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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: गंभीर अपराध वाले प्रदर्शनकारियों को राहत नहीं, राज्यों को FIR वापस लेने की छूट; 19 अगस्त को फिर सुनवाई

By Malay Ojha | Published: 03 August 2026 at 04:19 PM

नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा और पुलिस कार्रवाई के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अपने पिछले आदेश को स्पष्ट किया है। अदालत ने कहा कि गंभीर और जघन्य अपराधों के आरोपियों को किसी तरह की राहत नहीं दी जाएगी। वहीं, ऐसे मामलों में जहां गंभीर आपराधिक आरोप नहीं हैं, राज्यों को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी बंद करने या वापस लेने पर फैसला लेने की स्वतंत्रता होगी। मामले की अगली सुनवाई अब 19 अगस्त को होगी।

गंभीर अपराध के आरोपियों को राहत नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि उसके पिछले आदेश में ‘आपराधिक पृष्ठभूमि’ वाले प्रदर्शनकारियों का जिक्र उन लोगों के संदर्भ में था, जिन पर गंभीर या जघन्य अपराध के आरोप हैं। इसमें हत्या जैसे गंभीर मामले शामिल हैं। अदालत की इस स्पष्टता के बाद यह साफ हो गया है कि केवल प्रदर्शन में शामिल होने या छोटे-मोटे मामलों में आरोपी बनाए गए हर व्यक्ति को गंभीर अपराधियों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

राज्य प्राथमिकी वापस लेने पर फैसला कर सकते हैं
अदालत ने 28 जुलाई के अपने आदेश के संदर्भ में कहा कि दिल्ली और दूसरे राज्य प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को बंद करने या वापस लेने के लिए स्वतंत्र हैं। इसका मतलब यह है कि प्राथमिकी वापस लेने का फैसला स्वतः नहीं होगा, बल्कि संबंधित राज्य अपने स्तर पर मामले की गंभीरता और कानूनी स्थिति को देखते हुए कार्रवाई कर सकते हैं। वहीं, गंभीर और जघन्य अपराधों से जुड़े मामलों में राहत का रास्ता खुला नहीं रहेगा।

केंद्र ने कहा- पहले दिए आश्वासन पर कायम
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को लेकर अदालत के सामने पहले दिए गए अपने आश्वासन पर पूरी तरह कायम है। केंद्र का कहना था कि गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपी लोगों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी वापस नहीं ली जाएंगी। सरकार ने ऐसे लोगों की संख्या 2,700 से अधिक बताई है, हालांकि इन आंकड़ों और मामलों की अंतिम कानूनी स्थिति पर आगे की सुनवाई में चर्चा हो सकती है।

पुलिस कार्रवाई पर भी सुप्रीम कोर्ट सख्त
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए। वकीलों ने दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान कुछ ऐसे पुलिसकर्मी भी मौजूद थे, जो वर्दी में नहीं थे और जिनकी भूमिका की जांच जरूरी है। अदालत के सामने यह भी कहा गया कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई में कथित तौर पर बाहरी लोगों या उपद्रवी तत्वों की मौजूदगी की भी जांच होनी चाहिए। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि किसी को भी कानून के नाम पर अत्याचार करने की छूट नहीं दी जा सकती।

पैलेट गन और लाठीचार्ज पर मांगा जवाब
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत से यह भी पूछा गया कि प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किसके निर्देश पर किया गया। पुलिस आयुक्त और त्वरित कार्रवाई बल के अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए। अदालत के सामने यह दलील दी गई कि पुलिस कार्रवाई से जुड़े वीडियो पेश किए गए हैं और इनकी जांच के आधार पर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर भी स्पष्ट जवाब देने को कहा है।

पुलिस और प्रदर्शनकारियों दोनों की भूमिका की जांच जरूरी
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में यह बात भी सामने आई कि जांच का दायरा केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रह सकता। अदालत ने पहले ही संकेत दिया था कि प्रदर्शन के दौरान छात्रों और पुलिसकर्मियों को लगी चोटों तथा हिंसा की घटनाओं की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच जरूरी है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि न तो कथित तौर पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने वाले पुलिसकर्मियों को संरक्षण मिलना चाहिए और न ही गंभीर आपराधिक गतिविधियों में शामिल लोगों को केवल प्रदर्शनकारी होने के आधार पर राहत दी जा सकती है।

फेशियल सर्विलांस और आधार के इस्तेमाल पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान प्रदर्शन स्थल पर चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक के इस्तेमाल का मुद्दा भी उठा। याचिकाकर्ताओं की ओर से आरोप लगाया गया कि प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए बड़े स्तर पर निगरानी की गई और इसके लिए उनकी सहमति नहीं ली गई। वकीलों ने सवाल उठाया कि अगर पहचान के लिए आधार से जुड़े आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि ऐसा किस कानूनी आधार पर किया गया और एकत्र किए गए आंकड़ों को कितने समय तक सुरक्षित रखा जाएगा।

निजता के अधिकार को लेकर चिंता
प्रदर्शनकारियों की डिजिटल और निजी जानकारी को लेकर भी अदालत के सामने चिंता जताई गई। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन से जुड़े सीसीटीवी, ड्रोन, शरीर पर लगे कैमरों और वायरलेस संदेशों की रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था। साथ ही प्रदर्शनकारियों के निजी आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं करने को कहा गया था। अब चेहरे की पहचान और आधार से जुड़े सवालों के उठने के बाद मामले में निजता और निगरानी का पहलू भी महत्वपूर्ण हो गया है।

जांच के लिए विशेष दल बनाने पर भी नजर
एक याचिकाकर्ता की ओर से मामले की जांच की निगरानी के लिए पूर्व प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति बनाने की मांग भी की गई। अदालत ने इस मुद्दे पर विचार करने के संकेत दिए हैं। 28 जुलाई की सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की जरूरत पर जोर दिया था और पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अगुवाई में विशेष जांच दल बनाने की संभावना पर विचार किया था।

केंद्र का दावा- गंभीर मामलों में प्राथमिकी वापस नहीं होगी
केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि बलात्कार, हत्या और बाल यौन अपराध संरक्षण कानून जैसे गंभीर मामलों में पहले से आपराधिक रिकॉर्ड रखने वाले लोगों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी वापस नहीं ली जाएगी। सरकार ने ऐसे 2,700 से अधिक लोगों का जिक्र किया है। हालांकि अदालत के सामने यह भी स्पष्ट हुआ कि केवल पुराने आपराधिक रिकॉर्ड के आधार पर हर प्रदर्शनकारी को गंभीर अपराधी मानने के बजाय मामलों की प्रकृति और आरोपों को देखना जरूरी होगा।

19 अगस्त को फिर होगी अहम सुनवाई
अब इस मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त को होगी। उस दिन अदालत विशेष जांच दल के गठन, पुलिस कार्रवाई की जांच, पैलेट गन के इस्तेमाल और प्राथमिकी वापस लेने की प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर आगे सुनवाई कर सकती है। केंद्र और राज्यों से यह भी पूछा जा सकता है कि अब तक कितनी प्राथमिकी वापस लेने या बंद करने की प्रक्रिया शुरू की गई है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी से एक बात साफ हो गई है कि अदालत शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों और गंभीर अपराध के आरोपियों के बीच अंतर कर रही है। छोटे मामलों या केवल राजनीतिक विरोध के कारण दर्ज मामलों में राहत की संभावना बनी हुई है, लेकिन हत्या जैसे गंभीर और जघन्य अपराधों के आरोपियों को संरक्षण नहीं मिलेगा। दूसरी ओर, पुलिस कार्रवाई में कथित ज्यादती, पैलेट गन के इस्तेमाल और प्रदर्शनकारियों की निगरानी के आरोपों की जांच भी अदालत की निगरानी में आगे बढ़ सकती है। अब 19 अगस्त की सुनवाई पर सबकी नजर रहेगी, जहां इस पूरे मामले की अगली दिशा और जांच की तस्वीर और साफ हो सकती है।

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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: गंभीर अपराध वाले प्रदर्शनकारियों को राहत नहीं, राज्यों को FIR वापस लेने की छूट; 19 अगस्त को फिर सुनवाई

By Malay Ojha | Published: 03 August 2026 at 04:19 PM

नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा और पुलिस कार्रवाई के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अपने पिछले आदेश को स्पष्ट किया है। अदालत ने कहा कि गंभीर और जघन्य अपराधों के आरोपियों को किसी तरह की राहत नहीं दी जाएगी। वहीं, ऐसे मामलों में जहां गंभीर आपराधिक आरोप नहीं हैं, राज्यों को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी बंद करने या वापस लेने पर फैसला लेने की स्वतंत्रता होगी। मामले की अगली सुनवाई अब 19 अगस्त को होगी।

गंभीर अपराध के आरोपियों को राहत नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि उसके पिछले आदेश में ‘आपराधिक पृष्ठभूमि’ वाले प्रदर्शनकारियों का जिक्र उन लोगों के संदर्भ में था, जिन पर गंभीर या जघन्य अपराध के आरोप हैं। इसमें हत्या जैसे गंभीर मामले शामिल हैं। अदालत की इस स्पष्टता के बाद यह साफ हो गया है कि केवल प्रदर्शन में शामिल होने या छोटे-मोटे मामलों में आरोपी बनाए गए हर व्यक्ति को गंभीर अपराधियों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

राज्य प्राथमिकी वापस लेने पर फैसला कर सकते हैं
अदालत ने 28 जुलाई के अपने आदेश के संदर्भ में कहा कि दिल्ली और दूसरे राज्य प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को बंद करने या वापस लेने के लिए स्वतंत्र हैं। इसका मतलब यह है कि प्राथमिकी वापस लेने का फैसला स्वतः नहीं होगा, बल्कि संबंधित राज्य अपने स्तर पर मामले की गंभीरता और कानूनी स्थिति को देखते हुए कार्रवाई कर सकते हैं। वहीं, गंभीर और जघन्य अपराधों से जुड़े मामलों में राहत का रास्ता खुला नहीं रहेगा।

केंद्र ने कहा- पहले दिए आश्वासन पर कायम
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को लेकर अदालत के सामने पहले दिए गए अपने आश्वासन पर पूरी तरह कायम है। केंद्र का कहना था कि गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपी लोगों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी वापस नहीं ली जाएंगी। सरकार ने ऐसे लोगों की संख्या 2,700 से अधिक बताई है, हालांकि इन आंकड़ों और मामलों की अंतिम कानूनी स्थिति पर आगे की सुनवाई में चर्चा हो सकती है।

पुलिस कार्रवाई पर भी सुप्रीम कोर्ट सख्त
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए। वकीलों ने दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान कुछ ऐसे पुलिसकर्मी भी मौजूद थे, जो वर्दी में नहीं थे और जिनकी भूमिका की जांच जरूरी है। अदालत के सामने यह भी कहा गया कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई में कथित तौर पर बाहरी लोगों या उपद्रवी तत्वों की मौजूदगी की भी जांच होनी चाहिए। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि किसी को भी कानून के नाम पर अत्याचार करने की छूट नहीं दी जा सकती।

पैलेट गन और लाठीचार्ज पर मांगा जवाब
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत से यह भी पूछा गया कि प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किसके निर्देश पर किया गया। पुलिस आयुक्त और त्वरित कार्रवाई बल के अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए। अदालत के सामने यह दलील दी गई कि पुलिस कार्रवाई से जुड़े वीडियो पेश किए गए हैं और इनकी जांच के आधार पर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर भी स्पष्ट जवाब देने को कहा है।

पुलिस और प्रदर्शनकारियों दोनों की भूमिका की जांच जरूरी
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में यह बात भी सामने आई कि जांच का दायरा केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रह सकता। अदालत ने पहले ही संकेत दिया था कि प्रदर्शन के दौरान छात्रों और पुलिसकर्मियों को लगी चोटों तथा हिंसा की घटनाओं की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच जरूरी है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि न तो कथित तौर पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने वाले पुलिसकर्मियों को संरक्षण मिलना चाहिए और न ही गंभीर आपराधिक गतिविधियों में शामिल लोगों को केवल प्रदर्शनकारी होने के आधार पर राहत दी जा सकती है।

फेशियल सर्विलांस और आधार के इस्तेमाल पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान प्रदर्शन स्थल पर चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक के इस्तेमाल का मुद्दा भी उठा। याचिकाकर्ताओं की ओर से आरोप लगाया गया कि प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए बड़े स्तर पर निगरानी की गई और इसके लिए उनकी सहमति नहीं ली गई। वकीलों ने सवाल उठाया कि अगर पहचान के लिए आधार से जुड़े आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि ऐसा किस कानूनी आधार पर किया गया और एकत्र किए गए आंकड़ों को कितने समय तक सुरक्षित रखा जाएगा।

निजता के अधिकार को लेकर चिंता
प्रदर्शनकारियों की डिजिटल और निजी जानकारी को लेकर भी अदालत के सामने चिंता जताई गई। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन से जुड़े सीसीटीवी, ड्रोन, शरीर पर लगे कैमरों और वायरलेस संदेशों की रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था। साथ ही प्रदर्शनकारियों के निजी आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं करने को कहा गया था। अब चेहरे की पहचान और आधार से जुड़े सवालों के उठने के बाद मामले में निजता और निगरानी का पहलू भी महत्वपूर्ण हो गया है।

जांच के लिए विशेष दल बनाने पर भी नजर
एक याचिकाकर्ता की ओर से मामले की जांच की निगरानी के लिए पूर्व प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति बनाने की मांग भी की गई। अदालत ने इस मुद्दे पर विचार करने के संकेत दिए हैं। 28 जुलाई की सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की जरूरत पर जोर दिया था और पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अगुवाई में विशेष जांच दल बनाने की संभावना पर विचार किया था।

केंद्र का दावा- गंभीर मामलों में प्राथमिकी वापस नहीं होगी
केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि बलात्कार, हत्या और बाल यौन अपराध संरक्षण कानून जैसे गंभीर मामलों में पहले से आपराधिक रिकॉर्ड रखने वाले लोगों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी वापस नहीं ली जाएगी। सरकार ने ऐसे 2,700 से अधिक लोगों का जिक्र किया है। हालांकि अदालत के सामने यह भी स्पष्ट हुआ कि केवल पुराने आपराधिक रिकॉर्ड के आधार पर हर प्रदर्शनकारी को गंभीर अपराधी मानने के बजाय मामलों की प्रकृति और आरोपों को देखना जरूरी होगा।

19 अगस्त को फिर होगी अहम सुनवाई
अब इस मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त को होगी। उस दिन अदालत विशेष जांच दल के गठन, पुलिस कार्रवाई की जांच, पैलेट गन के इस्तेमाल और प्राथमिकी वापस लेने की प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर आगे सुनवाई कर सकती है। केंद्र और राज्यों से यह भी पूछा जा सकता है कि अब तक कितनी प्राथमिकी वापस लेने या बंद करने की प्रक्रिया शुरू की गई है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी से एक बात साफ हो गई है कि अदालत शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों और गंभीर अपराध के आरोपियों के बीच अंतर कर रही है। छोटे मामलों या केवल राजनीतिक विरोध के कारण दर्ज मामलों में राहत की संभावना बनी हुई है, लेकिन हत्या जैसे गंभीर और जघन्य अपराधों के आरोपियों को संरक्षण नहीं मिलेगा। दूसरी ओर, पुलिस कार्रवाई में कथित ज्यादती, पैलेट गन के इस्तेमाल और प्रदर्शनकारियों की निगरानी के आरोपों की जांच भी अदालत की निगरानी में आगे बढ़ सकती है। अब 19 अगस्त की सुनवाई पर सबकी नजर रहेगी, जहां इस पूरे मामले की अगली दिशा और जांच की तस्वीर और साफ हो सकती है।

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