By Malay Ojha | Published: 29 August 2026 at 06:33 PM
भारतीय युवाओं को इस बात की अच्छी समझ है कि कौन सा खाना सेहत के लिए बेहतर है और कौन सा नुकसानदेह, लेकिन सिर्फ जानकारी होने से उनकी खाने की आदतें नहीं बदल रहीं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU), डीकिन यूनिवर्सिटी और अहमदाबाद यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की नई स्टडी में सामने आया है कि महंगा हेल्दी फूड, सस्ता और आसानी से मिलने वाला जंक फूड, समय की कमी और दोस्तों का दबाव युवाओं के भोजन के फैसलों को प्रभावित कर रहे हैं। यह अध्ययन 68 युवाओं के गहन इंटरव्यू पर आधारित है।
BMC Public Health में प्रकाशित इस अध्ययन में 19 से 29 साल के युवाओं को शामिल किया गया। मुंबई, पुणे, हैदराबाद, कोलकाता, अहमदाबाद, चेन्नई, दिल्ली और बेंगलुरु के युवाओं से बातचीत की गई। ज्यादातर प्रतिभागियों ने फल, सब्जियां, दाल, अनाज और कम प्रोसेस किए गए भोजन को हेल्दी माना, जबकि ज्यादा तेल में तले और ज्यादा प्रोसेस किए गए खाने को अनहेल्दी बताया। खास बात यह रही कि किसी भी प्रतिभागी ने खाने को हेल्दी या अनहेल्दी तय करने के लिए पोषण लेबल या पैकेट पर लिखे स्वास्थ्य संबंधी दावों को आधार नहीं बताया।
जेब पर भारी पड़ता है हेल्दी खाना
स्टडी में खाने की कीमत बड़ी बाधा बनकर सामने आई। युवाओं का मानना था कि फल और दूसरे पौष्टिक खाद्य पदार्थ अक्सर महंगे पड़ते हैं, जबकि जंक और ज्यादा प्रोसेस किए गए खाद्य पदार्थ कम कीमत में आसानी से मिल जाते हैं। ऐसे में हेल्दी विकल्प चुनने की इच्छा होने के बावजूद बजट कई बार रास्ते में आ जाता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, केवल लोगों को बेहतर खान-पान के बारे में बताने से काम नहीं चलेगा, जब तक स्वस्थ विकल्प उनकी पहुंच में न हों।
समय कम, तो फूड डिलीवरी आसान विकल्प
व्यस्त पढ़ाई और नौकरी के बीच खाना बनाने के लिए समय निकालना भी युवाओं के लिए मुश्किल हो रहा है। घर का खाना बेहतर विकल्प माना जाता है, लेकिन खरीदारी, तैयारी और खाना बनाने में लगने वाला समय कई युवाओं को तैयार भोजन और बाहर के खाने की ओर ले जाता है। शोध में घर पर खाना पकाने में कमी और अकेले रहने को भी स्वस्थ भोजन अपनाने की बाधाओं में शामिल किया गया है।
दोस्तों के साथ बदल जाता है खाने का फैसला
युवाओं की पसंद पर उनके दोस्तों और आसपास के माहौल का भी असर पड़ता है। शोध में सामने आया कि साथियों के साथ बाहर खाने के दौरान युवा कई बार ऐसे खाद्य पदार्थ भी चुन लेते हैं जिन्हें वे सामान्य तौर पर स्वस्थ नहीं मानते। यानी खाने का फैसला हमेशा सिर्फ व्यक्तिगत पसंद या जानकारी से तय नहीं होता, बल्कि सामाजिक माहौल भी उसमें बड़ी भूमिका निभाता है।
सरकारी हेल्थ कैंपेन की जानकारी भी सीमित
स्टडी में ‘ईट राइट इंडिया’ और ‘फिट इंडिया मूवमेंट’ जैसे सरकारी अभियानों की जानकारी को लेकर भी एक अहम बात सामने आई। ज्यादातर प्रतिभागियों को इन अभियानों के बारे में बहुत कम जानकारी थी और कुछ ने इंटरव्यू के दौरान पहली बार इनके नाम सुने। शोधकर्ताओं ने कहा कि युवाओं तक स्वास्थ्य संदेश पहुंचाने के लिए उन माध्यमों का बेहतर इस्तेमाल जरूरी है, जहां वे पहले से सक्रिय हैं।
सोशल मीडिया से फायदा भी, नुकसान भी
युवा पोषण और फिटनेस से जुड़ी जानकारी के लिए सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यही प्लेटफॉर्म उन्हें जंक फूड और दूसरे अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों के आकर्षक प्रचार से भी जोड़ते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि सोशल मीडिया को सिर्फ समस्या के तौर पर देखने के बजाय इसका इस्तेमाल भरोसेमंद स्वास्थ्य जानकारी पहुंचाने के लिए भी किया जा सकता है।
सिर्फ ‘हेल्दी खाइए’ कहना काफी नहीं
शोध का सबसे अहम संदेश यही है कि युवाओं से सिर्फ स्वस्थ भोजन करने की अपील करना पर्याप्त नहीं है। उन्हें पोषण और फूड लेबल समझने, कम बजट में भोजन की योजना बनाने और खाना तैयार करने जैसे व्यावहारिक कौशल भी सिखाने होंगे। साथ ही स्कूल, कॉलेज, हॉस्टल और कार्यस्थलों पर सस्ता, पौष्टिक और आसानी से मिलने वाला खाना उपलब्ध कराना भी जरूरी है। शोधकर्ताओं ने पोषण और डिजिटल हेल्थ लिटरेसी को मजबूत करने तथा सरकारी स्वास्थ्य संदेशों को भरोसेमंद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंचाने की जरूरत बताई है।
BHU की शोध टीम में कौन-कौन शामिल
इस अध्ययन में BHU के गृह विज्ञान विभाग की प्रोफेसर ललिता वट्टा, शोधकर्ता शिखा पंवार और फरहीन अहमदी, डीकिन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एंथनी वॉर्सली तथा अहमदाबाद यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नेहा राठी शामिल थीं। अध्ययन को जनवरी 2025 में BHU के इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज की संस्थागत नैतिक समिति से मंजूरी मिली थी। शोध 31 जुलाई 2026 को BMC Public Health में प्रकाशित हुआ।
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