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बिहार गीत के रचयिता सत्यनारायण नहीं रहे, नितिन नवीन ने जताया दुख; बोले- बड़ी क्षति

By Malay Ojha | Published: 28 August 2026 at 02:44 PM

बिहार के वरिष्ठ कवि और गीतकार सत्यनारायण के निधन से साहित्य और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर है। 92 वर्षीय सत्यनारायण ने 27 अगस्त की देर रात पटना स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। वे बिहार के राज्य गीत ‘मेरे भारत के कंठहार’ के रचयिता थे। उनके निधन पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने शोक जताते हुए इसे बिहार और साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया।

नितिन नवीन ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि बिहार की पहचान को अपने शब्दों में आवाज देने वाले और ‘मेरे भारत के कंठहार’ के रचयिता सत्यनारायण का निधन बेहद दुखद है। उन्होंने कहा कि सत्यनारायण की लेखनी ने बिहार की गौरवशाली विरासत और सांस्कृतिक पहचान को शब्दों में पिरोया।

साहित्य जगत के लिए बड़ी क्षति
भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि सत्यनारायण का जाना केवल एक वरिष्ठ कवि का निधन नहीं, बल्कि साहित्य और बिहार की सांस्कृतिक दुनिया के लिए बड़ी क्षति है। उन्होंने दिवंगत कवि के परिजनों और उनके चाहने वालों के प्रति संवेदना जताते हुए ईश्वर से उन्हें इस दुख को सहने की शक्ति देने की प्रार्थना की।

‘मेरे भारत के कंठहार’ से मिली खास पहचान
सत्यनारायण की पहचान उनके चर्चित बिहार गीत ‘मेरे भारत के कंठहार’ से खास तौर पर जुड़ी रही। यह गीत बिहार की ऐतिहासिक विरासत, संस्कृति और गौरव को सामने रखता है। इसे मार्च 2012 में बिहार के राज्य गीत के रूप में आधिकारिक तौर पर अपनाया गया था।

जेपी आंदोलन में भी बनाई पहचान
सत्यनारायण का साहित्यिक सफर केवल गीत लेखन तक सीमित नहीं था। वर्ष 1974 के जेपी आंदोलन के दौरान उन्होंने नुक्कड़ कविता पाठ के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी रचनाओं में आम लोगों की भावनाओं, सामाजिक सरोकारों और उस दौर की हलचल की झलक दिखाई देती थी।

नालंदा खुला विश्वविद्यालय का कुलगीत भी लिखा
सत्यनारायण ने नालंदा खुला विश्वविद्यालय के कुलगीत की भी रचना की थी। लंबे साहित्यिक जीवन में उन्होंने गीत, नवगीत और कविता के क्षेत्र में काम किया। साहित्य में योगदान के लिए उन्हें कई सम्मान भी मिले। उन्हें बिहार सरकार की ओर से नागार्जुन सम्मान और भारत सरकार की ओर से भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

बिहार की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी रहेगी रचनाएं
सत्यनारायण के निधन के बाद उनकी रचनाएं उनकी साहित्यिक पहचान को जीवित रखेंगी। खासकर ‘मेरे भारत के कंठहार’ बिहार की पहचान और गौरव से जुड़ा ऐसा गीत है, जिसे उनकी सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक विरासत के तौर पर याद किया जाएगा।

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बिहार गीत के रचयिता सत्यनारायण नहीं रहे, नितिन नवीन ने जताया दुख; बोले- बड़ी क्षति

By Malay Ojha | Published: 28 August 2026 at 02:44 PM

बिहार के वरिष्ठ कवि और गीतकार सत्यनारायण के निधन से साहित्य और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर है। 92 वर्षीय सत्यनारायण ने 27 अगस्त की देर रात पटना स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। वे बिहार के राज्य गीत ‘मेरे भारत के कंठहार’ के रचयिता थे। उनके निधन पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने शोक जताते हुए इसे बिहार और साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया।

नितिन नवीन ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि बिहार की पहचान को अपने शब्दों में आवाज देने वाले और ‘मेरे भारत के कंठहार’ के रचयिता सत्यनारायण का निधन बेहद दुखद है। उन्होंने कहा कि सत्यनारायण की लेखनी ने बिहार की गौरवशाली विरासत और सांस्कृतिक पहचान को शब्दों में पिरोया।

साहित्य जगत के लिए बड़ी क्षति
भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि सत्यनारायण का जाना केवल एक वरिष्ठ कवि का निधन नहीं, बल्कि साहित्य और बिहार की सांस्कृतिक दुनिया के लिए बड़ी क्षति है। उन्होंने दिवंगत कवि के परिजनों और उनके चाहने वालों के प्रति संवेदना जताते हुए ईश्वर से उन्हें इस दुख को सहने की शक्ति देने की प्रार्थना की।

‘मेरे भारत के कंठहार’ से मिली खास पहचान
सत्यनारायण की पहचान उनके चर्चित बिहार गीत ‘मेरे भारत के कंठहार’ से खास तौर पर जुड़ी रही। यह गीत बिहार की ऐतिहासिक विरासत, संस्कृति और गौरव को सामने रखता है। इसे मार्च 2012 में बिहार के राज्य गीत के रूप में आधिकारिक तौर पर अपनाया गया था।

जेपी आंदोलन में भी बनाई पहचान
सत्यनारायण का साहित्यिक सफर केवल गीत लेखन तक सीमित नहीं था। वर्ष 1974 के जेपी आंदोलन के दौरान उन्होंने नुक्कड़ कविता पाठ के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी रचनाओं में आम लोगों की भावनाओं, सामाजिक सरोकारों और उस दौर की हलचल की झलक दिखाई देती थी।

नालंदा खुला विश्वविद्यालय का कुलगीत भी लिखा
सत्यनारायण ने नालंदा खुला विश्वविद्यालय के कुलगीत की भी रचना की थी। लंबे साहित्यिक जीवन में उन्होंने गीत, नवगीत और कविता के क्षेत्र में काम किया। साहित्य में योगदान के लिए उन्हें कई सम्मान भी मिले। उन्हें बिहार सरकार की ओर से नागार्जुन सम्मान और भारत सरकार की ओर से भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

बिहार की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी रहेगी रचनाएं
सत्यनारायण के निधन के बाद उनकी रचनाएं उनकी साहित्यिक पहचान को जीवित रखेंगी। खासकर ‘मेरे भारत के कंठहार’ बिहार की पहचान और गौरव से जुड़ा ऐसा गीत है, जिसे उनकी सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक विरासत के तौर पर याद किया जाएगा।

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