By Malay Ojha | Published: 29 August 2026 at 06:52 PM
वाराणसी: काशी की साहित्यिक परंपरा में मनु शर्मा और भोजपुरी के लोककवि राम जियावन दास ‘बावला’ के योगदान को याद करते हुए शनिवार को जिला पुस्तकालय में साहित्यिक चर्चा हुई। ‘हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा’ के सप्तदश पुष्प में दोनों रचनाकारों के लेखन, उनकी रचनात्मक सोच और समाज से जुड़े सरोकारों पर वक्ताओं ने विस्तार से बात रखी। कार्यक्रम में साहित्यिक कृति ‘महाप्रलय’ का लोकार्पण भी हुआ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता ‘सोच-विचार’ पत्रिका के प्रधान संपादक जितेन्द्र नाथ मिश्र ने की। उन्होंने कहा कि मनु शर्मा किसी तय रास्ते पर चलने वाले लेखक नहीं थे। पौराणिक चरित्र कृष्ण की कथा को आत्मकथा के अंदाज में पेश करना उनकी रचनात्मक सोच की खास पहचान रही। मनु शर्मा की चर्चित कृति ‘कृष्ण की आत्मकथा’ आठ खंडों में प्रकाशित हुई है।
नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री और साहित्यकार व्योमेश शुक्ल ने कहा कि मनु शर्मा काशी के प्रमुख रचनाकारों में अपनी अलग जगह रखते हैं। उन्होंने साहित्य के अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया और अपने लेखन के जरिए स्थानीय अनुभवों को व्यापक संदर्भ दिया। व्योमेश शुक्ल ने कहा कि उनकी साहित्यिक सक्रियता आज की पीढ़ी के लिए भी प्रेरणा देती है।
‘बावला’ की कविता में भक्ति के साथ समाज भी
भारत अध्ययन केंद्र, बीएचयू के डॉ. अमित कुमार पांडेय ने राम जियावन दास ‘बावला’ की रचनाओं पर बात रखते हुए कहा कि उनकी कविता में भक्ति, लोकजीवन और सामाजिक यथार्थ एक साथ दिखाई देते हैं। उन्होंने तुलसी की भक्ति परंपरा को लोक जीवन के अनुभवों से जोड़कर अपनी अलग काव्य-दृष्टि विकसित की। उनकी रचनाओं में अभाव, सामाजिक असमानता और संघर्ष भी लोकचेतना के रूप में सामने आते हैं।
भोजपुरी से आगे तक पहुंचा ‘बावला’ का असर
जितेन्द्र नाथ मिश्र ने कहा कि ‘बावला’ ने रामचरित से जुड़े विषयों को भोजपुरी में अपने अंदाज में प्रस्तुत किया। उनके गीतों का असर सीधे आम लोगों तक पहुंचता है और लंबे समय तक बना रहता है। उन्होंने ‘बावला’ के साहित्य को भोजपुरी के साथ पूरे हिंदी क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण योगदान बताया।
साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाने पर जोर
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि काशी की साहित्यिक पहचान केवल बड़े और चर्चित नामों तक सीमित नहीं है। यहां की रचनात्मक परंपरा को समृद्ध करने वाले ऐसे साहित्यकारों को भी लगातार याद किए जाने की जरूरत है, जिनका लेखन अपने समय और समाज से गहराई से जुड़ा रहा। ‘हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा’ की श्रृंखला इसी साहित्यिक विरासत को सामने लाने का प्रयास कर रही है। इस श्रृंखला के पिछले आयोजनों में भी काशी के अलग-अलग रचनाकारों के योगदान पर चर्चा हो चुकी है।
‘महाप्रलय’ का भी हुआ लोकार्पण
कार्यक्रम के दौरान श्री रमाशंकर राय की पुस्तक ‘महाप्रलय’ का लोकार्पण किया गया। शुरुआत में विद्याश्री न्यास के सचिव डॉ. दयानंद मिश्र ने अतिथियों का स्वागत किया और मनु शर्मा तथा ‘बावला’ का परिचय रखा। श्री विजेंद्र नाथ मिश्र ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। संचालन अभिनव अरुण ने किया, जबकि आभार प्रो. उमेश प्रसाद सिंह ने जताया। कंचन सिंह परिहार ने एकल काव्य पाठ भी प्रस्तुत किया।
साहित्यकारों की मौजूदगी रही
आयोजन में नरेंद्र नाथ मिश्र, सुरेंद्र प्रताप सिंह, डॉ. रामसुधार सिंह, श्रद्धानंद, अत्रि भारद्वाज, मंजरी पांडेय, अशोक सिंह, सुरेंद्र वाजपेयी, शिवकुमार पराग, कवींद्र नारायण, इंदीवर और प्रकाश उदय समेत कई साहित्यकार और साहित्यप्रेमी मौजूद रहे।
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