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आकैंसर से जूझ रही महिला की रीढ़ का बिना बड़े ऑपरेशन इलाज, 15 मिनट में दर्द से मिली राहत

By Malay Ojha | Published: 16 September 2026 at 06:50 PM

ओवेरियन कैंसर का इलाज करा रहीं 70 वर्षीय महिला के लिए गिरने के बाद रीढ़ की हड्डी में हुआ फ्रैक्चर बेहद दर्दनाक हो गया था। पटना के फोर्ड हॉस्पिटल में जांच के दौरान L1 वर्टिब्रा में फ्रैक्चर सामने आया। मरीज की उम्र, कैंसर का इलाज और कम हीमोग्लोबिन देखते हुए डॉक्टरों ने बड़े ऑपरेशन के बजाय मिनीमली इनवेसिव तकनीक से इलाज किया।

राधे कृष्णा नगर, पिपरा निवासी मरीज को तेज दर्द के बाद अस्पताल लाया गया था। जांच में फ्रैक्चर की पुष्टि होने के बाद स्पाइन सर्जन डॉ. मणि आनंद ने वर्टिब्रोप्लास्टी का फैसला लिया। इस प्रक्रिया में एक सुई के जरिए फ्रैक्चर वाली रीढ़ की हड्डी में बोन सीमेंट डाला गया। वर्टिब्रोप्लास्टी में इसी तरह सुई के माध्यम से सीमेंट डालकर कमजोर या फ्रैक्चर हुए वर्टिब्रा को स्थिर करने और दर्द कम करने की कोशिश की जाती है।

लोकल एनेस्थीसिया में पूरी हुई प्रक्रिया
अस्पताल के मुताबिक, मरीज को लोकल एनेस्थीसिया देकर प्रक्रिया की गई। करीब 15 मिनट में उपचार पूरा हो गया। प्रक्रिया के बाद मरीज के दर्द में पूरी तरह राहत मिली। खास बात यह रही कि किसी बड़े चीरे या पारंपरिक सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ी। मेडिकल गाइडलाइंस के मुताबिक वर्टिब्रोप्लास्टी एक मिनीमली इनवेसिव प्रक्रिया है, जिसमें फ्रैक्चर वाले वर्टिब्रा में बोन सीमेंट इंजेक्ट किया जाता है।

कैंसर मरीज होने के कारण चुनी गई तकनीक
डॉ. मणि आनंद ने बताया कि मरीज पहले से ओवेरियन कैंसर का इलाज करा रही थीं और उनकी कीमोथेरेपी चल रही थी। उनका हीमोग्लोबिन भी कम था। ऐसे में मरीज की पूरी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए कम जोखिम वाली मिनीमली इनवेसिव तकनीक से उपचार किया गया। कैंसर की वजह से भी रीढ़ की हड्डियां कमजोर होकर फ्रैक्चर का शिकार हो सकती हैं, ऐसे मामलों में वर्टिब्रोप्लास्टी या काइफोप्लास्टी का इस्तेमाल किया जाता है।

एक दिन में अस्पताल से मिली छुट्टी
इलाज के बाद मरीज की स्थिति में सुधार हुआ और दर्द से राहत मिलने के बाद उन्हें एक दिन के भीतर अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया। अस्पताल के अनुसार, अब मरीज स्वस्थ हैं। वर्टिब्रोप्लास्टी के बाद कई मरीजों में दर्द में तेजी से राहत देखी जाती है, हालांकि प्रक्रिया का फैसला मरीज की जांच और उसकी मेडिकल स्थिति के आधार पर किया जाता है।

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आकैंसर से जूझ रही महिला की रीढ़ का बिना बड़े ऑपरेशन इलाज, 15 मिनट में दर्द से मिली राहत

By Malay Ojha | Published: 16 September 2026 at 06:50 PM

ओवेरियन कैंसर का इलाज करा रहीं 70 वर्षीय महिला के लिए गिरने के बाद रीढ़ की हड्डी में हुआ फ्रैक्चर बेहद दर्दनाक हो गया था। पटना के फोर्ड हॉस्पिटल में जांच के दौरान L1 वर्टिब्रा में फ्रैक्चर सामने आया। मरीज की उम्र, कैंसर का इलाज और कम हीमोग्लोबिन देखते हुए डॉक्टरों ने बड़े ऑपरेशन के बजाय मिनीमली इनवेसिव तकनीक से इलाज किया।

राधे कृष्णा नगर, पिपरा निवासी मरीज को तेज दर्द के बाद अस्पताल लाया गया था। जांच में फ्रैक्चर की पुष्टि होने के बाद स्पाइन सर्जन डॉ. मणि आनंद ने वर्टिब्रोप्लास्टी का फैसला लिया। इस प्रक्रिया में एक सुई के जरिए फ्रैक्चर वाली रीढ़ की हड्डी में बोन सीमेंट डाला गया। वर्टिब्रोप्लास्टी में इसी तरह सुई के माध्यम से सीमेंट डालकर कमजोर या फ्रैक्चर हुए वर्टिब्रा को स्थिर करने और दर्द कम करने की कोशिश की जाती है।

लोकल एनेस्थीसिया में पूरी हुई प्रक्रिया
अस्पताल के मुताबिक, मरीज को लोकल एनेस्थीसिया देकर प्रक्रिया की गई। करीब 15 मिनट में उपचार पूरा हो गया। प्रक्रिया के बाद मरीज के दर्द में पूरी तरह राहत मिली। खास बात यह रही कि किसी बड़े चीरे या पारंपरिक सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ी। मेडिकल गाइडलाइंस के मुताबिक वर्टिब्रोप्लास्टी एक मिनीमली इनवेसिव प्रक्रिया है, जिसमें फ्रैक्चर वाले वर्टिब्रा में बोन सीमेंट इंजेक्ट किया जाता है।

कैंसर मरीज होने के कारण चुनी गई तकनीक
डॉ. मणि आनंद ने बताया कि मरीज पहले से ओवेरियन कैंसर का इलाज करा रही थीं और उनकी कीमोथेरेपी चल रही थी। उनका हीमोग्लोबिन भी कम था। ऐसे में मरीज की पूरी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए कम जोखिम वाली मिनीमली इनवेसिव तकनीक से उपचार किया गया। कैंसर की वजह से भी रीढ़ की हड्डियां कमजोर होकर फ्रैक्चर का शिकार हो सकती हैं, ऐसे मामलों में वर्टिब्रोप्लास्टी या काइफोप्लास्टी का इस्तेमाल किया जाता है।

एक दिन में अस्पताल से मिली छुट्टी
इलाज के बाद मरीज की स्थिति में सुधार हुआ और दर्द से राहत मिलने के बाद उन्हें एक दिन के भीतर अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया। अस्पताल के अनुसार, अब मरीज स्वस्थ हैं। वर्टिब्रोप्लास्टी के बाद कई मरीजों में दर्द में तेजी से राहत देखी जाती है, हालांकि प्रक्रिया का फैसला मरीज की जांच और उसकी मेडिकल स्थिति के आधार पर किया जाता है।

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