By Malay Ojha | Published: 18 June 2026 at 09:26 AM
आज जब पूरा देश गोवा क्रांति दिवस मना रहा है, तब 18 जून 1946 की वह ऐतिहासिक घटना फिर चर्चा में है, जब समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने पुर्तगाली शासन को खुली चुनौती दे दी थी। मुरगांव में आयोजित एक सभा के दौरान पुलिस अधिकारी ने उनके सामने पिस्तौल तक तान दी, लेकिन लोहिया पीछे नहीं हटे। उनकी इसी हिम्मत ने गोवा की आजादी की लड़ाई को नई दिशा दी।
गोवा को पुर्तगाली शासन से पूरी तरह आजादी 19 दिसंबर 1961 को मिली थी, लेकिन 18 जून 1946 को शुरू हुआ जनआंदोलन ही गोवा मुक्ति संघर्ष की असली शुरुआत माना जाता है। यही वजह है कि हर साल इस तारीख को गोवा क्रांति दिवस के रूप में याद किया जाता है।
400 साल से ज्यादा समय तक रहा पुर्तगाली शासन
जब भारत के अधिकांश हिस्से विदेशी शासन से मुक्ति की ओर बढ़ रहे थे, तब गोवा अब भी पुर्तगाल के नियंत्रण में था। वहां आम लोगों को कई तरह की पाबंदियों का सामना करना पड़ता था। सार्वजनिक सभाएं करना आसान नहीं था और शासन के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर कड़ी कार्रवाई होती थी।
बीमारी के दौरान पहुंचे थे गोवा
साल 1946 में डॉ. राम मनोहर लोहिया स्वास्थ्य संबंधी परेशानी से गुजर रहे थे। इसी दौरान उनके मित्र और गोवा के स्वतंत्रता सेनानी डॉ. जुलियाओ मेनेसेस ने उन्हें गोवा आने का निमंत्रण दिया। आराम के लिए पहुंचे लोहिया ने वहां के हालात देखे तो चुप नहीं रह सके।
पाबंदियां तोड़ने का बनाया गया फैसला
गोवा पहुंचने के बाद लोहिया और मेनेसेस से कई स्थानीय कार्यकर्ताओं ने मुलाकात की। बातचीत के दौरान यह तय हुआ कि जनता तक सीधे पहुंचकर आजादी का संदेश दिया जाएगा। इसके बाद कई छोटी बैठकों और सभाओं का आयोजन किया गया, जिसने लोगों में उत्साह पैदा कर दिया।
18 जून की सभा से घबरा गया था प्रशासन
18 जून 1946 को मुरगांव में एक बड़ी सभा की घोषणा की गई। प्रशासन को इसकी जानकारी पहले ही मिल चुकी थी। लोगों को सभा स्थल तक पहुंचने से रोकने के लिए कई इंतजाम किए गए। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंचने लगे।
जब डॉ. लोहिया सभा स्थल पर पहुंचे तो लोगों ने जोरदार स्वागत किया। भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी और आजादी के समर्थन में नारे गूंज रहे थे।
जब लोहिया के सामने तान दी गई पिस्तौल
सभा शुरू होने से पहले एक पुर्तगाली पुलिस अधिकारी ने डॉ. लोहिया को रोकने की कोशिश की। बताया जाता है कि उसने उनके सामने पिस्तौल तानकर आगे बढ़ने से मना किया। लेकिन लोहिया बिल्कुल नहीं डरे।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि हथियारों की धमकी से आजादी की आवाज नहीं दबाई जा सकती। इसके बाद उन्होंने लोगों को संबोधित करना शुरू कर दिया। यह दृश्य वहां मौजूद लोगों के लिए बेहद प्रेरणादायक था।
गिरफ्तारी के बाद और तेज हुआ आंदोलन
सभा के कुछ ही समय बाद पुलिस ने डॉ. लोहिया और डॉ. मेनेसेस को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी की खबर फैलते ही बड़ी संख्या में लोग पुलिस थाने के बाहर जमा हो गए और दोनों नेताओं की रिहाई की मांग करने लगे।
जनता का बढ़ता दबाव देखकर प्रशासन को स्थिति संभालने में मुश्किल होने लगी। यही वह क्षण था जब गोवा में आजादी की लड़ाई जनआंदोलन का रूप लेने लगी।
गांधी तक पहुंची थी घटना की गूंज
डॉ. लोहिया की गिरफ्तारी और गोवा में हुए विरोध प्रदर्शन की खबर देशभर में फैल गई। महात्मा गांधी ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी। इसके बाद गोवा के स्वतंत्रता आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने लगी।
कई युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आंदोलन में भाग लेना शुरू किया। धीरे-धीरे सत्याग्रह, विरोध प्रदर्शन और गिरफ्तारियों का सिलसिला बढ़ता गया।
1961 में मिली आजादी
18 जून 1946 को शुरू हुई यह लड़ाई अगले कई वर्षों तक जारी रही। आखिरकार दिसंबर 1961 में भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय चलाया। इसके बाद पुर्तगाली शासन समाप्त हुआ और गोवा, दमन तथा दीव भारत का हिस्सा बन गए।
आज भी जिंदा है उस दिन की याद
मुरगांव का वही मैदान, जहां डॉ. लोहिया ने ऐतिहासिक सभा की थी, आज लोहिया मैदान के नाम से जाना जाता है। यहां उनकी प्रतिमा स्थापित है और हर साल 18 जून को लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं।
इतिहास की सबसे बड़ी सीख
गोवा क्रांति दिवस सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि साहस और जनशक्ति की मिसाल है। 18 जून 1946 की वह सभा भले ही छोटी थी, लेकिन उसने विदेशी शासन की नींव हिला दी थी। पिस्तौल की नोक पर भी न झुकने वाले डॉ. राम मनोहर लोहिया ने साबित कर दिया था कि जब जनता जाग जाती है, तब सबसे मजबूत सत्ता भी ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाती।
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