By Malay Ojha | Published: 03 October 2026 at 05:49 AM
संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से रखा जाने वाला जितिया व्रत इस बार 3 अक्टूबर, शनिवार को है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और मिथिलांचल में इस व्रत को लेकर खास उत्साह रहता है। व्रती महिलाएं इस दिन अन्न और पानी का त्याग कर निर्जला उपवास रखती हैं।
जितिया से एक दिन पहले 2 अक्टूबर को नहाय-खाय की परंपरा निभाई गई। इसके बाद रात में ओठगन या सरगही की रस्म होती है। परंपरा के अनुसार, भोर में करीब 4 बजे से पहले सरगही कर ली जाती है। इसके बाद व्रती महिलाएं निर्जला व्रत शुरू करती हैं।
4 अक्टूबर को होगा पारण
3 अक्टूबर को पूरे दिन व्रत रखने के बाद 4 अक्टूबर की सुबह पारण किया जाएगा। दी गई जानकारी के अनुसार, अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद सुबह 7:38 बजे के बाद पारण का समय माना गया है। अलग-अलग स्थानों पर पंचांग के अनुसार समय में थोड़ा अंतर हो सकता है।
जीमूतवाहन की होती है पूजा
जितिया व्रत में भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जीमूतवाहन ने एक नाग की जान बचाने के लिए खुद को गरुड़ देव के सामने समर्पित कर दिया था। उनके त्याग से प्रसन्न होकर गरुड़ ने उन्हें और नाग को जीवनदान दिया। इसी कथा से व्रत में संतान की रक्षा और लंबी उम्र की कामना जुड़ी मानी जाती है।
चील्ह-सियारिन की भी पूजा
व्रत के दौरान जीमूतवाहन के साथ चील्ह और सियारिन की पूजा करने की भी लोकपरंपरा है। कई जगह महिलाएं मिट्टी या गोबर से दोनों की आकृति बनाती हैं और उन्हें भोग चढ़ाती हैं। लोककथा में चील्ह को नियम से व्रत करने वाली और सियारिन को व्रत पूरा न कर पाने वाली महिला के रूप में बताया जाता है।
नहाय-खाय में मडुआ और साग क्यों?
जितिया की क्षेत्रीय परंपराओं में नहाय-खाय के भोजन में मडुआ की रोटी, नोनी साग और सतपुतिया का खास महत्व बताया जाता है। लोकमान्यता में नोनी साग को परिवार के बढ़ने और मडुआ को ताकत से जोड़ा जाता है। मडुआ में फाइबर, कैल्शियम और आयरन जैसे पोषक तत्व भी पाए जाते हैं, इसलिए इसे व्रत से पहले पौष्टिक भोजन माना जाता है।
कुछ इलाकों में मछली खाने की परंपरा
बिहार के मिथिलांचल, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में जितिया से पहले मछली खाने की भी लोकपरंपरा है। यह सामान्य पूजा-पाठ से पहले मांसाहार से बचने वाली मान्यता से अलग क्षेत्रीय रिवाज है। कुछ परिवार इसे शुभ और पारंपरिक भोजन मानते हैं।
शाकाहारी परिवारों में क्या होता है?
जिन परिवारों में मछली नहीं खाई जाती, वहां मडुआ की रोटी, नोनी या कर्मी का साग और दूसरे पारंपरिक शाकाहारी भोजन का सेवन किया जाता है। यानी मछली खाना जितिया की अनिवार्य परंपरा नहीं है, बल्कि कुछ क्षेत्रों में प्रचलित लोकरीति है।
व्रत के बाद क्या खाया जाता है?
पारण के बाद कई जगह केराउ, गाय के दूध और नोनी साग जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों से व्रत खोलने की परंपरा है। हालांकि, पूजा और पारण की विधि परिवार तथा स्थानीय परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
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