By Malay Ojha | Published: 25 August 2026 at 09:22 PM
गया जिले के टनकुप्पा प्रखंड के गजाधरपुर गांव के 16 अनुसूचित जाति के किसानों के लिए बकरी पालन अब सिर्फ पशुपालन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे नियमित आमदनी का जरिया बनाने की दिशा में प्रशिक्षण दिया गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना में दो दिवसीय क्षमता निर्माण सह आदान सहायता कार्यक्रम के समापन पर किसानों को वैज्ञानिक बकरी पालन की तकनीकें बताई गईं और 24 बकरियां वितरित की गईं।
अनुसूचित जाति उप-योजना के तहत आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को बकरी पालन की ऐसी तकनीक से परिचित कराना था, जिससे कम जमीन और सीमित संसाधनों में भी अतिरिक्त आमदनी हासिल की जा सके। प्रशिक्षण में किसानों को बकरी पालन के साथ चारा उत्पादन, पानी की व्यवस्था, फलदार पेड़ लगाने और खेती को पशुपालन से जोड़ने के तरीके समझाए गए।
बकरी पालन को आय का मजबूत साधन बनाने पर जोर
कार्यक्रम के समापन अवसर पर संस्थान के निदेशक डॉ. अनुप दास ने कहा कि वैज्ञानिक तरीके से बकरी पालन छोटे और सीमांत किसानों की आमदनी बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है। उनके मुताबिक, अगर बकरी पालन को खेती की दूसरी गतिविधियों से जोड़ दिया जाए तो किसान एक ही जमीन और उपलब्ध संसाधनों से कई तरह की आय हासिल कर सकते हैं।
खेती, पशुपालन और बागवानी को जोड़ने की सलाह
डॉ. अनुप दास ने किसानों को समेकित कृषि प्रणाली अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने सीमित भूमि पर पशुपालन, फसल उत्पादन, फलदार पेड़ और चारा उत्पादन को एक साथ जोड़ने वाले विविधीकृत मॉडल अपनाने की बात कही। उनका कहना था कि इस तरह किसान अपनी जमीन का अधिक बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं और किसी एक आय स्रोत पर निर्भरता कम कर सकते हैं।
कम जमीन में ज्यादा गतिविधियों का मॉडल
प्रशिक्षण के दौरान नैनो और सूक्ष्म गृह-आधारित कृषि मॉडल जैसे विकल्पों की जानकारी भी दी गई। इनका उद्देश्य कम जगह में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना है। किसानों को समझाया गया कि घर और खेत के आसपास उपलब्ध जगह में चारा, फलदार पेड़ और पशुपालन को जोड़कर एक ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है, जिससे परिवार की जरूरतें भी पूरी हों और अतिरिक्त आमदनी का रास्ता भी बने।
साफ पानी से ही स्वस्थ रहेंगी बकरियां
डॉ. आशुतोष उपाध्याय ने बकरी पालन में पानी की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने किसानों को बताया कि बकरियों के स्वास्थ्य, साफ-सफाई और उत्पादन क्षमता के लिए पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पानी उपलब्ध होना जरूरी है। उन्होंने पानी के सही इस्तेमाल के साथ उसके संरक्षण की तकनीकों को अपनाने की भी सलाह दी।
पानी की बचत पर भी किसानों को समझाया
प्रशिक्षण में किसानों को यह भी बताया गया कि पशुपालन में पानी का इस्तेमाल सोच-समझकर किया जाना चाहिए। पानी की कमी वाले क्षेत्रों में उपलब्ध संसाधनों का संरक्षण करते हुए बकरियों के लिए नियमित साफ पानी की व्यवस्था करना जरूरी है। इससे पशुओं के स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ सकता है और बीमारी का जोखिम भी कम किया जा सकता है।
खेत की मेड़ से भी बढ़ सकती है आमदनी
डॉ. कमल शर्मा ने किसानों को खेत की मेड़ और खाली जगहों का इस्तेमाल फलदार तथा बहुउद्देशीय पेड़ लगाने के लिए करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इन पेड़ों से आने वाले समय में अतिरिक्त आमदनी मिल सकती है। साथ ही, कुछ पेड़ों और घासों का इस्तेमाल पशुओं के चारे के रूप में भी किया जा सकता है।
हरे चारे की व्यवस्था पर विशेष ध्यान
बकरी पालन को लाभकारी बनाने में चारे की लागत का बड़ा महत्व होता है। प्रशिक्षण के दौरान किसानों को अपने खेत में हरा चारा तैयार करने और उपलब्ध जगह का इस्तेमाल चारा उत्पादन के लिए करने के बारे में जानकारी दी गई। इससे बाहर से चारा खरीदने पर होने वाला खर्च कम करने में मदद मिल सकती है।
खेती के साथ बकरी पालन जोड़ने की सलाह
डॉ. संजीव कुमार ने समेकित कृषि प्रणाली में बकरी पालन की उपयोगिता समझाई। उन्होंने कहा कि किसान फसल उत्पादन, बागवानी और चारा उत्पादन के साथ बकरी पालन को जोड़कर उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे खेती से जुड़े अलग-अलग कामों से आमदनी के कई रास्ते तैयार किए जा सकते हैं।
स्थानीय जरूरत के हिसाब से मॉडल चुनने पर जोर
किसानों को सलाह दी गई कि वे किसी एक मॉडल की नकल करने के बजाय अपने गांव की जमीन, पानी, चारे और उपलब्ध संसाधनों को ध्यान में रखकर कृषि प्रणाली तैयार करें। स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक बकरी पालन और खेती को जोड़ने से किसानों के लिए यह व्यवस्था ज्यादा उपयोगी और टिकाऊ हो सकती है।
सीखे हुए तरीके खेत में अपनाने की अपील
डॉ. उज्ज्वल कुमार ने किसानों से प्रशिक्षण के दौरान मिली जानकारी को केवल सुनने तक सीमित नहीं रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण की असली सफलता तभी मानी जाएगी, जब किसान सीखी गई तकनीकों को अपने खेत और पशुपालन में इस्तेमाल करेंगे। उन्होंने किसानों से गांव के दूसरे पशुपालकों और किसानों को भी इन तरीकों के बारे में जानकारी देने को कहा।
किसानों के सवालों का मौके पर समाधान
दो दिवसीय कार्यक्रम के दौरान किसानों को बकरी पालन से जुड़े कई तकनीकी पहलुओं की जानकारी दी गई। किसानों ने अपने पशुओं, चारे, पानी, पालन-पोषण और खेती से जुड़ी समस्याएं विशेषज्ञों के सामने रखीं। विशेषज्ञों ने उनकी समस्याओं का समाधान बताते हुए स्थानीय स्तर पर अपनाए जा सकने वाले उपायों की जानकारी दी।
प्रशिक्षण के साथ 24 बकरियां भी मिलीं
कार्यक्रम की खास बात यह रही कि क्षमता निर्माण के साथ किसानों को पशुपालन शुरू करने के लिए सहायता भी दी गई। कार्यक्रम के तहत किसानों के बीच कुल 24 बकरियों का वितरण किया गया। इसका उद्देश्य किसानों को प्रशिक्षण में मिली जानकारी को व्यवहार में उतारने का अवसर देना है, ताकि वे वैज्ञानिक तरीके से बकरी पालन की शुरुआत कर सकें।
गांव के दूसरे किसानों तक पहुंचेगी जानकारी
कार्यक्रम में किसानों से यह भी कहा गया कि प्रशिक्षण से मिली जानकारी को अपने गांव तक पहुंचाएं। अगर प्रशिक्षित किसान अपने आसपास के अन्य पशुपालकों को चारा, पानी, स्वच्छता, देखभाल और समेकित खेती के बारे में जागरूक करते हैं तो इसका फायदा बड़े स्तर पर मिल सकता है।
छोटे किसानों के लिए बढ़ सकता है आय का रास्ता
बकरी पालन की खासियत यह है कि इसे अपेक्षाकृत कम संसाधनों के साथ भी शुरू किया जा सकता है। यदि इसे वैज्ञानिक तरीके से किया जाए और चारे, पानी, स्वास्थ्य तथा प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए तो यह छोटे किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का साधन बन सकता है। इसी सोच के साथ इस प्रशिक्षण में बकरी पालन को खेती की दूसरी गतिविधियों से जोड़ने पर जोर दिया गया।
कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने निभाई अहम भूमिका
कार्यक्रम के पाठ्यक्रम निदेशक डॉ. नीति लखानी और डॉ. सुरेंद्र कुमार अहिरवाल रहे। डॉ. राकेश कुमार ने सह-पाठ्यक्रम निदेशक की भूमिका निभाई। समन्वयक के रूप में डॉ. काशीनाथ, डॉ. प्रेम कुमार सुंदरम और डॉ. पी.सी. चंद्रन का योगदान रहा। विशेषज्ञों ने किसानों को बकरी पालन और समेकित कृषि से जुड़े अलग-अलग पहलुओं की जानकारी दी।
प्रशिक्षण से आगे बढ़ेगी किसानों की आजीविका
दो दिवसीय कार्यक्रम का समापन किसानों को बकरी पालन की तकनीकी जानकारी और 24 बकरियां उपलब्ध कराने के साथ हुआ। अब इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि किसान प्रशिक्षण में सीखी गई तकनीकों को अपने गांव और खेत में किस तरह लागू करते हैं। वैज्ञानिक पालन, बेहतर चारा प्रबंधन, साफ पानी और खेती के साथ पशुपालन का मेल किसानों की आमदनी बढ़ाने की दिशा में उपयोगी कदम साबित हो सकता है।
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