By Malay Ojha | Published: 23 June 2026 at 01:11 PM
लखनऊ के अलीगंज में 15 बच्चों की दर्दनाक मौत के बाद प्रशासन हरकत में आ गया है। जिस अवैध तीन मंजिला इमारत में यह भीषण अग्निकांड हुआ, उसे गिराने के लिए लखनऊ विकास प्राधिकरण ने दोबारा नोटिस जारी किया है। इतना ही नहीं, वर्षों तक इस इमारत को बचाने वाले अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में आ गई है और कई अधिकारियों पर कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार ने मंगलवार को बताया कि अलीगंज की जिस इमारत में सोमवार को भीषण आग लगी थी, उसके खिलाफ निर्माण नियमों के उल्लंघन का मामला पहले से दर्ज था। अब दोबारा ध्वस्तीकरण का नोटिस जारी किया गया है और पूरे मामले की विभागीय जांच शुरू कर दी गई है।
अधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल
प्राधिकरण ने उन अधिकारियों और इंजीनियरों की पहचान शुरू कर दी है, जिनकी लापरवाही या मिलीभगत के कारण यह इमारत वर्षों तक चलती रही। प्रशासन का कहना है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
2016 में ही गिराने का आदेश हुआ था
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस इमारत को साल 2016 में ही अवैध घोषित कर गिराने का आदेश दिया गया था। लेकिन कुछ ही समय बाद यह आदेश वापस ले लिया गया। इसके बाद इमारत में लगातार व्यावसायिक गतिविधियां चलती रहीं और सुरक्षा नियमों की खुलेआम अनदेखी होती रही।
4 लोगों की गिरफ्तारी, चार अधिकारी निलंबित
मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद पुलिस ने मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आरोपियों में रामकृष्ण उपाध्याय, वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला, तुषार कृष्ण जायसवाल और सुरेश कुमार साहू शामिल हैं। इसके अलावा बिजली विभाग, अग्निशमन विभाग और लखनऊ विकास प्राधिकरण के चार अधिकारियों को भी प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए निलंबित कर दिया गया है।
सरकार ने बनाई विशेष जांच टीम
पूरे मामले की जांच के लिए राज्य सरकार ने दो सदस्यीय विशेष जांच दल का गठन किया है। यह टीम आग लगने के कारण, सुरक्षा नियमों की अनदेखी और अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करेगी। जांच रिपोर्ट जल्द शासन को सौंपी जाएगी।
कैसे बनी मौत का जाल यह इमारत?
अलीगंज के सेक्टर-डी स्थित इस तीन मंजिला भवन में एनिमेशन सेंटर, लाइब्रेरी और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां चल रही थीं। दूसरी मंजिल पर बने एनिमेशन सेंटर में अचानक आग लग गई और कुछ ही मिनटों में पूरी इमारत धुएं से भर गई।
बायोमेट्रिक लॉक बना मौत का कारण
बताया जा रहा है कि भवन का मुख्य दरवाजा बायोमेट्रिक प्रणाली से संचालित होता था। आग लगने के बाद बिजली चली गई और दरवाजा अपने आप बंद हो गया। इससे अंदर मौजूद छात्रों के लिए बाहर निकलने का रास्ता बंद हो गया।
न फायर सिस्टम, न इमरजेंसी निकास
इमारत में आग से बचाव के लिए कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं थी। भवन पूरी तरह शीशों से ढका हुआ था और कोई वैकल्पिक निकास मार्ग भी नहीं था। धुएं से बचने के लिए कई छात्र कमरों और शौचालयों में छिप गए, लेकिन ऑक्सीजन की कमी और जहरीली गैस के कारण उनकी जान चली गई।
दीवार तोड़कर निकाले गए बच्चे
दमकल और राहत दल को अंदर फंसे लोगों तक पहुंचने के लिए इमारत की दीवारें तोड़नी पड़ीं। इस दर्दनाक हादसे में 15 मासूमों की मौत हो गई, जबकि नौ लोग गंभीर रूप से घायल हैं और उनका इलाज जारी है।
कई बड़े सवाल छोड़ गया हादसा
यह हादसा सिर्फ एक आग की घटना नहीं, बल्कि शहरों में धड़ल्ले से चल रही अवैध व्यावसायिक इमारतों, कोचिंग सेंटरों और सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर बड़ा सवाल है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि आखिर 10 साल तक इस इमारत को बचाने वालों पर क्या कार्रवाई होती है और क्या इस हादसे से कोई सबक लिया जाएगा।
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