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मानसरत्न डॉ. श्रीनाथ मिश्र की हीरक जयंती पर जुटे देशभर के विद्वान, मानस और संस्कृत जगत में योगदान को किया याद

By aryavartalive | Published: 04 October 2026 at 06:13 PM

वाराणसी। रविंद्रपुरी स्थित श्रीनाथ भक्ति संस्थान के सभागार में रविवार को मानसरत्न डॉ. श्रीनाथ मिश्र की हीरक जयंती के अवसर पर विद्वत संगोष्ठी आयोजित की गई। काशी विद्वत परिषद न्यास के तत्वावधान में हुए कार्यक्रम में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए विद्वानों ने डॉ. श्रीनाथ मिश्र के साहित्य, मानस और संस्कृत के क्षेत्र में योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी।

संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में ब्रह्मचारी शंभूप्रेमानंद जी महाराज ने कहा कि गुरु और गौमाता के प्रति सच्ची निष्ठा रखना ही डॉ. श्रीनाथ मिश्र के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में धर्म और राष्ट्र संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में सनातन धर्मावलंबियों को एकजुट होकर विवेक और सद्बुद्धि के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है।

मानस जगत में योगदान को बताया अतुलनीय
प्रो. शैलेश तिवारी ने कहा कि मानस जगत में डॉ. श्रीनाथ मिश्र का योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने अपने लेखन के जरिए रामचरितमानस के अध्ययन को समृद्ध किया। उनकी लिखी पुस्तकों में ‘विजया टीका’ का विशेष स्थान है।

संस्कृत ज्ञान के बिना मानस का मर्म समझना कठिन
प्रो. कमलाकांत त्रिपाठी ने कहा कि संस्कृत शास्त्रों की जानकारी के बिना मानस के गहरे अर्थ को समझना कठिन है। उन्होंने कहा कि डॉ. श्रीनाथ मिश्र केवल मानस के विद्वान ही नहीं, बल्कि संस्कृत जगत के भी महत्वपूर्ण विद्वान थे। उनके योगदान को याद करना सभी के लिए गौरव की बात है।

ज्ञान के बावजूद अहंकार से दूर रहे श्रीनाथ मिश्र
काशी विद्वत परिषद न्यास के अध्यक्ष परमेश्वर दत्त शुक्ल ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. श्रीनाथ मिश्र के व्यक्तित्व को याद किया। उन्होंने कहा कि यश और ज्ञान मिलने के बाद अक्सर व्यक्ति में अहंकार आ जाता है, लेकिन श्रीनाथ जी इसके बिल्कुल विपरीत थे। भरत जी की तरह उनके व्यक्तित्व में भी अहंकार का कोई स्थान नहीं था।

परिवारजनों का किया गया सम्मान
कार्यक्रम के दौरान डॉ. श्रीनाथ मिश्र के सुपुत्र सुरेंद्र नाथ मिश्र सहित परिवार के अन्य सदस्यों का सम्मान किया गया। इस दौरान श्रीश दत्त शुक्ल ने अभिनंदन पत्र का वाचन किया। संगोष्ठी में ब्रह्मचारी परमात्मानंद, डॉ. गिरीश तिवारी, संजय पाण्डेय, पुरंदर व्यास, राघवेंद्र पाण्डेय, रामकृष्ण तिवारी, योगेश ब्रह्मचारी, कृष्ण कुमार खेमका, कवि जय प्रकाश शुक्ल समेत कई विद्वान मौजूद रहे। संस्कृत विद्यालयों के छात्रों और श्रीनाथ मिश्र के परिवार के सदस्यों समेत बड़ी संख्या में लोग कार्यक्रम में शामिल हुए।

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मानसरत्न डॉ. श्रीनाथ मिश्र की हीरक जयंती पर जुटे देशभर के विद्वान, मानस और संस्कृत जगत में योगदान को किया याद

By aryavartalive | Published: 04 October 2026 at 06:13 PM

वाराणसी। रविंद्रपुरी स्थित श्रीनाथ भक्ति संस्थान के सभागार में रविवार को मानसरत्न डॉ. श्रीनाथ मिश्र की हीरक जयंती के अवसर पर विद्वत संगोष्ठी आयोजित की गई। काशी विद्वत परिषद न्यास के तत्वावधान में हुए कार्यक्रम में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए विद्वानों ने डॉ. श्रीनाथ मिश्र के साहित्य, मानस और संस्कृत के क्षेत्र में योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी।

संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में ब्रह्मचारी शंभूप्रेमानंद जी महाराज ने कहा कि गुरु और गौमाता के प्रति सच्ची निष्ठा रखना ही डॉ. श्रीनाथ मिश्र के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में धर्म और राष्ट्र संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में सनातन धर्मावलंबियों को एकजुट होकर विवेक और सद्बुद्धि के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है।

मानस जगत में योगदान को बताया अतुलनीय
प्रो. शैलेश तिवारी ने कहा कि मानस जगत में डॉ. श्रीनाथ मिश्र का योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने अपने लेखन के जरिए रामचरितमानस के अध्ययन को समृद्ध किया। उनकी लिखी पुस्तकों में ‘विजया टीका’ का विशेष स्थान है।

संस्कृत ज्ञान के बिना मानस का मर्म समझना कठिन
प्रो. कमलाकांत त्रिपाठी ने कहा कि संस्कृत शास्त्रों की जानकारी के बिना मानस के गहरे अर्थ को समझना कठिन है। उन्होंने कहा कि डॉ. श्रीनाथ मिश्र केवल मानस के विद्वान ही नहीं, बल्कि संस्कृत जगत के भी महत्वपूर्ण विद्वान थे। उनके योगदान को याद करना सभी के लिए गौरव की बात है।

ज्ञान के बावजूद अहंकार से दूर रहे श्रीनाथ मिश्र
काशी विद्वत परिषद न्यास के अध्यक्ष परमेश्वर दत्त शुक्ल ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. श्रीनाथ मिश्र के व्यक्तित्व को याद किया। उन्होंने कहा कि यश और ज्ञान मिलने के बाद अक्सर व्यक्ति में अहंकार आ जाता है, लेकिन श्रीनाथ जी इसके बिल्कुल विपरीत थे। भरत जी की तरह उनके व्यक्तित्व में भी अहंकार का कोई स्थान नहीं था।

परिवारजनों का किया गया सम्मान
कार्यक्रम के दौरान डॉ. श्रीनाथ मिश्र के सुपुत्र सुरेंद्र नाथ मिश्र सहित परिवार के अन्य सदस्यों का सम्मान किया गया। इस दौरान श्रीश दत्त शुक्ल ने अभिनंदन पत्र का वाचन किया। संगोष्ठी में ब्रह्मचारी परमात्मानंद, डॉ. गिरीश तिवारी, संजय पाण्डेय, पुरंदर व्यास, राघवेंद्र पाण्डेय, रामकृष्ण तिवारी, योगेश ब्रह्मचारी, कृष्ण कुमार खेमका, कवि जय प्रकाश शुक्ल समेत कई विद्वान मौजूद रहे। संस्कृत विद्यालयों के छात्रों और श्रीनाथ मिश्र के परिवार के सदस्यों समेत बड़ी संख्या में लोग कार्यक्रम में शामिल हुए।

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