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सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी के गिनाए 5 नुकसान, कहा- अवैध शराब और भ्रष्टाचार बढ़ने का खतरा

By Malay Ojha | Published: 19 September 2026 at 09:02 AM

सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी की प्रभावशीलता पर टिप्पणी करते हुए इससे जुड़ी पांच प्रमुख समस्याओं का जिक्र किया है। कोर्ट ने राजस्व में कमी, शराबबंदी लागू करने का खर्च, पुलिस में भ्रष्टाचार, अवैध शराब के कारोबार और नशीली दवाओं से जुड़ी समस्या को इसके संभावित नुकसान बताया। इसी फैसले में कोर्ट ने महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स, 1972 के नियम 18A और 18B को रद्द कर दिया।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मेथनॉल आधारित उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। नियम 18A के तहत दवा बनाने के अलावा दूसरे कामों के लिए बेचे जाने वाले मेथनॉल में कड़वा पदार्थ और रंग मिलाना जरूरी था। नियम 18B में वैध फॉर्म-ए लाइसेंस के बिना मेथनॉल मिलने पर उसे जब्त करने का प्रावधान था।

कोर्ट ने कहा- सिर्फ पहचान से समस्या का समाधान नहीं
पीठ ने माना कि मेथनॉल में कड़वा पदार्थ और रंग मिलाने से उसकी पहचान में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे अवैध शराब बनाने के लिए उसके इस्तेमाल या दूसरी जगह पहुंचने को प्रभावी तरीके से रोकने का आधार नहीं दिखता। कोर्ट ने कहा कि राज्य यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि यह तरीका मेथनॉल के गलत इस्तेमाल को रोकने या उससे होने वाली मौतों को निश्चित रूप से कम करने में कैसे कारगर होगा।

अवैध शराब के कारोबार को लेकर गुजरात का उदाहरण
शराबबंदी के असर पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात का उदाहरण भी दिया। पीठ के मुताबिक, सख्त शराबबंदी वाले गुजरात में राज्य बनने के बाद से कम से कम 10 बड़ी जहरीली शराब की घटनाएं हुई हैं, जिनमें 600 से अधिक लोगों की मौत हुई। कोर्ट ने कहा कि पूरी शराबबंदी कई बार शराब के कारोबार को भूमिगत कर सकती है और बिना नियमन वाली जहरीली शराब का खतरा बढ़ सकता है।

हाल की जहरीली शराब की घटनाओं का भी जिक्र
पीठ ने गुजरात के भावनगर और मध्य प्रदेश के सागर में हुई हाल की जहरीली शराब की घटनाओं का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट के अनुसार, इन घटनाओं में क्रमशः 13 और 15 लोगों की मौत हुई थी। कोर्ट ने इन घटनाओं को अधिकारियों के लिए चेतावनी के तौर पर देखा।

1991 में 93 मौतों के बाद बने थे नियम
महाराष्ट्र में मेथनॉल से जुड़े इन नियमों की पृष्ठभूमि 1991 की मुंबई की जहरीली शराब त्रासदी से जुड़ी है। उस घटना में मेथनॉल मिली नकली शराब पीने से 93 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद मेथनॉल की खरीद और बिक्री को लेकर नियम बनाए गए थे।

कोर्ट ने ज्यादा प्रभावी निगरानी पर दिया जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेथनॉल की चोरी, गलत इस्तेमाल और अवैध तरीके से दूसरी जगह पहुंचने को रोकने के लिए लाइसेंस की जांच, इस्तेमाल की निगरानी, बचे हुए मेथनॉल का हिसाब और परिवहन-भंडारण की कड़ी निगरानी जैसे कदम ज्यादा उपयोगी हो सकते हैं। कोर्ट ने संबंधित नियमों को उद्देश्य हासिल करने के लिहाज से पर्याप्त रूप से प्रभावी नहीं माना।

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सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी के गिनाए 5 नुकसान, कहा- अवैध शराब और भ्रष्टाचार बढ़ने का खतरा

By Malay Ojha | Published: 19 September 2026 at 09:02 AM

सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी की प्रभावशीलता पर टिप्पणी करते हुए इससे जुड़ी पांच प्रमुख समस्याओं का जिक्र किया है। कोर्ट ने राजस्व में कमी, शराबबंदी लागू करने का खर्च, पुलिस में भ्रष्टाचार, अवैध शराब के कारोबार और नशीली दवाओं से जुड़ी समस्या को इसके संभावित नुकसान बताया। इसी फैसले में कोर्ट ने महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स, 1972 के नियम 18A और 18B को रद्द कर दिया।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मेथनॉल आधारित उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। नियम 18A के तहत दवा बनाने के अलावा दूसरे कामों के लिए बेचे जाने वाले मेथनॉल में कड़वा पदार्थ और रंग मिलाना जरूरी था। नियम 18B में वैध फॉर्म-ए लाइसेंस के बिना मेथनॉल मिलने पर उसे जब्त करने का प्रावधान था।

कोर्ट ने कहा- सिर्फ पहचान से समस्या का समाधान नहीं
पीठ ने माना कि मेथनॉल में कड़वा पदार्थ और रंग मिलाने से उसकी पहचान में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे अवैध शराब बनाने के लिए उसके इस्तेमाल या दूसरी जगह पहुंचने को प्रभावी तरीके से रोकने का आधार नहीं दिखता। कोर्ट ने कहा कि राज्य यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि यह तरीका मेथनॉल के गलत इस्तेमाल को रोकने या उससे होने वाली मौतों को निश्चित रूप से कम करने में कैसे कारगर होगा।

अवैध शराब के कारोबार को लेकर गुजरात का उदाहरण
शराबबंदी के असर पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात का उदाहरण भी दिया। पीठ के मुताबिक, सख्त शराबबंदी वाले गुजरात में राज्य बनने के बाद से कम से कम 10 बड़ी जहरीली शराब की घटनाएं हुई हैं, जिनमें 600 से अधिक लोगों की मौत हुई। कोर्ट ने कहा कि पूरी शराबबंदी कई बार शराब के कारोबार को भूमिगत कर सकती है और बिना नियमन वाली जहरीली शराब का खतरा बढ़ सकता है।

हाल की जहरीली शराब की घटनाओं का भी जिक्र
पीठ ने गुजरात के भावनगर और मध्य प्रदेश के सागर में हुई हाल की जहरीली शराब की घटनाओं का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट के अनुसार, इन घटनाओं में क्रमशः 13 और 15 लोगों की मौत हुई थी। कोर्ट ने इन घटनाओं को अधिकारियों के लिए चेतावनी के तौर पर देखा।

1991 में 93 मौतों के बाद बने थे नियम
महाराष्ट्र में मेथनॉल से जुड़े इन नियमों की पृष्ठभूमि 1991 की मुंबई की जहरीली शराब त्रासदी से जुड़ी है। उस घटना में मेथनॉल मिली नकली शराब पीने से 93 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद मेथनॉल की खरीद और बिक्री को लेकर नियम बनाए गए थे।

कोर्ट ने ज्यादा प्रभावी निगरानी पर दिया जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेथनॉल की चोरी, गलत इस्तेमाल और अवैध तरीके से दूसरी जगह पहुंचने को रोकने के लिए लाइसेंस की जांच, इस्तेमाल की निगरानी, बचे हुए मेथनॉल का हिसाब और परिवहन-भंडारण की कड़ी निगरानी जैसे कदम ज्यादा उपयोगी हो सकते हैं। कोर्ट ने संबंधित नियमों को उद्देश्य हासिल करने के लिहाज से पर्याप्त रूप से प्रभावी नहीं माना।

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