Friday, June 12, 2026

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बाढ़-लू की रिपोर्टिंग पर बड़ा संदेश, बच्चों और महिलाओं के मुद्दे छूटे तो अधूरी रहेगी खबर

By Malay Ojha | Published: 12 June 2026 at 05:34 PM

बाढ़, सूखा और भीषण गर्मी जैसी जलवायु आपदाएं अब पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी और गंभीरता के साथ सामने आ रही हैं। इन आपदाओं का सबसे ज्यादा असर बच्चों, किशोरियों और महिलाओं पर पड़ता है, लेकिन अक्सर उनकी समस्याएं खबरों की मुख्य धारा में जगह नहीं बना पातीं। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए यूनिसेफ और बिहार सरकार ने पत्रकारों और संचार से जुड़े लोगों के लिए एक विशेष मीडिया कार्यशाला आयोजित की, जिसमें जिम्मेदार और संवेदनशील रिपोर्टिंग पर जोर दिया गया।

कार्यशाला में समाचार पत्र, टीवी, डिजिटल मंचों से जुड़े पत्रकारों, सामाजिक माध्यमों पर सक्रिय कंटेंट निर्माताओं, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों तथा विभिन्न सरकारी विभागों के जनसंपर्क पदाधिकारियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य आपदा के समय आम लोगों तक सही, भरोसेमंद और उपयोगी जानकारी पहुंचाने वाले सभी पक्षों को एक मंच पर लाना था, ताकि संकट के समय बेहतर संवाद और समन्वय सुनिश्चित किया जा सके।

आपदा से निपटने की तैयारी लगातार मजबूत कर रही सरकार
बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के संयुक्त सचिव मोहम्मद नदीमुल गफ्फार सिद्दीकी ने बताया कि राज्य में बाढ़, लू और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए तैयारियों को लगातार मजबूत किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि समय रहते चेतावनी देने वाली व्यवस्था, जिला और प्रखंड स्तर पर तैयारी तथा विभिन्न विभागों के बीच बेहतर तालमेल पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

अफवाहों से बचाने में मीडिया की बड़ी भूमिका
उन्होंने कहा कि किसी भी आपदा के दौरान गलत जानकारी और अफवाहें स्थिति को और गंभीर बना सकती हैं। ऐसे समय में मीडिया की जिम्मेदारी केवल खबर देना नहीं, बल्कि सत्यापित जानकारी लोगों तक पहुंचाना भी है। उन्होंने पत्रकारों से राहत और बचाव कार्यों में जुटे कर्मचारियों और स्वयंसेवकों के प्रयासों को भी प्रमुखता से सामने लाने की अपील की।

खबरों से गायब रह जाती हैं असली मानवीय कहानियां
यूनिसेफ बिहार की फील्ड कार्यालय प्रमुख डॉ. मोनिका नील्सन ने कहा कि हर जलवायु संकट के केंद्र में बच्चे और महिलाएं होती हैं, लेकिन उनकी वास्तविक परेशानियां अक्सर रिपोर्टिंग में पीछे छूट जाती हैं। उन्होंने कहा कि स्कूल छोड़ने को मजबूर होती किशोरियां, स्वास्थ्य सेवाओं तक नहीं पहुंच पाने वाली गर्भवती महिलाएं और टीकाकरण से वंचित बच्चे जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।

पत्रकारिता केवल आंकड़े नहीं, इंसानी कहानियां भी बताए
डॉ. नील्सन ने कहा कि मीडिया की ताकत केवल आंकड़े बताने में नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी मानवीय कहानियों को सामने लाने में है। उन्होंने बिहार के पत्रकारों की सराहना करते हुए कहा कि बीते वर्षों में बाल पोषण, टीकाकरण, नवजात स्वास्थ्य और बाल सुरक्षा जैसे विषयों को समाज तक पहुंचाने में मीडिया ने अहम भूमिका निभाई है।

आपदा रिपोर्टिंग में नैतिकता सबसे जरूरी
कार्यशाला के तकनीकी सत्र में संकट के समय रिपोर्टिंग से जुड़े व्यावहारिक और नैतिक पहलुओं पर चर्चा की गई। मीडिया एवं संचार विशेषज्ञ मीनती चकलानवीस ने कहा कि किसी भी आपदा की रिपोर्टिंग करते समय प्रभावित लोगों की गरिमा और सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

बच्चों की पहचान उजागर करने से बचने की सलाह
उन्होंने पत्रकारों को सलाह दी कि बच्चों से जुड़ी खबरों में उनकी पहचान की गोपनीयता बनाए रखें और किसी भी जानकारी को प्रकाशित करने से पहले उचित सहमति जरूर लें। उन्होंने यह भी कहा कि सनसनी फैलाने वाली प्रस्तुति से बचना पत्रकारिता की मूल जिम्मेदारी है।

जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का नहीं, सामाजिक मुद्दा भी
यूनिसेफ के जल, स्वच्छता और स्वास्थ्य विशेषज्ञ सुधाकर रेड्डी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल मौसम तक सीमित नहीं है। इसका सीधा प्रभाव बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। बढ़ते तापमान, अनियमित बारिश और बाढ़ जैसी घटनाओं के कारण पेयजल स्रोत प्रभावित होते हैं, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

बच्चों के अधिकारों से जुड़ा है जलवायु संकट
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरणीय समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह बच्चों के अधिकारों, सुरक्षित भविष्य और सामाजिक विकास से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बन चुका है, जिस पर समाज और मीडिया दोनों को गंभीरता से ध्यान देना होगा।

संवाद के साथ हुआ कार्यक्रम का समापन
कार्यक्रम के अंत में पत्रकारों, संचार विशेषज्ञों और सरकारी अधिकारियों के बीच खुली चर्चा हुई। इसमें आपदा संचार, जनजागरूकता और जवाबदेही सुनिश्चित करने में मीडिया की बदलती भूमिका पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि संवेदनशील और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग ही संकट के समय समाज की सबसे बड़ी जरूरत है।

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बाढ़-लू की रिपोर्टिंग पर बड़ा संदेश, बच्चों और महिलाओं के मुद्दे छूटे तो अधूरी रहेगी खबर

By Malay Ojha | Published: 12 June 2026 at 05:34 PM

बाढ़, सूखा और भीषण गर्मी जैसी जलवायु आपदाएं अब पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी और गंभीरता के साथ सामने आ रही हैं। इन आपदाओं का सबसे ज्यादा असर बच्चों, किशोरियों और महिलाओं पर पड़ता है, लेकिन अक्सर उनकी समस्याएं खबरों की मुख्य धारा में जगह नहीं बना पातीं। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए यूनिसेफ और बिहार सरकार ने पत्रकारों और संचार से जुड़े लोगों के लिए एक विशेष मीडिया कार्यशाला आयोजित की, जिसमें जिम्मेदार और संवेदनशील रिपोर्टिंग पर जोर दिया गया।

कार्यशाला में समाचार पत्र, टीवी, डिजिटल मंचों से जुड़े पत्रकारों, सामाजिक माध्यमों पर सक्रिय कंटेंट निर्माताओं, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों तथा विभिन्न सरकारी विभागों के जनसंपर्क पदाधिकारियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य आपदा के समय आम लोगों तक सही, भरोसेमंद और उपयोगी जानकारी पहुंचाने वाले सभी पक्षों को एक मंच पर लाना था, ताकि संकट के समय बेहतर संवाद और समन्वय सुनिश्चित किया जा सके।

आपदा से निपटने की तैयारी लगातार मजबूत कर रही सरकार
बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के संयुक्त सचिव मोहम्मद नदीमुल गफ्फार सिद्दीकी ने बताया कि राज्य में बाढ़, लू और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए तैयारियों को लगातार मजबूत किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि समय रहते चेतावनी देने वाली व्यवस्था, जिला और प्रखंड स्तर पर तैयारी तथा विभिन्न विभागों के बीच बेहतर तालमेल पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

अफवाहों से बचाने में मीडिया की बड़ी भूमिका
उन्होंने कहा कि किसी भी आपदा के दौरान गलत जानकारी और अफवाहें स्थिति को और गंभीर बना सकती हैं। ऐसे समय में मीडिया की जिम्मेदारी केवल खबर देना नहीं, बल्कि सत्यापित जानकारी लोगों तक पहुंचाना भी है। उन्होंने पत्रकारों से राहत और बचाव कार्यों में जुटे कर्मचारियों और स्वयंसेवकों के प्रयासों को भी प्रमुखता से सामने लाने की अपील की।

खबरों से गायब रह जाती हैं असली मानवीय कहानियां
यूनिसेफ बिहार की फील्ड कार्यालय प्रमुख डॉ. मोनिका नील्सन ने कहा कि हर जलवायु संकट के केंद्र में बच्चे और महिलाएं होती हैं, लेकिन उनकी वास्तविक परेशानियां अक्सर रिपोर्टिंग में पीछे छूट जाती हैं। उन्होंने कहा कि स्कूल छोड़ने को मजबूर होती किशोरियां, स्वास्थ्य सेवाओं तक नहीं पहुंच पाने वाली गर्भवती महिलाएं और टीकाकरण से वंचित बच्चे जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।

पत्रकारिता केवल आंकड़े नहीं, इंसानी कहानियां भी बताए
डॉ. नील्सन ने कहा कि मीडिया की ताकत केवल आंकड़े बताने में नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी मानवीय कहानियों को सामने लाने में है। उन्होंने बिहार के पत्रकारों की सराहना करते हुए कहा कि बीते वर्षों में बाल पोषण, टीकाकरण, नवजात स्वास्थ्य और बाल सुरक्षा जैसे विषयों को समाज तक पहुंचाने में मीडिया ने अहम भूमिका निभाई है।

आपदा रिपोर्टिंग में नैतिकता सबसे जरूरी
कार्यशाला के तकनीकी सत्र में संकट के समय रिपोर्टिंग से जुड़े व्यावहारिक और नैतिक पहलुओं पर चर्चा की गई। मीडिया एवं संचार विशेषज्ञ मीनती चकलानवीस ने कहा कि किसी भी आपदा की रिपोर्टिंग करते समय प्रभावित लोगों की गरिमा और सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

बच्चों की पहचान उजागर करने से बचने की सलाह
उन्होंने पत्रकारों को सलाह दी कि बच्चों से जुड़ी खबरों में उनकी पहचान की गोपनीयता बनाए रखें और किसी भी जानकारी को प्रकाशित करने से पहले उचित सहमति जरूर लें। उन्होंने यह भी कहा कि सनसनी फैलाने वाली प्रस्तुति से बचना पत्रकारिता की मूल जिम्मेदारी है।

जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का नहीं, सामाजिक मुद्दा भी
यूनिसेफ के जल, स्वच्छता और स्वास्थ्य विशेषज्ञ सुधाकर रेड्डी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल मौसम तक सीमित नहीं है। इसका सीधा प्रभाव बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। बढ़ते तापमान, अनियमित बारिश और बाढ़ जैसी घटनाओं के कारण पेयजल स्रोत प्रभावित होते हैं, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

बच्चों के अधिकारों से जुड़ा है जलवायु संकट
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरणीय समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह बच्चों के अधिकारों, सुरक्षित भविष्य और सामाजिक विकास से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बन चुका है, जिस पर समाज और मीडिया दोनों को गंभीरता से ध्यान देना होगा।

संवाद के साथ हुआ कार्यक्रम का समापन
कार्यक्रम के अंत में पत्रकारों, संचार विशेषज्ञों और सरकारी अधिकारियों के बीच खुली चर्चा हुई। इसमें आपदा संचार, जनजागरूकता और जवाबदेही सुनिश्चित करने में मीडिया की बदलती भूमिका पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि संवेदनशील और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग ही संकट के समय समाज की सबसे बड़ी जरूरत है।

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