By Malay Ojha | Published: 17 June 2026 at 10:14 PM
सनातन धर्म में चातुर्मास को भक्ति, तप और आत्मसंयम का विशेष काल माना जाता है। इस वर्ष चातुर्मास की शुरुआत 25 जुलाई से होने जा रही है। देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में प्रवेश करेंगे और इसके साथ ही अगले 119 दिनों तक विवाह, गृह प्रवेश, सगाई, मुंडन और अन्य शुभ कार्यों पर विराम लग जाएगा। यह अवधि 20 नवंबर को देवउठनी एकादशी के साथ समाप्त होगी।
चातुर्मास शुरू होते ही धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु विश्राम अवस्था में चले जाते हैं। इसी कारण इस अवधि को मांगलिक कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण, उपनयन संस्कार और अन्य शुभ आयोजन आमतौर पर इस दौरान नहीं किए जाते हैं। यही वजह है कि लाखों परिवार अपने शुभ कार्यों की योजना चातुर्मास समाप्त होने के बाद बनाते हैं।
कब से कब तक रहेगा चातुर्मास?
वैदिक पंचांग के अनुसार चातुर्मास का आरंभ आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से होता है। वर्ष 2026 में यह तिथि 25 जुलाई को पड़ रही है। इसी दिन से भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाएंगे। चार महीने बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी पर चातुर्मास का समापन होगा। इस वर्ष देवउठनी एकादशी 20 नवंबर को है। इस प्रकार यह अवधि कुल 119 दिनों तक चलेगी।
देवशयनी एकादशी का क्या है महत्व?
धार्मिक ग्रंथों में देवशयनी एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इसी दिन से भगवान विष्णु चार माह के विश्राम पर चले जाते हैं। इस अवधि में भक्त विशेष रूप से पूजा-पाठ, जप, तप, दान और धार्मिक अनुष्ठानों में समय बिताते हैं। कई श्रद्धालु चातुर्मास के दौरान विशेष व्रत और नियमों का भी पालन करते हैं।
चातुर्मास में क्यों बढ़ जाता है धार्मिक महत्व?
चातुर्मास को आध्यात्मिक साधना का सर्वोत्तम समय माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दौरान किए गए जप, तप, दान और पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि संत, महात्मा और साधु-संत भी इन चार महीनों में एक स्थान पर रहकर साधना करने को प्राथमिकता देते हैं।
इन चार महीनों में आते हैं बड़े पर्व
चातुर्मास केवल धार्मिक अनुशासन का समय नहीं है, बल्कि इसी दौरान हिंदू धर्म के कई प्रमुख पर्व भी मनाए जाते हैं। श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक मास की अवधि में सावन, रक्षाबंधन, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, पितृ पक्ष, शारदीय नवरात्रि, दशहरा और दीपावली जैसे बड़े त्योहार आते हैं।
सावन से दीपावली तक रहता है उत्सवों का दौर
चातुर्मास शुरू होने के कुछ दिनों बाद सावन मास आरंभ होता है, जिसे भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र महीना माना जाता है। इसके बाद लगातार कई प्रमुख पर्व आते हैं। यही कारण है कि चातुर्मास को धार्मिक गतिविधियों का सबसे व्यस्त काल भी कहा जाता है।
क्या है भगवान विष्णु की योगनिद्रा की कथा?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु पाताल लोक के राजा बलि के यहां विश्राम करने जाते हैं। चार महीने तक वे योगनिद्रा में रहते हैं। इस दौरान सृष्टि का संचालन देव शक्तियों और निर्धारित व्यवस्था के अनुसार चलता रहता है। देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु पुनः जागते हैं और संसार के कार्यों का संचालन संभालते हैं।
देवउठनी एकादशी के बाद फिर शुरू होते हैं विवाह
देवउठनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास समाप्त हो जाता है। इसी दिन से विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण और अन्य मांगलिक कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त फिर शुरू हो जाते हैं। देशभर में लाखों परिवार इसी दिन के बाद अपने रुके हुए शुभ कार्यों को पूरा करते हैं।
श्रद्धालुओं के लिए क्यों खास है यह अवधि?
धार्मिक दृष्टि से चातुर्मास आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर माना जाता है। इस दौरान संयमित जीवन, सात्विक भोजन, धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन और भगवान के नाम का स्मरण करने पर विशेष बल दिया जाता है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इन चार महीनों में नियमपूर्वक पूजा और साधना करता है, उसे विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
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