By Malay Ojha | Published: 24 August 2026 at 01:14 PM
गोंडा के करीब तीन दशक पुराने भूमि विवाद में न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के कथित प्रयास ने देवीपाटन मंडल की आयुक्त और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को मुश्किल में डाल दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सिविल जज शबीना खान से फोन पर हुई बातचीत को गंभीर मानते हुए कहा कि प्रथमदृष्टया इससे न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने का संकेत मिलता है। कोर्ट ने मामले को आपराधिक अवमानना से जुड़ी उचित पीठ के सामने रखने का निर्देश दिया है।
यह मामला गोंडा के ज्योति विद्या मंदिर स्कूल और नगर पालिका परिषद से जुड़े वर्ष 1997 से लंबित भूमि विवाद का है। मामले की सुनवाई सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान कर रही थीं। इसी मुकदमे के सिलसिले में 15 जुलाई 2026 को मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल और जज के बीच फोन पर बातचीत होने की बात सामने आई।
जज ने जिला जज को दी थी पूरी जानकारी
सिविल जज शबीना खान ने 4 अगस्त को गोंडा के जिला जज को पत्र लिखकर इस बातचीत की जानकारी दी थी। उनके अनुसार फोन पर उनकी छुट्टी और अदालत में चल रहे लंबित मुकदमे का जिक्र हुआ। जज ने बातचीत के लहजे को लेकर आपत्ति जताई और मामले को उनकी अदालत से दूसरी अदालत में भेजने का अनुरोध किया। इसके बाद जिला जज ने मुकदमा समान क्षेत्राधिकार वाली दूसरी अदालत में स्थानांतरित कर दिया।
हाईकोर्ट ने बातचीत के लहजे को गंभीर माना
मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की पीठ ने कहा कि न्यायिक अधिकारी की ओर से बताई गई बातचीत की भाषा और लहजे से प्रथमदृष्टया ऐसा लगता है कि पीठासीन अधिकारी को प्रभावित करने की कोशिश की गई। अदालत ने यह भी कहा कि किसी लंबित मुकदमे को लेकर न्यायिक अधिकारी से इस तरह संपर्क किया जाना बेहद गंभीर विषय है।
‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता नहीं’
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि अधीनस्थ अदालतों के न्यायिक अधिकारियों को किसी भी तरह के दबाव या प्रभाव से मुक्त होकर काम करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। अदालत ने माना कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश न्याय प्रशासन में बाधा बन सकती है। इसी वजह से पीठ ने मामले को आपराधिक अवमानना से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाली उचित पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया।
दुर्गा शक्ति नागपाल ने फोन करने से इनकार नहीं किया
मामले में मंडलायुक्त की ओर से फोन किए जाने से इनकार नहीं किया गया है। हालांकि, उनका पक्ष इससे अलग है। उनके अनुसार उन्होंने अप्रैल 2026 में देवीपाटन मंडल का कार्यभार संभालने के बाद सरकारी नजूल जमीन से जुड़े इस पुराने विवाद की जानकारी ली थी। उन्होंने संबंधित अधिकारियों और सरकारी वकील को मामले को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने के निर्देश दिए थे।
मंडलायुक्त का दावा- मुकदमे पर बात नहीं हुई
दुर्गा शक्ति नागपाल के अनुसार 15 जुलाई को उन्होंने जज को फोन केवल उनकी छुट्टी और अदालत में लौटने की जानकारी लेने के लिए किया था। उनका कहना है कि फोन पर लंबित मुकदमे के गुण-दोष या सुनवाई को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई। बाद में उन्होंने जिला जज से मामले का जल्द निस्तारण करने का अनुरोध किया था। ऐसे में अब हाईकोर्ट के सामने बातचीत के दोनों पक्षों और उसके संदर्भ को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।
करीब 30 साल से अदालत में लंबित है विवाद
जिस मुकदमे ने पूरे मामले को जन्म दिया है, वह करीब तीन दशक पुराना है। वर्ष 1997 में ज्योति विद्या मंदिर स्कूल की ओर से नगर पालिका परिषद गोंडा के खिलाफ यह विवाद अदालत पहुंचा था। मामला सरकारी नजूल जमीन से जुड़ा बताया गया है और इसकी सुनवाई लंबे समय से चल रही है। वर्तमान में मुकदमा साक्ष्य के चरण में था और जमीन को लेकर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश भी बताया गया है।
स्कूल ने भी लगाए थे गंभीर आरोप
स्कूल की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में आरोप लगाया गया था कि सरकारी अधिकारी अपने पद का इस्तेमाल कर न्यायिक प्रक्रिया पर अनुचित दबाव डालने की कोशिश कर रहे हैं। इसी आधार पर मुकदमे को देवीपाटन मंडल से बाहर स्थानांतरित करने की मांग की गई थी। बाद में सिविल जज की ओर से की गई शिकायत सामने आने के बाद मामले ने और गंभीर रूप ले लिया।
मुकदमा दूसरी अदालत में हो चुका है स्थानांतरित
सिविल जज शबीना खान की ओर से अपनी अदालत से मामला हटाने का अनुरोध किए जाने के बाद जिला जज ने इसे गोंडा की ही दूसरी सक्षम अदालत में स्थानांतरित कर दिया। इसके बावजूद हाईकोर्ट ने फोन पर हुई बातचीत से जुड़े आरोपों को अलग और गंभीर मुद्दा माना। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुकदमे का स्थानांतरण हो जाने से न्यायिक अधिकारी पर कथित दबाव के सवाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अब आपराधिक अवमानना के पहलू से होगी पड़ताल
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद मामला अब केवल भूमि विवाद या मुकदमे के स्थानांतरण तक सीमित नहीं रहेगा। इसे आपराधिक अवमानना से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाली उचित पीठ के सामने रखा जाएगा। इसके बाद यह देखा जाएगा कि फोन पर हुई बातचीत और उसके कथित तरीके से क्या वास्तव में न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप या न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने का प्रयास हुआ था।
हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा पर दिया जोर
पीठ ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि अधीनस्थ न्यायपालिका के अधिकारियों को बिना भय के अपने न्यायिक दायित्व निभाने का माहौल मिलना जरूरी है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि न्यायिक कार्यवाही से जुड़े मामलों में जजों पर दबाव या धमकी का प्रयास न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप माना जा सकता है।
अब सबकी नजर अगली सुनवाई पर
फिलहाल हाईकोर्ट ने दुर्गा शक्ति नागपाल को दोषी घोषित नहीं किया है, बल्कि मामले को आपराधिक अवमानना के लिए उचित पीठ के सामने विचारार्थ भेजने का निर्देश दिया है। इसलिए आगे की न्यायिक कार्यवाही में यह तय होगा कि आरोपों पर किस तरह की कार्रवाई होती है। दूसरी ओर, करीब तीन दशक पुराने भूमि विवाद की सुनवाई अब दूसरी अदालत में जारी रहेगी।
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