By Malay Ojha | Published: 22 June 2026 at 12:19 PM
भारत में इस बार मानसून की शुरुआत बेहद असामान्य तस्वीर पेश कर रही है। देश के कई हिस्से भीषण गर्मी और बारिश की भारी कमी से जूझ रहे हैं, जबकि पूर्वोत्तर भारत में रिकॉर्ड तोड़ बारिश ने बाढ़ का खतरा बढ़ा दिया है। मौसम विभाग के मुताबिक 20 जून तक देशभर में सामान्य से 41 से 46 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। वैज्ञानिक इसके पीछे अल-नीनो और बदलते जलवायु पैटर्न को बड़ी वजह मान रहे हैं।
जून के तीसरे सप्ताह तक बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ के कई जिलों में मानसून की रफ्तार बेहद धीमी बनी हुई है। कई इलाकों में बादल तो दिख रहे हैं, लेकिन बारिश नहीं हो रही। इसका असर सीधे खेती और जल संसाधनों पर पड़ने लगा है।
लू ने बढ़ाई लोगों की परेशानी
बारिश नहीं होने की वजह से गर्मी का प्रकोप और बढ़ गया है। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड और महाराष्ट्र के कई हिस्सों में तापमान 42 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। मौसम विभाग ने इन राज्यों में सामान्य से ज्यादा लू चलने की आशंका जताई है। दिनभर चल रही गर्म हवाओं से लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो गया है।
महाराष्ट्र में गहराने लगा जल संकट
महाराष्ट्र के कई हिस्सों में मानसून अभी तक पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पाया है। विदर्भ और मराठवाड़ा के कई इलाके सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहे हैं। किसान खरीफ फसलों की बुआई टाल रहे हैं। वहीं मुंबई समेत कई शहरों में जलाशयों का स्तर तेजी से घटने से पानी की चिंता बढ़ गई है।
मेघालय में रिकॉर्ड बारिश ने बढ़ाई चिंता
देश के दूसरे छोर पर तस्वीर बिल्कुल अलग है। मेघालय के मौसिनराम में पिछले 24 घंटों में 53 सेंटीमीटर और चेरापूंजी में 47 सेंटीमीटर बारिश दर्ज की गई है। दोनों इलाके दुनिया के सबसे ज्यादा बारिश वाले क्षेत्रों में गिने जाते हैं, लेकिन इस बार बारिश की तीव्रता सामान्य से कहीं ज्यादा देखी जा रही है।
बाढ़ और भूस्खलन का बढ़ा खतरा
मौसम विभाग ने पूर्वोत्तर भारत और सब-हिमालयी पश्चिम बंगाल में अगले कुछ दिनों तक भारी से अत्यधिक भारी बारिश की चेतावनी दी है। लगातार बारिश के कारण नदियों का जलस्तर बढ़ सकता है और कई इलाकों में बाढ़ तथा भूस्खलन की घटनाएं सामने आ सकती हैं।
आखिर क्या है अल-नीनो?
अल-नीनो एक ऐसी मौसमी घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। जब समुद्र का तापमान बढ़ता है तो दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर उसका असर पड़ता है। भारत में इसका सबसे ज्यादा प्रभाव मानसून पर देखा जाता है।
भारत के मानसून को कैसे प्रभावित करता है अल-नीनो?
आमतौर पर अल-नीनो दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर कर देता है। इससे बारिश लाने वाली हवाओं की ताकत कम हो जाती है और मानसून आगे बढ़ने में सुस्त पड़ जाता है। नतीजा यह होता है कि कुछ इलाकों में सूखे जैसी स्थिति बन जाती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में अचानक बहुत ज्यादा बारिश होने लगती है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि अब मौसम की चरम घटनाएं पहले की तुलना में ज्यादा देखने को मिल रही हैं। वैश्विक तापमान बढ़ने से महासागर तेजी से गर्म हो रहे हैं, जिससे अल-नीनो जैसी घटनाओं का असर भी ज्यादा गंभीर हो गया है। जहां बारिश हो रही है, वहां अत्यधिक बारिश हो रही है और जहां बारिश की जरूरत है, वहां सूखे जैसे हालात बन रहे हैं।
खेती पर सबसे बड़ा खतरा
मानसून की सुस्ती का सबसे ज्यादा असर खेती पर पड़ने वाला है। धान, मक्का और सोयाबीन जैसी खरीफ फसलें समय पर बारिश पर निर्भर करती हैं। यदि आने वाले दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई तो बुआई का रकबा घट सकता है और उत्पादन पर असर पड़ सकता है। इससे खाद्यान्न कीमतों पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है।
आगे क्या कहते हैं मौसम के संकेत?
मौसम विभाग का कहना है कि जून के आखिर तक मानसून की स्थिति में कुछ सुधार हो सकता है और समुद्री हवाएं मजबूत पड़ सकती हैं। हालांकि पूरे मौसम में सामान्य से कम बारिश की आशंका अभी भी बनी हुई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में ऐसे विरोधाभासी मौसम पैटर्न और ज्यादा देखने को मिल सकते हैं।
बदलते मौसम का बड़ा संदेश
एक तरफ झुलसाती गर्मी और दूसरी तरफ बाढ़ जैसी बारिश, यह तस्वीर साफ बताती है कि मौसम का संतुलन तेजी से बदल रहा है। ऐसे हालात से निपटने के लिए बेहतर मौसम पूर्वानुमान, जल संरक्षण और खेती के नए तरीकों पर तेजी से काम करने की जरूरत है।
Aryavarta Live के WhatsApp Channel से जुड़ें और हर महत्वपूर्ण अपडेट सीधे अपने मोबाइल पर पाएं।
WhatsApp चैनल जॉइन करें

