधन हो गया है और श्रीराम वन चले गए हैं, तो वह अपनी मां कैकेयी पर बुरी तरह नाराज हो उठे। भरत के आगमन की लीला देखने के लिए बड़ी संख्या में रामलीला प्रेमी जुटे।

भरत के अयोध्या पहुंचने की खबर मिलते ही कैकेयी आरती की थाल लेकर उनका स्वागत करने पहुंचती हैं। वह भरत को राजमहल ले जाती हैं और ननिहाल का हालचाल पूछती हैं। महल में सन्नाटा देखकर भरत जब राम, सीता और लक्ष्मण के बारे में पूछते हैं तो कैकेयी उन्हें बताती हैं कि दशरथ स्वर्ग सिधार चुके हैं और राम को वन जाना पड़ा है। अब अयोध्या का राजपाट भरत को मिलना है।

मां के फैसले पर भरत ने जताया गुस्सा
यह सुनते ही भरत का धैर्य जवाब दे जाता है। वह कैकेयी को खरी-खोटी सुनाते हुए कहते हैं कि उनके इस फैसले से पूरे रघुकुल का नाश हो गया। भरत अपनी मां से यहां तक कह देते हैं कि अगर ऐसा ही करना था तो उन्हें जन्म ही क्यों दिया, कोख में ही क्यों नहीं मार दिया।

मंथरा को देखकर शत्रुघ्न का गुस्सा फूटा
इसी दौरान मंथरा सज-धजकर वहां पहुंचती है। उसे देखते ही शत्रुघ्न का गुस्सा भड़क उठता है और वह उसके बाल पकड़कर उसे घसीटने लगते हैं। भरत बीच में आकर मंथरा को छोड़ने के लिए कहते हैं। इसके बाद भरत का दुख और बढ़ जाता है और वह माता कौशल्या के पास बैठकर फूट-फूटकर रोने लगते हैं।

राम को वापस लाने का लिया फैसला
कौशल्या भरत को समझाती हैं। भरत राम को वापस लाने का मन बना लेते हैं। माता की अनुमति लेकर वह शत्रुघ्न के साथ श्रीराम से मिलने निकल पड़ते हैं। दोनों भाई तमसा नदी के किनारे पहुंचते हैं और रात में विश्राम करते हैं।

निषाद मिलन के बाद पहुंचे भारद्वाज आश्रम
अगले पड़ाव में भरत श्रृंगवेरपुर पहुंचते हैं। गंगा के दर्शन कर उन्हें प्रणाम करते हैं। इसके बाद भारद्वाज ऋषि के आश्रम पहुंचते हैं। भारद्वाज उन्हें समझाते हैं कि ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है, श्रीराम के चरण कमल के दर्शन होते ही उनका सारा दुख दूर हो जाएगा। आश्रम में कंद-मूल और फल ग्रहण करने के बाद भरत और उनके साथ आए लोग विश्राम करते हैं।

11वें दिन इन प्रसंगों का मंचन
रामनगर रामलीला के ग्यारहवें दिन अवध में भरत आगमन, भरत का चित्रकूट प्रस्थान, निषाद मिलन, गंगा दर्शन और भारद्वाज आश्रम में निवास जैसे प्रसंगों का मंचन किया गया। भरत के चरित्र में भाई के प्रति प्रेम, त्याग और श्रीराम को वापस अयोध्या लाने की भावना ने लीला प्रेमियों को भावुक कर दिया।

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रामनगर की रामलीला: भरत का आक्रोश, कैकेयी से बोले- ऐसा करना था तो मुझे जन्म ही क्यों दिया?

By Malay Ojha | Published: 05 October 2026 at 11:47 PM

वाराणसी। रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला में सोमवार को भरत के भाई प्रेम और त्याग की मार्मिक लीला का मंचन हुआ। ननिहाल से अयोध्या लौटे भरत को जब पता चला कि राजा दशरथ का निधन हो गया है और श्रीराम वन चले गए हैं, तो वह अपनी मां कैकेयी पर बुरी तरह नाराज हो उठे। भरत के आगमन की लीला देखने के लिए बड़ी संख्या में रामलीला प्रेमी जुटे।

भरत के अयोध्या पहुंचने की खबर मिलते ही कैकेयी आरती की थाल लेकर उनका स्वागत करने पहुंचती हैं। वह भरत को राजमहल ले जाती हैं और ननिहाल का हालचाल पूछती हैं। महल में सन्नाटा देखकर भरत जब राम, सीता और लक्ष्मण के बारे में पूछते हैं तो कैकेयी उन्हें बताती हैं कि दशरथ स्वर्ग सिधार चुके हैं और राम को वन जाना पड़ा है। अब अयोध्या का राजपाट भरत को मिलना है।

मां के फैसले पर भरत ने जताया गुस्सा
यह सुनते ही भरत का धैर्य जवाब दे जाता है। वह कैकेयी को खरी-खोटी सुनाते हुए कहते हैं कि उनके इस फैसले से पूरे रघुकुल का नाश हो गया। भरत अपनी मां से यहां तक कह देते हैं कि अगर ऐसा ही करना था तो उन्हें जन्म ही क्यों दिया, कोख में ही क्यों नहीं मार दिया।

मंथरा को देखकर शत्रुघ्न का गुस्सा फूटा
इसी दौरान मंथरा सज-धजकर वहां पहुंचती है। उसे देखते ही शत्रुघ्न का गुस्सा भड़क उठता है और वह उसके बाल पकड़कर उसे घसीटने लगते हैं। भरत बीच में आकर मंथरा को छोड़ने के लिए कहते हैं। इसके बाद भरत का दुख और बढ़ जाता है और वह माता कौशल्या के पास बैठकर फूट-फूटकर रोने लगते हैं।

राम को वापस लाने का लिया फैसला
कौशल्या भरत को समझाती हैं। भरत राम को वापस लाने का मन बना लेते हैं। माता की अनुमति लेकर वह शत्रुघ्न के साथ श्रीराम से मिलने निकल पड़ते हैं। दोनों भाई तमसा नदी के किनारे पहुंचते हैं और रात में विश्राम करते हैं।

निषाद मिलन के बाद पहुंचे भारद्वाज आश्रम
अगले पड़ाव में भरत श्रृंगवेरपुर पहुंचते हैं। गंगा के दर्शन कर उन्हें प्रणाम करते हैं। इसके बाद भारद्वाज ऋषि के आश्रम पहुंचते हैं। भारद्वाज उन्हें समझाते हैं कि ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है, श्रीराम के चरण कमल के दर्शन होते ही उनका सारा दुख दूर हो जाएगा। आश्रम में कंद-मूल और फल ग्रहण करने के बाद भरत और उनके साथ आए लोग विश्राम करते हैं।

11वें दिन इन प्रसंगों का मंचन
रामनगर रामलीला के ग्यारहवें दिन अवध में भरत आगमन, भरत का चित्रकूट प्रस्थान, निषाद मिलन, गंगा दर्शन और भारद्वाज आश्रम में निवास जैसे प्रसंगों का मंचन किया गया। भरत के चरित्र में भाई के प्रति प्रेम, त्याग और श्रीराम को वापस अयोध्या लाने की भावना ने लीला प्रेमियों को भावुक कर दिया।

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