By aryavartalive | Published: 23 January 2026 at 02:20 AM
ज्ञान एवं कला की अधिष्ठात्री मां सरस्वती जीवन का सार तत्व हैं अन्यथा शरीर तो हाड़-मांस मात्र है। उनकी कृपा से ही जीवन को आनंदमय आयाम मिलता है। इनसे सृजनशीलता, व्यावहारिक कुशलता एवं कर्त्तव्य परायणता वर के रूप में प्राप्य है। सरस्वती शब्द संस्कृत के सार (सार) एवं स्व (स्वयं) से बना है जिसका मतलब ही आत्मज्ञान का सार है जो तटस्थ आत्मावलोकन को बढ़ावा देती है, और यही आत्मबोध तो जीवन का रस है, मुक्ति का मार्ग भी है। कहते भी हैं “सा विद्या या विमुक्तये” – विद्या वो जो अहंकार से, व्यसनों से, अज्ञानता से, रूढ़िवादिता से मुक्ति दिलाये। सार्थक एवं संतुलित जीवन के लिए मां सरस्वती की उपासना फलदायी है।
सरस्वती पूजा माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है। विद्यार्थियों एवं कला प्रेमियों के लिए ये खास दिन है। ये दिन बसंत ऋतु के आगमन का सूचक भी है। प्रकृति यौवन पा कर झूम उठती है और जीवन में ऊर्जा का नवसंचार हो जाता है। हंस पर आसीन, वरद-हस्त में वीणा और पुस्तक, वात्सल्य से ओत-प्रोत मुद्रा मन को बरबस मोह ही लेता है। मान्यता है कि सृष्टि निर्माता ब्रह्मा ने मानव का निर्माण किया एवं मां सरस्वती ने मानव को बोलने, लिखने एवं पढ़ने का ज्ञान प्रदान किया। तब से ही मां सरस्वती की पूजा ज्ञान एवं कला की निर्मात्री देवी के रूप में होती है। ये एक मार्गदर्शक शक्ति हैं जो सौम्यता और समरूपता में जीने का मंत्र सिखाती है।
सरस्वती पूजा उत्सवी उमंगो के बीच ज्ञान, रचनात्मकता और अध्यात्म के बीच सम्पूर्ण समन्वय साधते हुए निरंतर प्रगतिशीलता का सन्देश भी देता है। वैचारिक सकारात्मकता, वाणी में मधुरता, कर्म में निश्छलता को अपनाना ही सरस्वती पूजा है। ये पूजन आतंरिक शांति, मानसिक विवेक और कर्मयोग का पाठ सिखाती है। साथ ही साथ, हमें अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से भी जोड़ती है।
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