By aryavartalive | Published: 24 August 2026 at 10:13 PM
खेतों, खाली जमीन और आसपास के इलाकों में तेजी से फैल रही पार्थेनियम यानी गाजर घास को लेकर कृषि वैज्ञानिकों ने लोगों को सतर्क किया है। कृषि अनुसंधान परिसर, पटना में आयोजित 21वें पार्थेनियम जागरूकता सप्ताह के दौरान किसानों, विद्यार्थियों और आम लोगों को इस खरपतवार से होने वाले नुकसान और इसके नियंत्रण के व्यावहारिक तरीकों की जानकारी दी गई। वैज्ञानिकों ने इसके लंबे समय तक नियंत्रण के लिए जैविक, सांस्कृतिक और पर्यावरण के अनुकूल उपायों को अपनाने पर जोर दिया।
पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस को आमतौर पर गाजर घास या कांग्रेस घास के नाम से जाना जाता है। यह तेजी से फैलने वाला आक्रामक खरपतवार है, जो खेती के साथ पर्यावरण, पशुधन और मानव स्वास्थ्य के लिए भी परेशानी पैदा कर सकता है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक देश में करीब साढ़े तीन करोड़ हेक्टेयर भूमि तक इसका फैलाव हो चुका है और इसके लगातार बढ़ते प्रसार को गंभीरता से लेने की जरूरत है।
खेती के साथ स्वास्थ्य पर भी असर
गाजर घास के कारण फसलों की उत्पादकता प्रभावित होने के साथ स्थानीय जैव विविधता पर भी असर पड़ता है। इसके संपर्क में आने से कुछ लोगों में त्वचा संबंधी एलर्जी, डर्मेटाइटिस, दमा और नाक से जुड़ी एलर्जी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिक केवल इसके पौधों को हटाने के बजाय इसके फैलाव को रोकने के लिए लगातार जागरूकता अभियान चलाने पर जोर दे रहे हैं।
एक सप्ताह तक चला जागरूकता अभियान
इसी समस्या को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना की ओर से 16 से 22 अगस्त तक 21वां पार्थेनियम जागरूकता सप्ताह आयोजित किया गया। अनुसंधान केंद्र और कृषि विज्ञान केंद्रों के सहयोग से आयोजित कार्यक्रम में किसानों और आम लोगों तक पार्थेनियम के नुकसान और इसके प्रबंधन से जुड़ी जानकारी पहुंचाई गई।
विद्यार्थियों से वैज्ञानिकों ने किया सीधा संवाद
जागरूकता सप्ताह के दौरान विद्यार्थियों के लिए विशेष संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें पटना और आसपास के कई शैक्षणिक संस्थानों के एमएससी और पीएचडी विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। वैज्ञानिकों और तकनीकी कर्मचारियों ने विद्यार्थियों को गाजर घास की पहचान, इसके फैलने के कारण और नियंत्रण के अलग-अलग तरीकों के बारे में जानकारी दी।
गाजर घास के नियंत्रण में लोगों की भागीदारी जरूरी
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संस्थान के निदेशक डॉ. अनुप दास ने कहा कि पार्थेनियम जैसी समस्या से निपटने के लिए केवल सरकारी या वैज्ञानिक प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। इसमें किसानों और आम लोगों की भागीदारी भी जरूरी है। उन्होंने लंबे समय तक प्रभावी नियंत्रण के लिए अलग-अलग तरीकों को मिलाकर एकीकृत खरपतवार प्रबंधन अपनाने की जरूरत बताई।
कम खर्च में नियंत्रण पर दिया गया जोर
संस्थान के विभिन्न प्रभागों के प्रमुखों ने भी विद्यार्थियों और प्रतिभागियों को संबोधित किया। उन्होंने पार्थेनियम को नियंत्रित करने के ऐसे उपायों पर चर्चा की, जिन्हें किसान और आम लोग अपनी सुविधा के अनुसार आसानी से अपना सकें। वैज्ञानिकों ने खास तौर पर समय रहते खरपतवार की पहचान कर उसे फैलने से रोकने को महत्वपूर्ण बताया।
जैविक तरीकों से भी रोका जा सकता है फैलाव
भूमि एवं जल प्रबंधन प्रभाग की वैज्ञानिक डॉ. सोनका घोष ने पार्थेनियम के प्रबंधन पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इसके नियंत्रण के लिए भौतिक, सांस्कृतिक, रासायनिक और जैविक तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने जैव नियंत्रण के लिए मैक्सिकन बीटल जैसे विकल्पों के साथ ऐसी पौध प्रजातियों की भूमिका भी बताई, जो पार्थेनियम के विकास को प्रतिस्पर्धा देकर रोक सकती हैं।
गेंदा और चारा फसलें भी हो सकती हैं मददगार
वैज्ञानिकों ने बताया कि कुछ प्रतिस्पर्धी पौध प्रजातियों को बढ़ावा देकर पार्थेनियम के फैलाव को सीमित किया जा सकता है। इसमें कासिया की कुछ प्रजातियां, गेंदा और चारा फसलें उपयोगी हो सकती हैं। हालांकि, इनके इस्तेमाल का तरीका स्थानीय परिस्थितियों और खरपतवार की स्थिति को ध्यान में रखकर तय करना जरूरी है।
मौसम में बदलाव से बढ़ सकती है चुनौती
कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभावों पर भी चर्चा की। तापमान और वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में बदलाव से पार्थेनियम की वृद्धि और फैलाव प्रभावित हो सकता है। ऐसे में आने वाले समय में इसके नियंत्रण के लिए लगातार निगरानी और स्थानीय स्तर पर प्रभावी प्रबंधन की जरूरत और बढ़ सकती है।
संस्थान परिसर में चलाया गया उन्मूलन अभियान
जागरूकता सप्ताह के दौरान केवल व्याख्यान और संवाद तक कार्यक्रम सीमित नहीं रहा। संस्थान परिसर और प्रक्षेत्रों में पार्थेनियम उन्मूलन अभियान भी चलाया गया। वैज्ञानिकों, अधिकारियों, तकनीकी कर्मचारियों और सहायक कर्मचारियों ने मिलकर परिसर में उगे पार्थेनियम के पौधों को हटाया।
जागरूकता के साथ नियमित सफाई जरूरी
वैज्ञानिकों का मानना है कि गाजर घास को नियंत्रित करने के लिए एक बार पौधे हटाना पर्याप्त नहीं है। इसके दोबारा उगने और बीजों के फैलाव पर नजर रखना भी जरूरी है। इसलिए खेतों, खाली जमीन और संस्थानों के आसपास नियमित निगरानी के साथ समय रहते इसकी सफाई करने की जरूरत है।
वैज्ञानिकों और तकनीकी कर्मचारियों ने संभाली जिम्मेदारी
पूरे कार्यक्रम का समन्वय डॉ. सोनका घोष, डॉ. शिवानी, डॉ. राकेश कुमार और डॉ. घौस अली ने किया। डॉ. सौरभ कुमार, डॉ. अभिषेक कुमार दुबे, डॉ. मनीषा टम्टा और डॉ. रजनी कुमारी ने सह-आयोजक के तौर पर सहयोग दिया। तकनीकी सहयोग में विजय बाबू, अभिषेक कुमार, पी.के. सिंह, पी.के. महापात्र और उमेश कुमार मिश्र की भूमिका रही।
जागरूकता अभियान के जरिए बड़ा संदेश
कार्यक्रम के समापन पर विशेषज्ञों ने साफ किया कि पार्थेनियम को केवल खेतों में उगने वाला सामान्य खरपतवार समझना ठीक नहीं है। इसके फैलाव को समय रहते रोकना खेती, पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। सप्ताह भर चले अभियान का उद्देश्य भी यही रहा कि किसान, विद्यार्थी और आम लोग गाजर घास की पहचान करें, इसके नुकसान को समझें और स्थानीय स्तर पर इसके नियंत्रण में भागीदारी निभाएं। कार्यक्रम का समापन डॉ. मनीषा टम्टा के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
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