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CWG 2026: पहली कोशिश में चूकने के बाद मीराबाई चानू ने रचा इतिहास, गोल्ड की हैट्रिक के साथ नया रिकॉर्ड

By Malay Ojha | Published: 26 July 2026 at 09:24 PM

भारतीय वेटलिफ्टिंग की दिग्गज खिलाड़ी मीराबाई चानू ने एक बार फिर बड़े मंच पर अपना दम दिखाते हुए इतिहास रच दिया है। ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में उन्होंने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर भारत को खेलों का पहला गोल्ड दिलाया। मीराबाई ने कुल 190 किलोग्राम वजन उठाया और इसके साथ ही लगातार तीसरे कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण जीतने वाली भारतीय खिलाड़ी बन गईं।

मीराबाई चानू के लिए यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदकों की हैट्रिक पूरी कर ली है। इससे पहले उन्होंने 2018 में गोल्ड कोस्ट और 2022 में बर्मिंघम में भी सोने का तमगा अपने नाम किया था। अब ग्लासगो में तीसरी बार पोडियम के सबसे ऊपरी पायदान पर पहुंचकर उन्होंने अपने नाम एक और बड़ी उपलब्धि दर्ज कर ली है।

190 किलोग्राम का कुल वजन उठाकर जीता सोना
48 किलोग्राम वर्ग के मुकाबले में मीराबाई ने स्नैच और क्लीन एंड जर्क को मिलाकर कुल 190 किलोग्राम वजन उठाया। स्नैच में उन्होंने 85 किलोग्राम का वजन उठाया, जबकि क्लीन एंड जर्क में 105 किलोग्राम वजन के साथ अपना स्वर्ण पदक पक्का किया। उनका प्रदर्शन इतना प्रभावशाली रहा कि मुकाबले के दौरान ही उन्होंने अपनी बढ़त मजबूत कर ली थी।

शुरुआत में 82 किलो पर चूकीं, फिर 85 किलो उठाकर बनाया रिकॉर्ड
मीराबाई की जीत की कहानी सिर्फ स्वर्ण पदक तक सीमित नहीं रही। स्नैच राउंड में उनकी शुरुआत उम्मीद के मुताबिक नहीं हुई। उन्होंने पहली कोशिश में 82 किलोग्राम वजन उठाने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो सकीं। इसके बाद उन्होंने दूसरी कोशिश में 82 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाकर वापसी की। तीसरी कोशिश में उन्होंने 85 किलोग्राम वजन उठाकर नया कॉमनवेल्थ गेम्स रिकॉर्ड कायम कर दिया।

क्लीन एंड जर्क में भी दिखाया दम, दूसरी कोशिश में मिली सफलता
स्नैच में शानदार वापसी के बाद मीराबाई ने क्लीन एंड जर्क में 105 किलोग्राम वजन उठाने का प्रयास किया। पहली कोशिश में वह सफल नहीं हो सकीं, लेकिन उन्होंने दबाव में आने के बजाय दूसरी कोशिश में यही वजन सफलतापूर्वक उठा लिया। इस लिफ्ट के साथ उनका कुल स्कोर 190 किलोग्राम पहुंच गया और स्वर्ण पदक पर उनकी मुहर लग गई। इसके बाद उन्होंने तीसरी कोशिश नहीं करने का फैसला किया।

भारत के खाते में आया खेलों का पहला गोल्ड
मीराबाई चानू का स्वर्ण पदक ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के लिए बेहद अहम रहा। उनकी जीत ने भारतीय दल को खेलों का पहला स्वर्ण पदक दिलाया। इससे पहले भी वेटलिफ्टिंग भारत के लिए पदक दिलाने वाला मजबूत खेल रहा है और इस बार भी मीराबाई ने देश की उम्मीदों पर पूरी तरह खरा उतरते हुए सबसे बड़ा पदक अपने नाम किया।

मीराबाई के नाम अब कॉमनवेल्थ गेम्स के चार पदक
ग्लासगो की जीत के बाद मीराबाई चानू के कॉमनवेल्थ गेम्स पदकों की संख्या चार हो गई है। वह 2014 में रजत पदक जीत चुकी हैं, जबकि 2018, 2022 और अब 2026 में उन्होंने स्वर्ण पदक अपने नाम किया है। लगातार तीन संस्करणों में सोना जीतना उनकी निरंतरता और बड़े मुकाबलों में दबाव झेलने की क्षमता को दिखाता है।

ओलंपिक पदक से लेकर कॉमनवेल्थ में दबदबे तक
मीराबाई चानू का नाम भारतीय खेल जगत में किसी पहचान का मोहताज नहीं है। वह ओलंपिक पदक जीत चुकी हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सबसे भरोसेमंद वेटलिफ्टरों में गिनी जाती हैं। बड़े मुकाबलों में उनका अनुभव और मुश्किल परिस्थितियों में प्रदर्शन करने की क्षमता उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग बनाती है। ग्लासगो में भी उन्होंने एक बार फिर साबित किया कि बड़े मंच का दबाव उनके प्रदर्शन को कमजोर नहीं करता।

मणिपुर से निकलीं, दुनिया के मंच पर बनाई अपनी पहचान
मीराबाई चानू का संबंध मणिपुर से है और उनका खेल सफर संघर्षों से भरा रहा है। छोटे शहर और सीमित संसाधनों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने वाली मीराबाई ने अपनी मेहनत के दम पर भारतीय वेटलिफ्टिंग को नई पहचान दी। कम उम्र में ही उन्होंने वजन उठाने के खेल की ओर कदम बढ़ाया और धीरे-धीरे देश की सबसे बड़ी खिलाड़ियों में शामिल हो गईं।

मुश्किल दौर में भी नहीं छोड़ा हौसला
मीराबाई के करियर में कई ऐसे मौके आए जब परिस्थितियां उनके पक्ष में नहीं थीं। चोट और प्रदर्शन से जुड़ी चुनौतियों के बावजूद उन्होंने वापसी की और लगातार खुद को साबित किया। उनका सफर इस बात की मिसाल है कि किसी खिलाड़ी की सफलता केवल पदकों से नहीं, बल्कि उन मुश्किल रास्तों से भी तय होती है जिन्हें पार करके वह उस मुकाम तक पहुंचता है।

डाइट से लेकर ट्रेनिंग तक, आसान नहीं था सफर
मीराबाई के शुरुआती दिनों को याद करें तो उनकी राह बिल्कुल आसान नहीं थी। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह हमेशा खिलाड़ियों के लिए जरूरी बेहतर डाइट और सुविधाओं का खर्च उठा सकें। इसके बावजूद उन्होंने मेहनत जारी रखी। समय के साथ उनकी कड़ी ट्रेनिंग, अनुशासन और मजबूत इच्छाशक्ति ने उन्हें दुनिया के सबसे बड़े खेल मंचों तक पहुंचाया।

एक बार फिर करोड़ों भारतीयों को गर्व का मौका
ग्लासगो में मीराबाई चानू की यह जीत सिर्फ एक स्वर्ण पदक नहीं है। यह भारतीय खेलों के लिए एक बड़ा संदेश भी है। जिस खिलाड़ी ने पहले ही ओलंपिक और कॉमनवेल्थ जैसे बड़े मंचों पर देश का नाम रोशन किया है, उसने अब एक और इतिहास अपने नाम कर लिया है। लगातार तीसरे कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण जीतकर मीराबाई ने दिखाया कि अनुभव, मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर लंबे समय तक शीर्ष स्तर पर कायम रहा जा सकता है।

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CWG 2026: पहली कोशिश में चूकने के बाद मीराबाई चानू ने रचा इतिहास, गोल्ड की हैट्रिक के साथ नया रिकॉर्ड

By Malay Ojha | Published: 26 July 2026 at 09:24 PM

भारतीय वेटलिफ्टिंग की दिग्गज खिलाड़ी मीराबाई चानू ने एक बार फिर बड़े मंच पर अपना दम दिखाते हुए इतिहास रच दिया है। ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में उन्होंने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर भारत को खेलों का पहला गोल्ड दिलाया। मीराबाई ने कुल 190 किलोग्राम वजन उठाया और इसके साथ ही लगातार तीसरे कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण जीतने वाली भारतीय खिलाड़ी बन गईं।

मीराबाई चानू के लिए यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदकों की हैट्रिक पूरी कर ली है। इससे पहले उन्होंने 2018 में गोल्ड कोस्ट और 2022 में बर्मिंघम में भी सोने का तमगा अपने नाम किया था। अब ग्लासगो में तीसरी बार पोडियम के सबसे ऊपरी पायदान पर पहुंचकर उन्होंने अपने नाम एक और बड़ी उपलब्धि दर्ज कर ली है।

190 किलोग्राम का कुल वजन उठाकर जीता सोना
48 किलोग्राम वर्ग के मुकाबले में मीराबाई ने स्नैच और क्लीन एंड जर्क को मिलाकर कुल 190 किलोग्राम वजन उठाया। स्नैच में उन्होंने 85 किलोग्राम का वजन उठाया, जबकि क्लीन एंड जर्क में 105 किलोग्राम वजन के साथ अपना स्वर्ण पदक पक्का किया। उनका प्रदर्शन इतना प्रभावशाली रहा कि मुकाबले के दौरान ही उन्होंने अपनी बढ़त मजबूत कर ली थी।

शुरुआत में 82 किलो पर चूकीं, फिर 85 किलो उठाकर बनाया रिकॉर्ड
मीराबाई की जीत की कहानी सिर्फ स्वर्ण पदक तक सीमित नहीं रही। स्नैच राउंड में उनकी शुरुआत उम्मीद के मुताबिक नहीं हुई। उन्होंने पहली कोशिश में 82 किलोग्राम वजन उठाने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो सकीं। इसके बाद उन्होंने दूसरी कोशिश में 82 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाकर वापसी की। तीसरी कोशिश में उन्होंने 85 किलोग्राम वजन उठाकर नया कॉमनवेल्थ गेम्स रिकॉर्ड कायम कर दिया।

क्लीन एंड जर्क में भी दिखाया दम, दूसरी कोशिश में मिली सफलता
स्नैच में शानदार वापसी के बाद मीराबाई ने क्लीन एंड जर्क में 105 किलोग्राम वजन उठाने का प्रयास किया। पहली कोशिश में वह सफल नहीं हो सकीं, लेकिन उन्होंने दबाव में आने के बजाय दूसरी कोशिश में यही वजन सफलतापूर्वक उठा लिया। इस लिफ्ट के साथ उनका कुल स्कोर 190 किलोग्राम पहुंच गया और स्वर्ण पदक पर उनकी मुहर लग गई। इसके बाद उन्होंने तीसरी कोशिश नहीं करने का फैसला किया।

भारत के खाते में आया खेलों का पहला गोल्ड
मीराबाई चानू का स्वर्ण पदक ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के लिए बेहद अहम रहा। उनकी जीत ने भारतीय दल को खेलों का पहला स्वर्ण पदक दिलाया। इससे पहले भी वेटलिफ्टिंग भारत के लिए पदक दिलाने वाला मजबूत खेल रहा है और इस बार भी मीराबाई ने देश की उम्मीदों पर पूरी तरह खरा उतरते हुए सबसे बड़ा पदक अपने नाम किया।

मीराबाई के नाम अब कॉमनवेल्थ गेम्स के चार पदक
ग्लासगो की जीत के बाद मीराबाई चानू के कॉमनवेल्थ गेम्स पदकों की संख्या चार हो गई है। वह 2014 में रजत पदक जीत चुकी हैं, जबकि 2018, 2022 और अब 2026 में उन्होंने स्वर्ण पदक अपने नाम किया है। लगातार तीन संस्करणों में सोना जीतना उनकी निरंतरता और बड़े मुकाबलों में दबाव झेलने की क्षमता को दिखाता है।

ओलंपिक पदक से लेकर कॉमनवेल्थ में दबदबे तक
मीराबाई चानू का नाम भारतीय खेल जगत में किसी पहचान का मोहताज नहीं है। वह ओलंपिक पदक जीत चुकी हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सबसे भरोसेमंद वेटलिफ्टरों में गिनी जाती हैं। बड़े मुकाबलों में उनका अनुभव और मुश्किल परिस्थितियों में प्रदर्शन करने की क्षमता उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग बनाती है। ग्लासगो में भी उन्होंने एक बार फिर साबित किया कि बड़े मंच का दबाव उनके प्रदर्शन को कमजोर नहीं करता।

मणिपुर से निकलीं, दुनिया के मंच पर बनाई अपनी पहचान
मीराबाई चानू का संबंध मणिपुर से है और उनका खेल सफर संघर्षों से भरा रहा है। छोटे शहर और सीमित संसाधनों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने वाली मीराबाई ने अपनी मेहनत के दम पर भारतीय वेटलिफ्टिंग को नई पहचान दी। कम उम्र में ही उन्होंने वजन उठाने के खेल की ओर कदम बढ़ाया और धीरे-धीरे देश की सबसे बड़ी खिलाड़ियों में शामिल हो गईं।

मुश्किल दौर में भी नहीं छोड़ा हौसला
मीराबाई के करियर में कई ऐसे मौके आए जब परिस्थितियां उनके पक्ष में नहीं थीं। चोट और प्रदर्शन से जुड़ी चुनौतियों के बावजूद उन्होंने वापसी की और लगातार खुद को साबित किया। उनका सफर इस बात की मिसाल है कि किसी खिलाड़ी की सफलता केवल पदकों से नहीं, बल्कि उन मुश्किल रास्तों से भी तय होती है जिन्हें पार करके वह उस मुकाम तक पहुंचता है।

डाइट से लेकर ट्रेनिंग तक, आसान नहीं था सफर
मीराबाई के शुरुआती दिनों को याद करें तो उनकी राह बिल्कुल आसान नहीं थी। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह हमेशा खिलाड़ियों के लिए जरूरी बेहतर डाइट और सुविधाओं का खर्च उठा सकें। इसके बावजूद उन्होंने मेहनत जारी रखी। समय के साथ उनकी कड़ी ट्रेनिंग, अनुशासन और मजबूत इच्छाशक्ति ने उन्हें दुनिया के सबसे बड़े खेल मंचों तक पहुंचाया।

एक बार फिर करोड़ों भारतीयों को गर्व का मौका
ग्लासगो में मीराबाई चानू की यह जीत सिर्फ एक स्वर्ण पदक नहीं है। यह भारतीय खेलों के लिए एक बड़ा संदेश भी है। जिस खिलाड़ी ने पहले ही ओलंपिक और कॉमनवेल्थ जैसे बड़े मंचों पर देश का नाम रोशन किया है, उसने अब एक और इतिहास अपने नाम कर लिया है। लगातार तीसरे कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण जीतकर मीराबाई ने दिखाया कि अनुभव, मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर लंबे समय तक शीर्ष स्तर पर कायम रहा जा सकता है।

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