Thursday, July 2, 2026

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मोदी सरकार का बड़ा दांव! 30 दिन जेल में रहे तो मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री की कुर्सी जाएगी? मानसून सत्र में आ सकता है ऐतिहासिक बिल

By Malay Ojha | Published: 02 July 2026 at 09:37 AM

संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले केंद्र सरकार के एक प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयक ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। चर्चा इस बात की है कि यदि कोई मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री गंभीर अपराध के मामले में लगातार 30 दिन तक पुलिस या न्यायिक हिरासत में रहता है, तो उसे अपने पद से हटना पड़ सकता है। बताया जा रहा है कि इस प्रस्ताव पर काम कर रही संयुक्त संसदीय समिति 17 जुलाई को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप सकती है, जिसके बाद मानसून सत्र में इसे पेश किए जाने की संभावना जताई जा रही है।

प्रस्तावित विधेयक के अनुसार यह नियम केवल ऐसे मामलों में लागू होगा, जिनमें आरोपित अपराध के लिए पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है। यदि संबंधित जनप्रतिनिधि लगातार 30 दिन तक हिरासत में रहता है और इस दौरान उसे अदालत से राहत नहीं मिलती, तो 31वें दिन उसका पद स्वतः समाप्त माना जा सकता है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य सरकार के अनुसार सार्वजनिक पदों पर जवाबदेही बढ़ाना बताया जा रहा है।

किन नेताओं पर लागू होगा?
प्रस्तावित कानून का दायरा केवल मंत्रियों तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें केंद्र और राज्यों के मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री सभी शामिल होंगे। संयुक्त संसदीय समिति की अध्यक्षता भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी कर रही हैं। समिति के स्तर पर इस प्रावधान को बनाए रखने पर सहमति बताई जा रही है, हालांकि राजनीतिक दुरुपयोग रोकने के लिए कुछ अतिरिक्त सुरक्षा उपाय भी जोड़े जा सकते हैं।

विपक्ष ने क्यों जताई आपत्ति?
कांग्रेस और विपक्षी दलों का कहना है कि केवल गिरफ्तारी या हिरासत के आधार पर किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को पद से हटाना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा। उनका तर्क है कि जब तक अदालत किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराती, तब तक केवल हिरासत को पद समाप्त करने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। विपक्ष का आरोप है कि इस व्यवस्था का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों पर दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है।

सरकार का पक्ष क्या है?
सरकार का कहना है कि प्रस्तावित व्यवस्था किसी के साथ अन्याय नहीं करती। उसके अनुसार 30 दिन की अवधि के दौरान आरोपी के पास कई बार जमानत लेने का अवसर रहेगा। यदि अदालत जमानत दे देती है तो यह प्रावधान लागू नहीं होगा। सरकार का दावा है कि यह व्यवस्था केवल गंभीर मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लाई जा रही है।

संसद में सबसे बड़ी चुनौती
चूंकि यह संविधान संशोधन विधेयक है, इसलिए इसे लोकसभा और राज्यसभा दोनों में विशेष बहुमत की जरूरत होगी। ऐसे में सरकार के लिए दोनों सदनों में पर्याप्त समर्थन जुटाना सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुछ क्षेत्रीय दल इस विधेयक के भविष्य में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

अब सबकी नजर मानसून सत्र पर
यदि यह विधेयक संसद में पेश होता है और पारित हो जाता है, तो यह देश की राजनीतिक व्यवस्था में सबसे बड़े संवैधानिक बदलावों में से एक माना जाएगा। एक ओर सरकार इसे राजनीतिक जवाबदेही मजबूत करने वाला कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती मान रहा है। ऐसे में मानसून सत्र के दौरान इस प्रस्ताव पर होने वाली बहस पूरे देश की नजरों में रहेगी।

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मोदी सरकार का बड़ा दांव! 30 दिन जेल में रहे तो मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री की कुर्सी जाएगी? मानसून सत्र में आ सकता है ऐतिहासिक बिल

By Malay Ojha | Published: 02 July 2026 at 09:37 AM

संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले केंद्र सरकार के एक प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयक ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। चर्चा इस बात की है कि यदि कोई मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री गंभीर अपराध के मामले में लगातार 30 दिन तक पुलिस या न्यायिक हिरासत में रहता है, तो उसे अपने पद से हटना पड़ सकता है। बताया जा रहा है कि इस प्रस्ताव पर काम कर रही संयुक्त संसदीय समिति 17 जुलाई को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप सकती है, जिसके बाद मानसून सत्र में इसे पेश किए जाने की संभावना जताई जा रही है।

प्रस्तावित विधेयक के अनुसार यह नियम केवल ऐसे मामलों में लागू होगा, जिनमें आरोपित अपराध के लिए पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है। यदि संबंधित जनप्रतिनिधि लगातार 30 दिन तक हिरासत में रहता है और इस दौरान उसे अदालत से राहत नहीं मिलती, तो 31वें दिन उसका पद स्वतः समाप्त माना जा सकता है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य सरकार के अनुसार सार्वजनिक पदों पर जवाबदेही बढ़ाना बताया जा रहा है।

किन नेताओं पर लागू होगा?
प्रस्तावित कानून का दायरा केवल मंत्रियों तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें केंद्र और राज्यों के मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री सभी शामिल होंगे। संयुक्त संसदीय समिति की अध्यक्षता भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी कर रही हैं। समिति के स्तर पर इस प्रावधान को बनाए रखने पर सहमति बताई जा रही है, हालांकि राजनीतिक दुरुपयोग रोकने के लिए कुछ अतिरिक्त सुरक्षा उपाय भी जोड़े जा सकते हैं।

विपक्ष ने क्यों जताई आपत्ति?
कांग्रेस और विपक्षी दलों का कहना है कि केवल गिरफ्तारी या हिरासत के आधार पर किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को पद से हटाना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा। उनका तर्क है कि जब तक अदालत किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराती, तब तक केवल हिरासत को पद समाप्त करने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। विपक्ष का आरोप है कि इस व्यवस्था का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों पर दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है।

सरकार का पक्ष क्या है?
सरकार का कहना है कि प्रस्तावित व्यवस्था किसी के साथ अन्याय नहीं करती। उसके अनुसार 30 दिन की अवधि के दौरान आरोपी के पास कई बार जमानत लेने का अवसर रहेगा। यदि अदालत जमानत दे देती है तो यह प्रावधान लागू नहीं होगा। सरकार का दावा है कि यह व्यवस्था केवल गंभीर मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लाई जा रही है।

संसद में सबसे बड़ी चुनौती
चूंकि यह संविधान संशोधन विधेयक है, इसलिए इसे लोकसभा और राज्यसभा दोनों में विशेष बहुमत की जरूरत होगी। ऐसे में सरकार के लिए दोनों सदनों में पर्याप्त समर्थन जुटाना सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुछ क्षेत्रीय दल इस विधेयक के भविष्य में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

अब सबकी नजर मानसून सत्र पर
यदि यह विधेयक संसद में पेश होता है और पारित हो जाता है, तो यह देश की राजनीतिक व्यवस्था में सबसे बड़े संवैधानिक बदलावों में से एक माना जाएगा। एक ओर सरकार इसे राजनीतिक जवाबदेही मजबूत करने वाला कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती मान रहा है। ऐसे में मानसून सत्र के दौरान इस प्रस्ताव पर होने वाली बहस पूरे देश की नजरों में रहेगी।

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