By Malay Ojha | Published: 23 June 2026 at 06:10 PM
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा सियासी धमाका हुआ है। तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व वाले ममता बनर्जी गुट ने मंगलवार को पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल नेताओं पर कड़ा कदम उठाते हुए कोलकाता के पूर्व मेयर और पूर्व मंत्री फिरहाद हकीम समेत कुल आठ नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया है। यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है।
पार्टी नेतृत्व की ओर से पहले इन सभी नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। उन पर आरोप था कि वे लगातार पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं और संगठन की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं। नोटिस जारी होने के कुछ ही घंटों के भीतर कड़ा फैसला लेते हुए इन नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
निष्कासित किए गए नेताओं में जावेद अहमद खान, अरूप रॉय, रथिन घोष, बिप्लब मित्रा, सबीना यास्मीन, अरूप बिस्वास और स्नेहाशीष चक्रवर्ती शामिल हैं।
बागियों का दावा: नया नेतृत्व ढांचा तैयार
इस पूरे विवाद की जड़ सोमवार को सामने आई, जब बागी खेमे ने दावा किया कि पार्टी के लिए नया नेतृत्व ढांचा तैयार कर लिया गया है। विपक्षी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में एक नए ढांचे की घोषणा की गई, जिसमें पार्टी प्रमुख की जगह वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को चेयरपर्सन बनाने की बात कही गई। इस कदम के बाद ही पार्टी में अंदरूनी टकराव खुलकर सामने आ गया।
नई कार्यसमिति और बड़ा दावा
बागी खेमे ने 30 सदस्यों वाली एक नई राष्ट्रीय कार्यसमिति के गठन का भी ऐलान किया है। दावा किया गया है कि इस ढांचे को कई विधायकों और सांसदों का समर्थन हासिल है। यहां तक कहा गया कि बड़ी संख्या में विधायकों और सांसदों ने इस नए समूह का साथ दिया है। हालांकि पार्टी की आधिकारिक स्थिति इस दावे को पूरी तरह खारिज करती है और इसे अनुशासनहीनता का हिस्सा बता रही है।
ममता बनर्जी की भूमिका और पार्टी की स्थिति
ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर इस पार्टी की नींव रखी थी और तब से वह संगठन की केंद्रीय चेहरा रही हैं। मौजूदा घटनाक्रम को पार्टी नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, आने वाले दिनों में जिला स्तर पर भी संगठनात्मक बदलाव किए जा सकते हैं ताकि पार्टी पर नियंत्रण मजबूत किया जा सके।
आगे की रणनीति और राजनीतिक असर
पार्टी के अंदर चल रही इस खींचतान का असर पश्चिम बंगाल की राजनीति पर भी देखने को मिल सकता है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में और भी बड़े फैसले हो सकते हैं। राजनीतिक जानकारों के अनुसार यह विवाद केवल नेतृत्व का नहीं बल्कि संगठन की दिशा तय करने की लड़ाई बन गया है।
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