By Malay Ojha | Published: 17 June 2026 at 11:02 AM
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आता दिखाई दे रहा है। शिवसेना (यूबीटी) के भीतर असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है। पार्टी के 9 सांसदों में से 7 सांसदों के बागी रुख अपनाने की खबरों ने उद्धव ठाकरे की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि ये सांसद आने वाले दिनों में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट का दामन थाम सकते हैं। यह स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई, बल्कि पिछले कई वर्षों से जमा हो रही नाराजगी का नतीजा मानी जा रही है।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी के भीतर निराशा का माहौल बनने लगा था। कई नेताओं को उम्मीद थी कि चुनावी प्रदर्शन बेहतर रहेगा, लेकिन नतीजे उम्मीदों के अनुरूप नहीं आए। इसके बाद सांसदों के एक वर्ग को लगने लगा कि पार्टी नेतृत्व हार के कारणों पर गंभीरता से विचार नहीं कर रहा है। यही वजह रही कि धीरे-धीरे असंतोष बढ़ता गया।
विपक्ष में रहने का असर भी पड़ा
पार्टी के कई सांसदों का मानना था कि विपक्ष में होने की वजह से उनकी राजनीतिक सक्रियता सीमित होती जा रही है। जनता की अपेक्षाएं लगातार बढ़ रही थीं, लेकिन उनके पास संसाधन और सरकारी सहयोग अपेक्षित स्तर पर नहीं था। इससे उनके सामने अपने क्षेत्रों में पकड़ बनाए रखना चुनौती बनता जा रहा था।
विकास कार्यों को लेकर बढ़ी मुश्किल
सांसदों की सबसे बड़ी चिंता अपने संसदीय क्षेत्रों में विकास कार्यों को लेकर थी। राज्य में सत्तारूढ़ गठबंधन के पास प्रशासनिक ताकत और संसाधन होने के कारण विपक्षी सांसदों को कई बार योजनाओं और फंड से जुड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इससे स्थानीय स्तर पर उनकी राजनीतिक स्थिति प्रभावित होने लगी।
स्थानीय चुनावों ने बढ़ाई चिंता
विधानसभा चुनाव के बाद हुए नगर निकाय, नगर परिषद और जिला परिषद चुनावों में भी पार्टी को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली। कई इलाकों में संगठन कमजोर दिखाई दिया। लगातार खराब प्रदर्शन ने सांसदों के बीच यह सवाल खड़ा कर दिया कि यदि यही स्थिति जारी रही तो अगले चुनाव में उनका भविष्य क्या होगा।
मुंबई के नतीजों ने बढ़ाई बेचैनी
मुंबई को हमेशा से शिवसेना का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। लेकिन हाल के चुनावी नतीजों ने पार्टी नेताओं को चिंता में डाल दिया। मजबूत संगठन और बड़े जनाधार के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने से कई सांसदों को लगा कि पार्टी की पारंपरिक ताकत धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है।
नेतृत्व और सांसदों के बीच बढ़ी दूरी
पार्टी के भीतर यह भावना भी उभरने लगी कि सांसदों और शीर्ष नेतृत्व के बीच पहले जैसा संवाद नहीं रहा। कुछ नेताओं का मानना था कि पार्टी को आक्रामक राजनीतिक रणनीति अपनानी चाहिए थी और जनता के मुद्दों पर ज्यादा सक्रिय दिखना चाहिए था। संवाद की कमी ने असंतोष को और बढ़ाने का काम किया।
शिंदे गुट का बढ़ता प्रभाव
नाराज सांसदों के बीच यह धारणा भी बनी कि उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और सांसद श्रीकांत शिंदे जरूरत पड़ने पर उनकी राजनीतिक और व्यक्तिगत स्तर पर मदद करते रहे हैं। कई सांसदों को लगा कि शिंदे गुट के साथ रहने से उनके राजनीतिक हित अधिक सुरक्षित रह सकते हैं। यही कारण है कि समय के साथ कुछ नेताओं का झुकाव उस ओर बढ़ता गया।
मातोश्री की बैठक बनी चर्चा का विषय
हाल ही में मातोश्री में सांसदों की एक अहम बैठक बुलाई गई थी। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, सभी सांसद इसमें सक्रिय रूप से शामिल नहीं हुए। इसी बैठक के बाद पार्टी के भीतर चल रही नाराजगी की चर्चाओं ने और जोर पकड़ लिया। बताया जा रहा है कि बैठक में दिए गए कुछ संदेशों ने पहले से असंतुष्ट नेताओं के मन में नए सवाल खड़े कर दिए।
2029 की तैयारी ने बदली सोच
कई सांसद अब अगले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर अपनी राजनीतिक रणनीति तय कर रहे हैं। उनका मानना है कि सिर्फ व्यक्तिगत लोकप्रियता के भरोसे चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। संगठन की ताकत, संसाधन और राजनीतिक समीकरण भविष्य में बड़ी भूमिका निभाएंगे। इसी सोच के चलते कुछ नेताओं ने नए विकल्पों पर गंभीरता से विचार शुरू कर दिया है।
उद्धव ठाकरे के सामने सबसे बड़ी चुनौती
शिवसेना (यूबीटी) के लिए यह सिर्फ सांसदों की नाराजगी का मामला नहीं है, बल्कि संगठन की एकजुटता की परीक्षा भी है। यदि बगावती नेताओं की संख्या बढ़ती है तो आने वाले समय में पार्टी को बड़ा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसे में अब सबकी नजर उद्धव ठाकरे की अगली रणनीति पर टिकी हुई है।

