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जंतर-मंतर पर 2,500 से ज्यादा लोगों की पहचान! आखिर भीड़ में छिपे चेहरे को कैसे पकड़ता है FRS कैमरा?

By Malay Ojha | Published: 25 July 2026 at 10:38 AM

जंतर-मंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बीच दिल्ली पुलिस की एक ऐसी तकनीक चर्चा में आ गई है, जिसने हजारों लोगों की भीड़ पर नजर रखने का तरीका ही बदल दिया है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, प्रदर्शन स्थल के आसपास लगाए गए फेशियल रिकग्निशन सिस्टम की मदद से 2,500 से ज्यादा ऐसे लोगों की पहचान की गई, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड पुलिस के पास मौजूद है। पुलिस का कहना है कि इस व्यवस्था का मकसद आम प्रदर्शनकारियों की पहचान करना नहीं, बल्कि वांछित अपराधियों, फरार आरोपियों और हिस्ट्रीशीटरों पर नजर रखना है।

जंतर-मंतर जैसे संवेदनशील प्रदर्शन स्थल पर बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही होती है। ऐसे में पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि भीड़ के बीच किसी ऐसे व्यक्ति की पहचान कैसे की जाए, जिसकी तलाश किसी मामले में पहले से चल रही हो। इसी वजह से पुलिस ने प्रदर्शन स्थल के आसपास फेशियल रिकग्निशन सिस्टम से लैस चार इकाइयां तैनात कीं। ये इकाइयां प्रमुख प्रवेश और निकास रास्तों पर नजर रखती हैं और पुलिस के मौजूदा रिकॉर्ड से जुड़ी बताई गई हैं।

2,500 से ज्यादा लोगों की पहचान का दावा
पुलिस सूत्रों के अनुसार, इस तकनीक के जरिये 2,500 से अधिक ऐसे लोगों की पहचान की गई, जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज है। इनमें वांछित अपराधी, फरार आरोपी, हिस्ट्रीशीटर और पुलिस की सूची में दर्ज अन्य संदिग्ध श्रेणी के लोग शामिल बताए गए हैं। हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि किसी व्यक्ति की पहचान पुलिस रिकॉर्ड में होना और उसका किसी मौजूदा हिंसक घटना में शामिल होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।

एफआरएस आखिर काम कैसे करता है?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह तकनीक आखिर भीड़ में किसी चेहरे को पहचानती कैसे है? आसान भाषा में समझें तो फेशियल रिकग्निशन सिस्टम कैमरे से मिलने वाली तस्वीर या सीधे वीडियो दृश्य में मौजूद चेहरों को पहले खोजता है। इसके बाद वह चेहरे की कुछ खास विशेषताओं को डिजिटल आंकड़ों में बदलता है। यह प्रक्रिया इतनी तेज होती है कि कैमरे के सामने से गुजरने वाले कई लोगों के चेहरों को लगातार जांचा जा सकता है।

पहले कैमरा ढूंढता है चेहरा
एफआरएस की प्रक्रिया का पहला चरण चेहरा पहचानना होता है। निगरानी कैमरे से आने वाले वीडियो में सिस्टम यह पता लगाने की कोशिश करता है कि तस्वीर में इंसानी चेहरा कहां मौजूद है। भीड़ में एक साथ कई चेहरे दिखाई देने पर भी आधुनिक प्रणाली अलग-अलग चेहरों को पहचानकर उनका विश्लेषण कर सकती है। इसके बाद सिस्टम आगे की पहचान प्रक्रिया शुरू करता है।

चेहरे की खास बनावट का होता है विश्लेषण
चेहरा मिल जाने के बाद तकनीक उसकी कई प्रमुख विशेषताओं का विश्लेषण करती है। इसमें आंखों के बीच की दूरी, नाक और मुंह की स्थिति, चेहरे की चौड़ाई, जबड़े की बनावट और चेहरे के दूसरे हिस्सों के बीच संबंध जैसे कई बिंदु शामिल हो सकते हैं। अलग-अलग प्रणालियां इन विशेषताओं को अलग तरीके से मापती हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर एफआरएस कैमरा एक ही तरह से चेहरे का 3डी नक्शा बनाता है।

तस्वीर नहीं, डिजिटल पहचान बनती है
चेहरे का विश्लेषण पूरा होने के बाद सिस्टम उस चेहरे को एक गणितीय डिजिटल रूप में बदलता है। तकनीकी भाषा में इसे फेस एम्बेडिंग या चेहरे की डिजिटल विशेषता कहा जाता है। आसान शब्दों में इसे किसी चेहरे का डिजिटल खाका समझ सकते हैं। यही खाका आगे पुलिस के उपलब्ध रिकॉर्ड में मौजूद तस्वीरों या पहचान संबंधी आंकड़ों से तुलना के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

फिर पुलिस रिकॉर्ड से होती है तुलना
इसके बाद सिस्टम नए मिले चेहरे की डिजिटल विशेषताओं की तुलना उस डेटाबेस से करता है, जिससे उसे जोड़ा गया है। जंतर-मंतर के मामले में पुलिस ने कहा है कि एफआरएस का इस्तेमाल ऐसे लोगों की पहचान के लिए किया जा रहा है, जिनका नाम पहले से पुलिस के आपराधिक रिकॉर्ड में मौजूद है। अगर किसी चेहरे में पर्याप्त समानता मिलती है, तो सिस्टम संबंधित पुलिसकर्मियों को जांच के लिए संकेत दे सकता है। इसके बाद अंतिम कार्रवाई पुलिस की ओर से सत्यापन और अन्य तथ्यों के आधार पर होती है।

क्या एफआरएस हर चेहरे को अपराधी बता देता है?
ऐसा समझना गलत होगा। फेशियल रिकग्निशन सिस्टम किसी व्यक्ति को अपने आप अपराधी घोषित नहीं करता। यह केवल उपलब्ध तस्वीर और रिकॉर्ड के बीच समानता का संकेत देता है। किसी व्यक्ति की पहचान की पुष्टि के लिए पुलिस को दूसरे दस्तावेजों, रिकॉर्ड और मौके की जानकारी से भी जांच करनी होती है। यानी कैमरे से मिला मिलान अपने आप में अंतिम कानूनी फैसला नहीं है।

भीड़ में कुछ सेकंड में कैसे होती है पहचान?
इस तकनीक की सबसे बड़ी ताकत इसकी गति है। जहां किसी पुलिसकर्मी को हजारों चेहरों की तस्वीरें देखकर पहचान करने में काफी समय लग सकता है, वहीं कंप्यूटर आधारित प्रणाली एक साथ बड़ी संख्या में चेहरों की तुलना कर सकती है। इसी वजह से बड़े जुलूस, प्रदर्शन, मेले या अन्य भीड़भाड़ वाले इलाकों में पुलिस के लिए संदिग्ध या वांछित लोगों की पहचान करना आसान हो सकता है।

सिर्फ अपराधियों की तलाश या निगरानी भी?
दिल्ली पुलिस का कहना है कि जंतर-मंतर पर तैनात एफआरएस आम प्रदर्शनकारियों की निगरानी के लिए नहीं, बल्कि पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज वांछित अपराधियों और अन्य आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की पहचान के उद्देश्य से इस्तेमाल किया जा रहा है। पुलिस ने यह भी कहा है कि ऐसी तकनीक का इस्तेमाल वह बड़े सार्वजनिक आयोजनों और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पहले से करती रही है।

तकनीक के साथ निजता पर भी सवाल
हालांकि, चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक के इस्तेमाल को लेकर निजता और नागरिक अधिकारों से जुड़े सवाल भी उठते रहे हैं। किसी सार्वजनिक जगह पर लोगों के चेहरों की पहचान और डिजिटल विश्लेषण कितना किया जाए, इसका दायरा क्या हो और इस तरह जुटाए गए आंकड़ों को कितने समय तक सुरक्षित रखा जाए—ये ऐसे सवाल हैं जिन पर लगातार बहस होती रही है। जंतर-मंतर पर एफआरएस की तैनाती के बाद भी निगरानी और निजता के बीच संतुलन को लेकर चर्चा तेज हुई है।

पुलिसिंग में बढ़ता तकनीक का इस्तेमाल
फेशियल रिकग्निशन सिस्टम अब आधुनिक पुलिसिंग का हिस्सा बनता जा रहा है। बड़े शहरों में कैमरों, वीडियो विश्लेषण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों का इस्तेमाल संदिग्धों की पहचान, जांच और कानून-व्यवस्था से जुड़े कामों में किया जा रहा है। जंतर-मंतर का मामला इसी बदलती पुलिस व्यवस्था का एक उदाहरण है, जहां बड़ी भीड़ के बीच पुलिस रिकॉर्ड में मौजूद चेहरों की पहचान के लिए तकनीक का सहारा लिया गया।

जंतर-मंतर का मामला क्यों है अहम?
जंतर-मंतर पर एफआरएस की तैनाती और 2,500 से ज्यादा आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की पहचान का दावा यह दिखाता है कि पुलिस अब भीड़ को सिर्फ आंखों से देखने तक सीमित नहीं रहना चाहती। कैमरे, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल रिकॉर्ड को जोड़कर ऐसी व्यवस्था बनाई जा रही है, जिसमें किसी वांछित व्यक्ति की पहचान तेजी से की जा सके। हालांकि, इस तकनीक का इस्तेमाल कितनी पारदर्शिता के साथ हो और इसके दायरे की स्पष्ट सीमा क्या हो, यह सवाल आगे भी महत्वपूर्ण बना रहेगा।

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जंतर-मंतर पर 2,500 से ज्यादा लोगों की पहचान! आखिर भीड़ में छिपे चेहरे को कैसे पकड़ता है FRS कैमरा?

By Malay Ojha | Published: 25 July 2026 at 10:38 AM

जंतर-मंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बीच दिल्ली पुलिस की एक ऐसी तकनीक चर्चा में आ गई है, जिसने हजारों लोगों की भीड़ पर नजर रखने का तरीका ही बदल दिया है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, प्रदर्शन स्थल के आसपास लगाए गए फेशियल रिकग्निशन सिस्टम की मदद से 2,500 से ज्यादा ऐसे लोगों की पहचान की गई, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड पुलिस के पास मौजूद है। पुलिस का कहना है कि इस व्यवस्था का मकसद आम प्रदर्शनकारियों की पहचान करना नहीं, बल्कि वांछित अपराधियों, फरार आरोपियों और हिस्ट्रीशीटरों पर नजर रखना है।

जंतर-मंतर जैसे संवेदनशील प्रदर्शन स्थल पर बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही होती है। ऐसे में पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि भीड़ के बीच किसी ऐसे व्यक्ति की पहचान कैसे की जाए, जिसकी तलाश किसी मामले में पहले से चल रही हो। इसी वजह से पुलिस ने प्रदर्शन स्थल के आसपास फेशियल रिकग्निशन सिस्टम से लैस चार इकाइयां तैनात कीं। ये इकाइयां प्रमुख प्रवेश और निकास रास्तों पर नजर रखती हैं और पुलिस के मौजूदा रिकॉर्ड से जुड़ी बताई गई हैं।

2,500 से ज्यादा लोगों की पहचान का दावा
पुलिस सूत्रों के अनुसार, इस तकनीक के जरिये 2,500 से अधिक ऐसे लोगों की पहचान की गई, जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज है। इनमें वांछित अपराधी, फरार आरोपी, हिस्ट्रीशीटर और पुलिस की सूची में दर्ज अन्य संदिग्ध श्रेणी के लोग शामिल बताए गए हैं। हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि किसी व्यक्ति की पहचान पुलिस रिकॉर्ड में होना और उसका किसी मौजूदा हिंसक घटना में शामिल होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।

एफआरएस आखिर काम कैसे करता है?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह तकनीक आखिर भीड़ में किसी चेहरे को पहचानती कैसे है? आसान भाषा में समझें तो फेशियल रिकग्निशन सिस्टम कैमरे से मिलने वाली तस्वीर या सीधे वीडियो दृश्य में मौजूद चेहरों को पहले खोजता है। इसके बाद वह चेहरे की कुछ खास विशेषताओं को डिजिटल आंकड़ों में बदलता है। यह प्रक्रिया इतनी तेज होती है कि कैमरे के सामने से गुजरने वाले कई लोगों के चेहरों को लगातार जांचा जा सकता है।

पहले कैमरा ढूंढता है चेहरा
एफआरएस की प्रक्रिया का पहला चरण चेहरा पहचानना होता है। निगरानी कैमरे से आने वाले वीडियो में सिस्टम यह पता लगाने की कोशिश करता है कि तस्वीर में इंसानी चेहरा कहां मौजूद है। भीड़ में एक साथ कई चेहरे दिखाई देने पर भी आधुनिक प्रणाली अलग-अलग चेहरों को पहचानकर उनका विश्लेषण कर सकती है। इसके बाद सिस्टम आगे की पहचान प्रक्रिया शुरू करता है।

चेहरे की खास बनावट का होता है विश्लेषण
चेहरा मिल जाने के बाद तकनीक उसकी कई प्रमुख विशेषताओं का विश्लेषण करती है। इसमें आंखों के बीच की दूरी, नाक और मुंह की स्थिति, चेहरे की चौड़ाई, जबड़े की बनावट और चेहरे के दूसरे हिस्सों के बीच संबंध जैसे कई बिंदु शामिल हो सकते हैं। अलग-अलग प्रणालियां इन विशेषताओं को अलग तरीके से मापती हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर एफआरएस कैमरा एक ही तरह से चेहरे का 3डी नक्शा बनाता है।

तस्वीर नहीं, डिजिटल पहचान बनती है
चेहरे का विश्लेषण पूरा होने के बाद सिस्टम उस चेहरे को एक गणितीय डिजिटल रूप में बदलता है। तकनीकी भाषा में इसे फेस एम्बेडिंग या चेहरे की डिजिटल विशेषता कहा जाता है। आसान शब्दों में इसे किसी चेहरे का डिजिटल खाका समझ सकते हैं। यही खाका आगे पुलिस के उपलब्ध रिकॉर्ड में मौजूद तस्वीरों या पहचान संबंधी आंकड़ों से तुलना के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

फिर पुलिस रिकॉर्ड से होती है तुलना
इसके बाद सिस्टम नए मिले चेहरे की डिजिटल विशेषताओं की तुलना उस डेटाबेस से करता है, जिससे उसे जोड़ा गया है। जंतर-मंतर के मामले में पुलिस ने कहा है कि एफआरएस का इस्तेमाल ऐसे लोगों की पहचान के लिए किया जा रहा है, जिनका नाम पहले से पुलिस के आपराधिक रिकॉर्ड में मौजूद है। अगर किसी चेहरे में पर्याप्त समानता मिलती है, तो सिस्टम संबंधित पुलिसकर्मियों को जांच के लिए संकेत दे सकता है। इसके बाद अंतिम कार्रवाई पुलिस की ओर से सत्यापन और अन्य तथ्यों के आधार पर होती है।

क्या एफआरएस हर चेहरे को अपराधी बता देता है?
ऐसा समझना गलत होगा। फेशियल रिकग्निशन सिस्टम किसी व्यक्ति को अपने आप अपराधी घोषित नहीं करता। यह केवल उपलब्ध तस्वीर और रिकॉर्ड के बीच समानता का संकेत देता है। किसी व्यक्ति की पहचान की पुष्टि के लिए पुलिस को दूसरे दस्तावेजों, रिकॉर्ड और मौके की जानकारी से भी जांच करनी होती है। यानी कैमरे से मिला मिलान अपने आप में अंतिम कानूनी फैसला नहीं है।

भीड़ में कुछ सेकंड में कैसे होती है पहचान?
इस तकनीक की सबसे बड़ी ताकत इसकी गति है। जहां किसी पुलिसकर्मी को हजारों चेहरों की तस्वीरें देखकर पहचान करने में काफी समय लग सकता है, वहीं कंप्यूटर आधारित प्रणाली एक साथ बड़ी संख्या में चेहरों की तुलना कर सकती है। इसी वजह से बड़े जुलूस, प्रदर्शन, मेले या अन्य भीड़भाड़ वाले इलाकों में पुलिस के लिए संदिग्ध या वांछित लोगों की पहचान करना आसान हो सकता है।

सिर्फ अपराधियों की तलाश या निगरानी भी?
दिल्ली पुलिस का कहना है कि जंतर-मंतर पर तैनात एफआरएस आम प्रदर्शनकारियों की निगरानी के लिए नहीं, बल्कि पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज वांछित अपराधियों और अन्य आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की पहचान के उद्देश्य से इस्तेमाल किया जा रहा है। पुलिस ने यह भी कहा है कि ऐसी तकनीक का इस्तेमाल वह बड़े सार्वजनिक आयोजनों और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पहले से करती रही है।

तकनीक के साथ निजता पर भी सवाल
हालांकि, चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक के इस्तेमाल को लेकर निजता और नागरिक अधिकारों से जुड़े सवाल भी उठते रहे हैं। किसी सार्वजनिक जगह पर लोगों के चेहरों की पहचान और डिजिटल विश्लेषण कितना किया जाए, इसका दायरा क्या हो और इस तरह जुटाए गए आंकड़ों को कितने समय तक सुरक्षित रखा जाए—ये ऐसे सवाल हैं जिन पर लगातार बहस होती रही है। जंतर-मंतर पर एफआरएस की तैनाती के बाद भी निगरानी और निजता के बीच संतुलन को लेकर चर्चा तेज हुई है।

पुलिसिंग में बढ़ता तकनीक का इस्तेमाल
फेशियल रिकग्निशन सिस्टम अब आधुनिक पुलिसिंग का हिस्सा बनता जा रहा है। बड़े शहरों में कैमरों, वीडियो विश्लेषण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों का इस्तेमाल संदिग्धों की पहचान, जांच और कानून-व्यवस्था से जुड़े कामों में किया जा रहा है। जंतर-मंतर का मामला इसी बदलती पुलिस व्यवस्था का एक उदाहरण है, जहां बड़ी भीड़ के बीच पुलिस रिकॉर्ड में मौजूद चेहरों की पहचान के लिए तकनीक का सहारा लिया गया।

जंतर-मंतर का मामला क्यों है अहम?
जंतर-मंतर पर एफआरएस की तैनाती और 2,500 से ज्यादा आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की पहचान का दावा यह दिखाता है कि पुलिस अब भीड़ को सिर्फ आंखों से देखने तक सीमित नहीं रहना चाहती। कैमरे, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल रिकॉर्ड को जोड़कर ऐसी व्यवस्था बनाई जा रही है, जिसमें किसी वांछित व्यक्ति की पहचान तेजी से की जा सके। हालांकि, इस तकनीक का इस्तेमाल कितनी पारदर्शिता के साथ हो और इसके दायरे की स्पष्ट सीमा क्या हो, यह सवाल आगे भी महत्वपूर्ण बना रहेगा।

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