By Malay Ojha | Published: 04 June 2026 at 07:44 PM
उत्तर प्रदेश की तीन विधानसभा सीटों पर उपचुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। सबसे ज्यादा चर्चा मऊ जिले की घोसी सीट को लेकर है, जहां विधायक के निधन के बाद सीट खाली हुए छह महीने पूरे हो चुके हैं, लेकिन अब तक चुनाव आयोग ने मतदान की तारीखों का ऐलान नहीं किया है। इसी वजह से विपक्षी दलों से लेकर राजनीतिक विश्लेषकों तक कई सवाल उठने लगे हैं।
सामान्य परिस्थितियों में किसी विधानसभा सीट के रिक्त होने पर छह महीने के भीतर उपचुनाव कराया जाता है। यही वजह है कि घोसी सीट पर लगातार बढ़ती देरी चर्चा का विषय बन गई है। चुनाव आयोग की ओर से अभी तक न तो अधिसूचना जारी की गई है और न ही किसी संभावित कार्यक्रम का संकेत दिया गया है।
घोसी सीट पर सबसे ज्यादा नजर
मऊ जिले की घोसी विधानसभा सीट समाजवादी पार्टी के विधायक सुधाकर सिंह के निधन के बाद खाली हुई थी। बीस नवंबर 2025 को उनके निधन के बाद विधानसभा सचिवालय ने सीट रिक्त घोषित कर इसकी जानकारी चुनाव आयोग को भेज दी थी। अब इस सीट के रिक्त हुए छह महीने पूरे होने के बावजूद चुनाव प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है।
अन्य दो सीटों पर भी स्थिति वही
बरेली की फरीदपुर विधानसभा सीट भारतीय जनता पार्टी के विधायक प्रोफेसर श्याम बिहारी लाल के निधन के बाद खाली हुई थी। वहीं सोनभद्र जिले की दुद्धी सीट समाजवादी पार्टी के विधायक विजय सिंह के निधन के कारण रिक्त हुई। दोनों सीटों की जानकारी भी जनवरी 2026 में चुनाव आयोग को भेज दी गई थी।
आखिर देरी की वजह क्या है?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के कारण चुनाव कार्यक्रम प्रभावित हुआ हो सकता है। प्रदेश में यह प्रक्रिया कई चरणों में चली और दो बार इसकी समय-सीमा भी बढ़ाई गई थी। हालांकि आयोग अंतिम मतदाता सूची पहले ही जारी कर चुका है।
मतदाता सूची जारी होने के बाद भी इंतजार
अंतिम मतदाता सूची जारी हुए एक महीने से अधिक का समय बीत चुका है। इसके बावजूद उपचुनाव की तारीखों को लेकर कोई औपचारिक घोषणा नहीं होने से राजनीतिक दलों और मतदाताओं में असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
क्या कहता है कानून?
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में उपचुनाव से जुड़े स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं। किसी विधानसभा सीट के रिक्त होने पर चुनाव आयोग को चुनाव प्रक्रिया पूरी करानी होती है। सामान्य परिस्थितियों में रिक्त सीट को छह महीने के भीतर भरने का प्रावधान भी किया गया है।
किन परिस्थितियों में टल सकता है उपचुनाव?
कानून में कुछ अपवाद भी हैं। यदि विधानसभा का शेष कार्यकाल एक वर्ष से कम बचा हो या विशेष परिस्थितियों में चुनाव कराना संभव न हो, तो उपचुनाव टाला जा सकता है। हालांकि उत्तर प्रदेश विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल अभी समाप्त होने में लगभग एक वर्ष बाकी है।
विधानसभा का कार्यकाल बना बहस का विषय
उत्तर प्रदेश विधानसभा की पहली बैठक तेईस मई 2022 को हुई थी। इस आधार पर मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल बाइस मई 2027 तक माना जा रहा है। ऐसे में कई राजनीतिक जानकारों का मानना है कि रिक्त सीटों पर उपचुनाव कराने की पर्याप्त गुंजाइश अभी मौजूद है।
विशेषज्ञों ने उठाए सवाल
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनाव आयोग को देरी की वजह सार्वजनिक करनी चाहिए। उनका तर्क है कि यदि नियमों के तहत उपचुनाव कराना आवश्यक है तो फिर कार्यक्रम घोषित करने में इतनी देर क्यों हो रही है। इस मुद्दे पर स्पष्टता नहीं होने से सवाल लगातार बढ़ रहे हैं।
आयोग की चुप्पी से बढ़ा सस्पेंस
अब तक चुनाव आयोग की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी से भी प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी है। ऐसे में राजनीतिक दलों और मतदाताओं की निगाहें आयोग पर टिकी हुई हैं कि आखिर उत्तर प्रदेश की इन तीन महत्वपूर्ण सीटों पर उपचुनाव का बिगुल कब बजेगा।
आगे क्या?
घोसी सीट छह महीने की सीमा पार कर चुकी है, जबकि फरीदपुर और दुद्धी सीटों को भी रिक्त हुए लगभग चार महीने हो चुके हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में चुनाव आयोग का फैसला प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है।

