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प्रेग्नेंसी की वजह से IPS ट्रेनिंग क्यों रुके? सुप्रीम कोर्ट का केंद्र से सवाल

By Malay Ojha | Published: 08 July 2026 at 01:02 PM

गर्भवती महिला आईपीएस अधिकारियों की ट्रेनिंग रोकने वाले 1993 के गृह मंत्रालय के नियम पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त सवाल उठाए हैं। अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि अगर कोई महिला अधिकारी डॉक्टरों की राय में पूरी तरह स्वस्थ और प्रशिक्षण के योग्य है, तो सिर्फ गर्भावस्था या मातृत्व के आधार पर उसे ट्रेनिंग से बाहर रखने का क्या औचित्य है? अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या मध्य प्रदेश कैडर की आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर को जून 2026 से शुरू हुए प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दी जा सकती है। मामले की अगली सुनवाई गुरुवार को होगी।

न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि फिलहाल उच्च न्यायालय का आदेश केवल अंतरिम है और अंतिम फैसला अभी आना बाकी है। अदालत ने टिप्पणी की कि सभी महिलाओं की शारीरिक स्थिति एक जैसी नहीं होती, इसलिए एक ही नियम सभी पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा कि संभव है कोई महिला प्रसव के कुछ महीने बाद ही पूरी तरह स्वस्थ हो जाए, जबकि दूसरी महिला दो साल बाद भी किसी सर्जरी या अन्य चिकित्सकीय कारणों से प्रशिक्षण के लिए फिट न हो। ऐसे में केवल एक तय समय सीमा के आधार पर सभी महिलाओं को रोकना उचित नहीं कहा जा सकता।

‘महिलाओं के हित का नियम उनके अधिकार नहीं छीन सकता’
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कहा कि महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए बनाए गए नियमों का इस्तेमाल उनके अधिकार सीमित करने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि यदि किसी अधिकारी की मेडिकल रिपोर्ट यह बताती है कि वह प्रशिक्षण के लिए पूरी तरह सक्षम है, तो फिर उसे सिर्फ गर्भवती होने के कारण ट्रेनिंग से क्यों रोका जाए?

केंद्र सरकार ने क्या दलील दी?
केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि यदि किसी एक अधिकारी को इस नियम से छूट दी जाती है, तो भविष्य में ऐसे कई मामलों में इसी तरह की मांग उठ सकती है। सरकार का कहना था कि मौजूदा व्यवस्था सभी महिला प्रशिक्षु अधिकारियों के लिए समान रूप से लागू है।

वहीं उर्वशी सेंगर की ओर से पेश पक्ष ने अदालत को बताया कि पहले भी कुछ मामलों में महिला अधिकारियों को परिस्थितियों के आधार पर राहत दी जा चुकी है। इसलिए हर मामले का फैसला व्यक्तिगत मेडिकल स्थिति को देखते हुए किया जाना चाहिए।

क्या है पूरा मामला?
यह याचिका मध्य प्रदेश कैडर की 2023 बैच की आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर ने दायर की है। उन्होंने नवंबर 2023 में प्रशिक्षण का पहला चरण शुरू किया था। अप्रैल 2025 में दूसरे चरण के दौरान वह गर्भवती हो गईं और इसकी जानकारी पुलिस अकादमी को दी।

इसके बाद अकादमी ने उन्हें प्रशिक्षण बीच में ही छोड़ने और बच्चे के जन्म के एक साल बाद अगले बैच के साथ दोबारा प्रशिक्षण लेने का निर्देश दिया। उर्वशी ने बच्चे के जन्म के बाद सितंबर 2025 में मेडिकल फिटनेस के आधार पर प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति मांगी, लेकिन उनकी मांग 1993 के नियम का हवाला देते हुए अस्वीकार कर दी गई।

पहले ट्रिब्यूनल से मिली राहत, फिर हाईकोर्ट ने लगा दी रोक
इसके बाद उर्वशी सेंगर ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण का दरवाजा खटखटाया। 27 मई को अधिकरण ने अंतरिम आदेश में आवश्यक चिकित्सकीय औपचारिकताएं पूरी करने की शर्त पर उन्हें दूसरे चरण के प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दे दी थी।

हालांकि बाद में सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने 22 जून को अधिकरण के आदेश पर रोक लगा दी और कहा कि संबंधित नियम महिला अधिकारी और उसके बच्चे दोनों के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया है।

याचिका में क्या कहा गया है?
याचिका में दलील दी गई है कि 1993 का नियम आज के समय में पुराना पड़ चुका है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के दौर में किसी महिला अधिकारी की व्यक्तिगत मेडिकल फिटनेस को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, न कि सभी पर एक जैसा प्रतिबंध लगाया जाए।

याचिका में यह भी कहा गया है कि प्रशिक्षण का दूसरा चरण मुख्य रूप से कक्षा आधारित पढ़ाई, शैक्षणिक मॉड्यूल और संस्थागत प्रशिक्षण पर आधारित होता है। इसमें अत्यधिक शारीरिक परिश्रम नहीं होता। इसलिए केवल गर्भवती होने के आधार पर किसी अधिकारी को प्रशिक्षण से बाहर करना उचित नहीं है।

क्या कहता है 1993 का गृह मंत्रालय का नियम?
23 अगस्त 1993 को जारी गृह मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार महिला आईपीएस प्रशिक्षु अधिकारियों को प्रशिक्षण के दौरान गर्भधारण से बचने की सलाह दी गई थी। यदि कोई अधिकारी प्रशिक्षण के दौरान गर्भवती हो जाती है तो उसकी ट्रेनिंग तत्काल रोक दी जाएगी। वह बच्चे के जन्म के एक वर्ष बाद ही दोबारा प्रशिक्षण शुरू कर सकेगी। इस अवधि को असाधारण अवकाश माना जाएगा, हालांकि इससे उसकी वरिष्ठता प्रभावित नहीं होगी।

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प्रेग्नेंसी की वजह से IPS ट्रेनिंग क्यों रुके? सुप्रीम कोर्ट का केंद्र से सवाल

By Malay Ojha | Published: 08 July 2026 at 01:02 PM

गर्भवती महिला आईपीएस अधिकारियों की ट्रेनिंग रोकने वाले 1993 के गृह मंत्रालय के नियम पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त सवाल उठाए हैं। अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि अगर कोई महिला अधिकारी डॉक्टरों की राय में पूरी तरह स्वस्थ और प्रशिक्षण के योग्य है, तो सिर्फ गर्भावस्था या मातृत्व के आधार पर उसे ट्रेनिंग से बाहर रखने का क्या औचित्य है? अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या मध्य प्रदेश कैडर की आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर को जून 2026 से शुरू हुए प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दी जा सकती है। मामले की अगली सुनवाई गुरुवार को होगी।

न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि फिलहाल उच्च न्यायालय का आदेश केवल अंतरिम है और अंतिम फैसला अभी आना बाकी है। अदालत ने टिप्पणी की कि सभी महिलाओं की शारीरिक स्थिति एक जैसी नहीं होती, इसलिए एक ही नियम सभी पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा कि संभव है कोई महिला प्रसव के कुछ महीने बाद ही पूरी तरह स्वस्थ हो जाए, जबकि दूसरी महिला दो साल बाद भी किसी सर्जरी या अन्य चिकित्सकीय कारणों से प्रशिक्षण के लिए फिट न हो। ऐसे में केवल एक तय समय सीमा के आधार पर सभी महिलाओं को रोकना उचित नहीं कहा जा सकता।

‘महिलाओं के हित का नियम उनके अधिकार नहीं छीन सकता’
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कहा कि महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए बनाए गए नियमों का इस्तेमाल उनके अधिकार सीमित करने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि यदि किसी अधिकारी की मेडिकल रिपोर्ट यह बताती है कि वह प्रशिक्षण के लिए पूरी तरह सक्षम है, तो फिर उसे सिर्फ गर्भवती होने के कारण ट्रेनिंग से क्यों रोका जाए?

केंद्र सरकार ने क्या दलील दी?
केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि यदि किसी एक अधिकारी को इस नियम से छूट दी जाती है, तो भविष्य में ऐसे कई मामलों में इसी तरह की मांग उठ सकती है। सरकार का कहना था कि मौजूदा व्यवस्था सभी महिला प्रशिक्षु अधिकारियों के लिए समान रूप से लागू है।

वहीं उर्वशी सेंगर की ओर से पेश पक्ष ने अदालत को बताया कि पहले भी कुछ मामलों में महिला अधिकारियों को परिस्थितियों के आधार पर राहत दी जा चुकी है। इसलिए हर मामले का फैसला व्यक्तिगत मेडिकल स्थिति को देखते हुए किया जाना चाहिए।

क्या है पूरा मामला?
यह याचिका मध्य प्रदेश कैडर की 2023 बैच की आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर ने दायर की है। उन्होंने नवंबर 2023 में प्रशिक्षण का पहला चरण शुरू किया था। अप्रैल 2025 में दूसरे चरण के दौरान वह गर्भवती हो गईं और इसकी जानकारी पुलिस अकादमी को दी।

इसके बाद अकादमी ने उन्हें प्रशिक्षण बीच में ही छोड़ने और बच्चे के जन्म के एक साल बाद अगले बैच के साथ दोबारा प्रशिक्षण लेने का निर्देश दिया। उर्वशी ने बच्चे के जन्म के बाद सितंबर 2025 में मेडिकल फिटनेस के आधार पर प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति मांगी, लेकिन उनकी मांग 1993 के नियम का हवाला देते हुए अस्वीकार कर दी गई।

पहले ट्रिब्यूनल से मिली राहत, फिर हाईकोर्ट ने लगा दी रोक
इसके बाद उर्वशी सेंगर ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण का दरवाजा खटखटाया। 27 मई को अधिकरण ने अंतरिम आदेश में आवश्यक चिकित्सकीय औपचारिकताएं पूरी करने की शर्त पर उन्हें दूसरे चरण के प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दे दी थी।

हालांकि बाद में सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने 22 जून को अधिकरण के आदेश पर रोक लगा दी और कहा कि संबंधित नियम महिला अधिकारी और उसके बच्चे दोनों के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया है।

याचिका में क्या कहा गया है?
याचिका में दलील दी गई है कि 1993 का नियम आज के समय में पुराना पड़ चुका है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के दौर में किसी महिला अधिकारी की व्यक्तिगत मेडिकल फिटनेस को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, न कि सभी पर एक जैसा प्रतिबंध लगाया जाए।

याचिका में यह भी कहा गया है कि प्रशिक्षण का दूसरा चरण मुख्य रूप से कक्षा आधारित पढ़ाई, शैक्षणिक मॉड्यूल और संस्थागत प्रशिक्षण पर आधारित होता है। इसमें अत्यधिक शारीरिक परिश्रम नहीं होता। इसलिए केवल गर्भवती होने के आधार पर किसी अधिकारी को प्रशिक्षण से बाहर करना उचित नहीं है।

क्या कहता है 1993 का गृह मंत्रालय का नियम?
23 अगस्त 1993 को जारी गृह मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार महिला आईपीएस प्रशिक्षु अधिकारियों को प्रशिक्षण के दौरान गर्भधारण से बचने की सलाह दी गई थी। यदि कोई अधिकारी प्रशिक्षण के दौरान गर्भवती हो जाती है तो उसकी ट्रेनिंग तत्काल रोक दी जाएगी। वह बच्चे के जन्म के एक वर्ष बाद ही दोबारा प्रशिक्षण शुरू कर सकेगी। इस अवधि को असाधारण अवकाश माना जाएगा, हालांकि इससे उसकी वरिष्ठता प्रभावित नहीं होगी।

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