By aryavartalive | Published: 09 June 2026 at 08:51 PM
पटना में कोचिंग संस्थान से जुड़े विवाद के बीच फैजल खान उर्फ खान सर के खिलाफ दर्ज एफआईआर अब नए कानूनी मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। जानकारी सामने आ रही है कि उनकी कानूनी टीम उच्च न्यायालय का रुख कर सकती है और एफआईआर को रद्द कराने के लिए क्वैशिंग पिटीशन दाखिल करने पर विचार कर रही है। ऐसे में यह सवाल चर्चा का विषय बन गया है कि आखिर एफआईआर क्वैशिंग पिटीशन होती क्या है और किन परिस्थितियों में अदालत किसी आपराधिक मामले को शुरुआती चरण में ही समाप्त कर सकती है।
खान सर के खिलाफ दर्ज मामले में फिलहाल निचली अदालत से उन्हें राहत मिली हुई है। अदालत ने पुलिस को उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई करने से रोक रखा है। इसी बीच यह संभावना जताई जा रही है कि वे अब सीधे उच्च न्यायालय पहुंचकर एफआईआर को ही चुनौती दे सकते हैं।
यदि ऐसा होता है तो यह मामला केवल एक व्यक्ति की कानूनी लड़ाई नहीं रहेगा, बल्कि एफआईआर रद्द करने की न्यायिक प्रक्रिया को लेकर भी व्यापक चर्चा शुरू हो सकती है।
एफआईआर क्वैशिंग पिटीशन क्या होती है?
भारतीय कानून के तहत किसी भी दर्ज एफआईआर को सामान्य परिस्थितियों में पुलिस अपने स्तर पर समाप्त नहीं कर सकती। वहीं निचली अदालतों के अधिकार भी सीमित होते हैं। हालांकि उच्च न्यायालय के पास विशेष संवैधानिक और वैधानिक शक्तियां होती हैं, जिनका इस्तेमाल करते हुए वह किसी एफआईआर या आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर सकता है।
जब कोई व्यक्ति यह मांग लेकर अदालत पहुंचता है कि उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द किया जाए, तो इस याचिका को एफआईआर क्वैशिंग पिटीशन कहा जाता है।
उच्च न्यायालय किन आधारों पर देता है राहत?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार केवल यह दावा कर देना कि आरोपी निर्दोष है, एफआईआर रद्द कराने के लिए पर्याप्त नहीं होता। अदालत सबसे पहले यह देखती है कि एफआईआर में लगाए गए आरोपों को यदि पूरी तरह सही मान भी लिया जाए, तब क्या कोई संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं।
यदि न्यायालय को लगता है कि शिकायत दुर्भावना से दर्ज कराई गई है, कानूनी प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल किया गया है या आरोपों से कोई अपराध साबित नहीं होता, तब अदालत एफआईआर को रद्द करने पर विचार कर सकती है।
जांच और गिरफ्तारी पर भी मिल सकती है राहत
विशेषज्ञों का कहना है कि उच्च न्यायालय के पास केवल एफआईआर रद्द करने का अधिकार ही नहीं होता, बल्कि वह कुछ परिस्थितियों में जांच पर अस्थायी रोक लगाने या गिरफ्तारी से अंतरिम राहत देने का आदेश भी जारी कर सकता है।
हालांकि ऐसी राहत तभी दी जाती है, जब अदालत को प्रारंभिक तौर पर यह महसूस हो कि याचिकाकर्ता के पक्ष में मजबूत कानूनी आधार मौजूद है।
खान सर के मामले में क्या हो सकता है?
कानूनी जानकारों के मुताबिक फिलहाल निचली अदालत में मामले की सुनवाई जारी है और अगली सुनवाई निर्धारित तारीख पर होनी है। इस दौरान यदि खान सर चाहें तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
हालांकि उनके खिलाफ दर्ज धाराओं की प्रकृति को देखते हुए अदालत उपलब्ध साक्ष्यों और जांच से जुड़े दस्तावेजों का गहराई से परीक्षण करेगी। इसलिए केवल याचिका दाखिल कर देने से एफआईआर स्वतः समाप्त नहीं हो जाएगी।
बीएनएसएस की धारा 528 की क्या भूमिका है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 उच्च न्यायालय को अंतर्निहित शक्तियां प्रदान करती है। इसी प्रावधान के तहत अदालत यह जांच करती है कि एफआईआर में दर्ज आरोपों से वास्तव में कोई अपराध बनता है या नहीं।
यदि अदालत को यह लगता है कि मुकदमे का उद्देश्य केवल किसी व्यक्ति को परेशान करना है या न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग किया जा रहा है, तब वह हस्तक्षेप कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
एफआईआर रद्द करने से जुड़े मामलों में सर्वोच्च न्यायालय का एक चर्चित फैसला अक्सर उद्धृत किया जाता है। यह मामला “स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल” के नाम से जाना जाता है।
इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐसे मानक तय किए थे, जिनके आधार पर उच्च न्यायालय यह तय कर सकता है कि किसी एफआईआर को जारी रखा जाए या उसे समाप्त कर दिया जाए। इनमें आरोपों का पूरी तरह असंभव होना, दुर्भावनापूर्ण शिकायत, कानून का दुरुपयोग और प्रथम दृष्टया अपराध का न बनना जैसी परिस्थितियां शामिल हैं।
आगे क्या?
फिलहाल सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि खान सर की कानूनी टीम अगला कदम क्या उठाती है। यदि उच्च न्यायालय में क्वैशिंग पिटीशन दाखिल होती है तो यह मामला एक नए कानूनी चरण में प्रवेश करेगा, जहां अदालत को यह तय करना होगा कि एफआईआर को जारी रखा जाए या उसे रद्द कर दिया जाए।

