By Malay Ojha | Published: 29 August 2026 at 11:43 AM
हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार सरकार के मंत्री संतोष कुमार सुमन ने आरक्षण को लेकर अपना रुख एक बार फिर साफ किया है। उन्होंने कहा कि आरक्षण खत्म करने की उनकी कोई मांग नहीं है। उनकी मांग मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा और SC/ST आरक्षण में उप-वर्गीकरण यानी ‘कोटे के अंदर कोटा’ की है, ताकि आरक्षण का लाभ उन समुदायों तक भी पहुंचे जो अब तक अपेक्षित हिस्सेदारी से पीछे हैं।
संतोष सुमन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि आरक्षण की समीक्षा की बात सामने आते ही इसे आरक्षण समाप्त करने की मांग बताना सही नहीं है। उनका कहना है कि समीक्षा का मकसद यह पता लगाना होना चाहिए कि बीते वर्षों में आरक्षण का फायदा किन समुदायों को कितना मिला और कौन से समूह अब भी शिक्षा, सरकारी नौकरी और ऊंचे पदों में पीछे हैं।
आंकड़ों से तय हो कि किसे कितना लाभ मिला
हम नेता ने सवाल उठाया कि अगर आरक्षण का मकसद समाज के सबसे वंचित लोगों को अवसर और सम्मान दिलाना है, तो यह जानने में परेशानी क्यों होनी चाहिए कि इसका लाभ किसे कितना मिला। उनके मुताबिक इस पर बहस भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर होनी चाहिए।
SC/ST में ‘कोटे के अंदर कोटा’ की पैरवी
संतोष सुमन ने SC/ST आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण की मांग दोहराई है। उनका तर्क है कि एक ही आरक्षित वर्ग के भीतर भी कुछ समुदाय दूसरे समूहों की तुलना में ज्यादा पीछे हैं। ऐसे समुदायों की पहचान कर उसी आरक्षण के भीतर उनके लिए हिस्सेदारी तय करने पर विचार होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले में भी SC/ST के भीतर उप-वर्गीकरण की संभावना को मान्यता दी गई थी।
‘क्रीमी लेयर’ को लेकर भी सफाई
संतोष सुमन ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी मौजूदा मांग क्रीमी लेयर लागू करने से जुड़ी नहीं है। उन्होंने कहा कि क्रीमी लेयर और आरक्षण में उप-वर्गीकरण दो अलग मुद्दे हैं। इसलिए दोनों को एक साथ जोड़कर उनकी मांग को समझना सही नहीं होगा। SC/ST में क्रीमी लेयर को लेकर केंद्र सरकार ने भी हाल में सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि यह सिद्धांत इन वर्गों के आरक्षण पर लागू नहीं होता।
‘महादलित’ मॉडल का दिया उदाहरण
संतोष सुमन ने बिहार में दलित समुदाय के भीतर सबसे ज्यादा वंचित समूहों की पहचान के लिए ‘महादलित’ अवधारणा का उदाहरण दिया। उनका कहना है कि अगर दूसरे सामाजिक वर्गों में जरूरत के हिसाब से अलग पहचान और व्यवस्था बनाई जा सकती है, तो SC/ST के भीतर भी आंकड़ों के आधार पर सबसे पीछे रह गए समुदायों की पहचान क्यों नहीं हो सकती।
बोले- किसी का हक छीनना मकसद नहीं
संतोष सुमन का कहना है कि ‘कोटे में कोटा’ का मतलब किसी समुदाय का आरक्षण खत्म करना नहीं है। उनकी मांग मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के भीतर ही उन समुदायों को हिस्सेदारी देने की है, जिन्हें अब तक पर्याप्त लाभ नहीं मिल पाया है। उनका जोर इस बात पर है कि आरक्षण का फायदा केवल कुछ समूहों तक सीमित न रहे और सबसे ज्यादा वंचित लोगों तक भी पहुंचे।
आरक्षण पर फिर तेज हुई सियासी बहस
संतोष सुमन के बयान के बाद बिहार की राजनीति में आरक्षण और SC/ST उप-वर्गीकरण का मुद्दा फिर चर्चा में है। इस मुद्दे पर NDA के भीतर भी अलग-अलग राय सामने आई है। केंद्रीय मंत्री और LJP (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान ने उप-वर्गीकरण के प्रस्ताव पर आपत्ति जताई है, जिससे सहयोगी दलों के बीच मतभेद खुलकर सामने आए हैं।
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