Friday, June 19, 2026

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अब सड़क पर पैदल चलने वालों का हक सबसे ऊपर, सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को दिया साफ संदेश

By Malay Ojha | Published: 19 June 2026 at 06:00 PM

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पैदल चलने वालों के अधिकार को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि फुटपाथ पर चलना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। अदालत ने साफ कहा कि सड़कों पर गाड़ियों की रफ्तार और आवाजाही से ऊपर पैदल यात्रियों की सुरक्षा और उनका अधिकार रखा जाना चाहिए। यह फैसला देशभर के शहरों में बढ़ते अतिक्रमण और फुटपाथों की बदहाल हालत के बीच बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अदालत ने कहा कि पैदल चलना केवल रोजमर्रा की जरूरत नहीं, बल्कि यह संविधान के तहत नागरिकों को मिली आजादी का हिस्सा है। अदालत के मुताबिक किसी भी नागरिक को सुरक्षित तरीके से आने-जाने और रास्तों का इस्तेमाल करने का पूरा हक है। अगर फुटपाथ सुरक्षित नहीं हैं या उन पर कब्जा है, तो यह सीधे नागरिकों के अधिकारों पर असर डालता है।

संविधान से जोड़ा गया अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद उन्नीस के तहत मिलने वाली स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है। अदालत ने स्पष्ट किया कि देश के किसी भी हिस्से में स्वतंत्र रूप से घूमना और सुरक्षित चलना नागरिकों की मूल स्वतंत्रता का हिस्सा है। यही वजह है कि पैदल यात्रियों के लिए बने रास्तों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

जीवन और स्वतंत्रता से भी संबंध
अदालत ने यह भी कहा कि पैदल चलने का अधिकार केवल आवाजाही तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार से भी जुड़ा है। यदि किसी व्यक्ति को सड़क पर सुरक्षित चलने की जगह नहीं मिलती, तो यह उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा असर डालता है। इसीलिए सरकारों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

फुटपाथ सिर्फ नाम के नहीं होने चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेशों का जिक्र करते हुए कहा कि केवल फुटपाथ बना देना ही काफी नहीं है। उन्हें अतिक्रमण से मुक्त रखना, दिव्यांगजनों के लिए उपयोगी बनाना और सुरक्षित बनाए रखना भी जरूरी है। अदालत ने कहा कि शहरों में अक्सर फुटपाथों पर दुकानें, गाड़ियां और अन्य कब्जे देखे जाते हैं, जिससे पैदल यात्रियों को सड़क पर चलना पड़ता है और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।

राज्यों और नगर निकायों की जिम्मेदारी
इस फैसले के बाद अब राज्यों और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि नगर निकायों और सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि फुटपाथ आम लोगों के लिए सुरक्षित और खुले रहें। अगर ऐसा नहीं होता है तो यह संवैधानिक जिम्मेदारी में लापरवाही मानी जा सकती है।

क्यों अहम है यह फैसला
देश के बड़े शहरों में अक्सर पैदल चलना मुश्किल होता जा रहा है। कहीं फुटपाथ टूटे पड़े हैं तो कहीं उन पर अवैध कब्जा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लाखों लोगों के लिए राहत लेकर आया है। यह फैसला उन लोगों के लिए भी अहम है जो रोजाना स्कूल, दफ्तर या बाजार जाने के लिए पैदल रास्तों पर निर्भर रहते हैं।

आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर
कानूनी जानकारों का मानना है कि इस फैसले के बाद अब आम लोग फुटपाथों पर कब्जे या उनकी खराब हालत को लेकर प्रशासन के खिलाफ मजबूत आधार पर आवाज उठा सकेंगे। इससे शहरों की योजना और सड़क सुरक्षा व्यवस्था में भी बदलाव देखने को मिल सकता है।

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अब सड़क पर पैदल चलने वालों का हक सबसे ऊपर, सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को दिया साफ संदेश

By Malay Ojha | Published: 19 June 2026 at 06:00 PM

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पैदल चलने वालों के अधिकार को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि फुटपाथ पर चलना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। अदालत ने साफ कहा कि सड़कों पर गाड़ियों की रफ्तार और आवाजाही से ऊपर पैदल यात्रियों की सुरक्षा और उनका अधिकार रखा जाना चाहिए। यह फैसला देशभर के शहरों में बढ़ते अतिक्रमण और फुटपाथों की बदहाल हालत के बीच बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अदालत ने कहा कि पैदल चलना केवल रोजमर्रा की जरूरत नहीं, बल्कि यह संविधान के तहत नागरिकों को मिली आजादी का हिस्सा है। अदालत के मुताबिक किसी भी नागरिक को सुरक्षित तरीके से आने-जाने और रास्तों का इस्तेमाल करने का पूरा हक है। अगर फुटपाथ सुरक्षित नहीं हैं या उन पर कब्जा है, तो यह सीधे नागरिकों के अधिकारों पर असर डालता है।

संविधान से जोड़ा गया अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद उन्नीस के तहत मिलने वाली स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है। अदालत ने स्पष्ट किया कि देश के किसी भी हिस्से में स्वतंत्र रूप से घूमना और सुरक्षित चलना नागरिकों की मूल स्वतंत्रता का हिस्सा है। यही वजह है कि पैदल यात्रियों के लिए बने रास्तों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

जीवन और स्वतंत्रता से भी संबंध
अदालत ने यह भी कहा कि पैदल चलने का अधिकार केवल आवाजाही तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार से भी जुड़ा है। यदि किसी व्यक्ति को सड़क पर सुरक्षित चलने की जगह नहीं मिलती, तो यह उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा असर डालता है। इसीलिए सरकारों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

फुटपाथ सिर्फ नाम के नहीं होने चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेशों का जिक्र करते हुए कहा कि केवल फुटपाथ बना देना ही काफी नहीं है। उन्हें अतिक्रमण से मुक्त रखना, दिव्यांगजनों के लिए उपयोगी बनाना और सुरक्षित बनाए रखना भी जरूरी है। अदालत ने कहा कि शहरों में अक्सर फुटपाथों पर दुकानें, गाड़ियां और अन्य कब्जे देखे जाते हैं, जिससे पैदल यात्रियों को सड़क पर चलना पड़ता है और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।

राज्यों और नगर निकायों की जिम्मेदारी
इस फैसले के बाद अब राज्यों और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि नगर निकायों और सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि फुटपाथ आम लोगों के लिए सुरक्षित और खुले रहें। अगर ऐसा नहीं होता है तो यह संवैधानिक जिम्मेदारी में लापरवाही मानी जा सकती है।

क्यों अहम है यह फैसला
देश के बड़े शहरों में अक्सर पैदल चलना मुश्किल होता जा रहा है। कहीं फुटपाथ टूटे पड़े हैं तो कहीं उन पर अवैध कब्जा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लाखों लोगों के लिए राहत लेकर आया है। यह फैसला उन लोगों के लिए भी अहम है जो रोजाना स्कूल, दफ्तर या बाजार जाने के लिए पैदल रास्तों पर निर्भर रहते हैं।

आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर
कानूनी जानकारों का मानना है कि इस फैसले के बाद अब आम लोग फुटपाथों पर कब्जे या उनकी खराब हालत को लेकर प्रशासन के खिलाफ मजबूत आधार पर आवाज उठा सकेंगे। इससे शहरों की योजना और सड़क सुरक्षा व्यवस्था में भी बदलाव देखने को मिल सकता है।

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