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बिहार में अब महिलाओं के हिसाब से बनेगा बजट? योजनाओं के असर की होगी लैंगिक समीक्षा

By Malay Ojha | Published: 19 August 2026 at 09:32 PM

बिहार में सरकारी योजनाओं और बजट का महिलाओं व बालिकाओं पर कितना वास्तविक असर पड़ रहा है, अब इसका आकलन लैंगिक दृष्टिकोण से करने पर जोर दिया जा रहा है। इसी दिशा में महिला एवं बाल विकास निगम ने जेंडर-रिस्पॉन्सिव बजटिंग पर राज्य स्तरीय समीक्षा-सह-संवेदीकरण कार्यशाला आयोजित की। इसमें योजनाओं की राशि खर्च होने के बजाय उससे महिलाओं और बालिकाओं को मिले वास्तविक लाभ को भी विकास का पैमाना बनाने पर जोर दिया गया।

कार्यशाला में योजना एवं विकास विभाग की अपर मुख्य सचिव डॉ. एन. विजय लक्ष्मी ने कहा कि जेंडर बजटिंग को केवल महिलाओं के लिए बजट में अलग से राशि रखने तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। इसका असली उद्देश्य महिलाओं को विकास की मुख्यधारा में बराबर भागीदारी देना और उनके जीवन में योजनाओं का ठोस असर सुनिश्चित करना होना चाहिए।

योजनाओं का असर जमीन पर दिखना जरूरी
उन्होंने कहा कि किसी योजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि उसमें कितनी राशि खर्च हुई। यह देखना भी जरूरी है कि उस खर्च से महिलाओं और बालिकाओं की स्थिति में कितना बदलाव आया। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में योजनाओं के परिणाम को महिलाओं की वास्तविक स्थिति से जोड़कर देखने की जरूरत है।

जिला और प्रखंड स्तर पर बदले योजना बनाने का तरीका
अपर मुख्य सचिव ने जिला और प्रखंड स्तर पर योजना तैयार करते समय महिलाओं की जरूरतों को प्राथमिकता देने की बात कही। उन्होंने कहा कि स्थानीय स्तर पर महिलाओं की समस्याएं और प्राथमिकताएं अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए योजनाएं ऊपर से तय करने के बजाय स्थानीय जरूरतों को समझकर तैयार करने पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए।

महिलाओं के अनदेखे काम को भी समझना होगा
डॉ. एन. विजय लक्ष्मी ने महिलाओं के घर और परिवार के लिए किए जाने वाले अवैतनिक काम का भी उल्लेख किया। घर संभालने, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल सहित ऐसे कई काम हैं, जिनका आर्थिक मूल्य सीधे दिखाई नहीं देता। इसके बावजूद परिवार और समाज के संचालन में महिलाओं का यह योगदान बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने विकास की योजनाओं में इस वास्तविकता को भी ध्यान में रखने की जरूरत बताई।

महिला कल्याण से आगे बढ़कर आर्थिक भागीदारी पर जोर
उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए सिर्फ कल्याणकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, आर्थिक भागीदारी और उद्यमिता को भी समान महत्व मिलना चाहिए। बजट की योजना इस तरह बनाई जानी चाहिए कि महिलाएं लाभ पाने वाली ही नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदार भी बनें।

खर्च नहीं, परिणाम बने बजट की कसौटी
वित्त विभाग की सचिव (व्यय) रचना पाटिल ने कहा कि बजट तैयार करने और वित्तीय प्रक्रिया में लैंगिक दृष्टिकोण को शामिल करना जरूरी है। उन्होंने योजनाओं के परिणामों को केवल खर्च हुई राशि से मापने के बजाय महिलाओं और बालिकाओं पर पड़े वास्तविक प्रभाव को भी जांचने की जरूरत बताई।

अलग-अलग आंकड़ों के बिना सही तस्वीर मुश्किल
महिला एवं बाल विकास निगम की प्रबंध निदेशक इनायत खान ने कहा कि जेंडर-रिस्पॉन्सिव बजटिंग को प्रभावी बनाने के लिए योजना बनाने से लेकर उसके क्रियान्वयन और मूल्यांकन तक महिलाओं और पुरुषों के आंकड़े अलग-अलग दर्ज किए जाने चाहिए। इससे यह पता लगाने में आसानी होगी कि किसी योजना का लाभ महिलाओं और पुरुषों तक किस अनुपात में पहुंचा।

हर योजना के जेंडर प्रभाव का होगा बेहतर आकलन
उन्होंने कहा कि अलग-अलग लाभार्थियों के आंकड़े उपलब्ध होने पर यह समझना आसान होगा कि किसी योजना का महिलाओं पर क्या असर पड़ा। इसी आधार पर आगे की योजना और बजट में जरूरी बदलाव किए जा सकते हैं। इससे बजट बनाने की प्रक्रिया ज्यादा परिणाम आधारित और वास्तविक जरूरतों के करीब हो सकती है।

विभागों की नियमित बजट प्रक्रिया का हिस्सा बने जेंडर बजटिंग
भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सांख्यिकी ब्यूरो के निदेशक मनोज कुमार ने कहा कि जेंडर बजटिंग को किसी एक विभाग की अलग गतिविधि के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इसे सभी संबंधित विभागों की नियमित योजना और बजट प्रक्रिया का हिस्सा बनाने की जरूरत है।

जेंडर बजट प्रकोष्ठ मजबूत करने पर जोर
उन्होंने विभागों में जेंडर बजट प्रकोष्ठ को मजबूत करने और अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता बताई। साथ ही महिलाओं और पुरुषों के अलग-अलग आंकड़ों का बेहतर इस्तेमाल करने पर जोर दिया गया। उनके मुताबिक इस तरह की व्यवस्था से बजट में किए गए प्रावधानों को महिलाओं और बालिकाओं की जरूरतों तथा अपेक्षित परिणामों से जोड़ना आसान होगा।

तकनीकी सत्र में बजट और विकास लक्ष्यों पर चर्चा
कार्यशाला के तकनीकी सत्रों में बिहार सरकार के विभिन्न विभागों के अधिकारियों और विशेषज्ञों ने जेंडर-रिस्पॉन्सिव बजटिंग के अलग-अलग पहलुओं पर जानकारी साझा की। बिहार इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी की डॉ. बार्ना गांगुली ने परिणाम आधारित बजट, सतत विकास लक्ष्यों और जेंडर बजटिंग के बीच संबंध पर विस्तार से चर्चा की।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी साझा किए गए
कार्यशाला में संयुक्त राष्ट्र महिला संस्था के तकनीकी विशेषज्ञों ने भी हिस्सा लिया। विशेषज्ञों ने जेंडर-रिस्पॉन्सिव बजटिंग को जमीन पर लागू करने के अंतरराष्ट्रीय अनुभव और काम करने के तरीकों की जानकारी दी। इससे बिहार में इस व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए नए दृष्टिकोण सामने आए।

बजट में महिलाओं की जरूरत को जगह देने पर मंथन
पूरे कार्यक्रम के दौरान इस बात पर चर्चा हुई कि सरकारी योजनाओं और बजट में महिलाओं तथा बालिकाओं की जरूरतों को किस तरह बेहतर तरीके से शामिल किया जाए। साथ ही यह भी विचार किया गया कि बजट का महिलाओं पर पड़ने वाला असर कैसे मापा जाए और उसके आधार पर भविष्य की योजनाओं में बदलाव कैसे किया जा सकता है।

स्थानीय योजना से जोड़े जाने पर भी जोर
कार्यशाला में जेंडर बजटिंग को विकेंद्रीकृत योजना निर्माण से जोड़ने पर भी चर्चा हुई। इसका मतलब है कि जिला और प्रखंड स्तर पर योजना तैयार करते समय स्थानीय महिलाओं की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाए। इससे योजनाओं को जरूरत के हिसाब से तैयार करने और उनके परिणाम को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

बिहार में बजट को ज्यादा परिणाम आधारित बनाने की कोशिश
राज्य स्तरीय इस कार्यशाला का मुख्य संदेश यही रहा कि महिलाओं के लिए बजट में राशि तय करना ही पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती यह पता लगाना है कि उस राशि से महिलाओं और बालिकाओं के जीवन में कितना बदलाव आया। योजनाओं में अलग-अलग आंकड़ों के इस्तेमाल और उनके नियमित विश्लेषण से सरकार को यह समझने में मदद मिल सकती है कि कहां बेहतर परिणाम मिल रहे हैं और कहां सुधार की जरूरत है।

महिला सशक्तीकरण को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिश
महिला एवं बाल विकास निगम की ओर से आयोजित इस कार्यशाला में सरकारी विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों, विशेषज्ञों और तकनीकी प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। चर्चा के दौरान सामने आए सुझावों से बिहार में जेंडर-रिस्पॉन्सिव बजटिंग को ज्यादा व्यावहारिक, परिणाम आधारित और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप बनाने की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता तैयार होता दिखा।

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बिहार में अब महिलाओं के हिसाब से बनेगा बजट? योजनाओं के असर की होगी लैंगिक समीक्षा

By Malay Ojha | Published: 19 August 2026 at 09:32 PM

बिहार में सरकारी योजनाओं और बजट का महिलाओं व बालिकाओं पर कितना वास्तविक असर पड़ रहा है, अब इसका आकलन लैंगिक दृष्टिकोण से करने पर जोर दिया जा रहा है। इसी दिशा में महिला एवं बाल विकास निगम ने जेंडर-रिस्पॉन्सिव बजटिंग पर राज्य स्तरीय समीक्षा-सह-संवेदीकरण कार्यशाला आयोजित की। इसमें योजनाओं की राशि खर्च होने के बजाय उससे महिलाओं और बालिकाओं को मिले वास्तविक लाभ को भी विकास का पैमाना बनाने पर जोर दिया गया।

कार्यशाला में योजना एवं विकास विभाग की अपर मुख्य सचिव डॉ. एन. विजय लक्ष्मी ने कहा कि जेंडर बजटिंग को केवल महिलाओं के लिए बजट में अलग से राशि रखने तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। इसका असली उद्देश्य महिलाओं को विकास की मुख्यधारा में बराबर भागीदारी देना और उनके जीवन में योजनाओं का ठोस असर सुनिश्चित करना होना चाहिए।

योजनाओं का असर जमीन पर दिखना जरूरी
उन्होंने कहा कि किसी योजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि उसमें कितनी राशि खर्च हुई। यह देखना भी जरूरी है कि उस खर्च से महिलाओं और बालिकाओं की स्थिति में कितना बदलाव आया। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में योजनाओं के परिणाम को महिलाओं की वास्तविक स्थिति से जोड़कर देखने की जरूरत है।

जिला और प्रखंड स्तर पर बदले योजना बनाने का तरीका
अपर मुख्य सचिव ने जिला और प्रखंड स्तर पर योजना तैयार करते समय महिलाओं की जरूरतों को प्राथमिकता देने की बात कही। उन्होंने कहा कि स्थानीय स्तर पर महिलाओं की समस्याएं और प्राथमिकताएं अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए योजनाएं ऊपर से तय करने के बजाय स्थानीय जरूरतों को समझकर तैयार करने पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए।

महिलाओं के अनदेखे काम को भी समझना होगा
डॉ. एन. विजय लक्ष्मी ने महिलाओं के घर और परिवार के लिए किए जाने वाले अवैतनिक काम का भी उल्लेख किया। घर संभालने, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल सहित ऐसे कई काम हैं, जिनका आर्थिक मूल्य सीधे दिखाई नहीं देता। इसके बावजूद परिवार और समाज के संचालन में महिलाओं का यह योगदान बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने विकास की योजनाओं में इस वास्तविकता को भी ध्यान में रखने की जरूरत बताई।

महिला कल्याण से आगे बढ़कर आर्थिक भागीदारी पर जोर
उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए सिर्फ कल्याणकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, आर्थिक भागीदारी और उद्यमिता को भी समान महत्व मिलना चाहिए। बजट की योजना इस तरह बनाई जानी चाहिए कि महिलाएं लाभ पाने वाली ही नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदार भी बनें।

खर्च नहीं, परिणाम बने बजट की कसौटी
वित्त विभाग की सचिव (व्यय) रचना पाटिल ने कहा कि बजट तैयार करने और वित्तीय प्रक्रिया में लैंगिक दृष्टिकोण को शामिल करना जरूरी है। उन्होंने योजनाओं के परिणामों को केवल खर्च हुई राशि से मापने के बजाय महिलाओं और बालिकाओं पर पड़े वास्तविक प्रभाव को भी जांचने की जरूरत बताई।

अलग-अलग आंकड़ों के बिना सही तस्वीर मुश्किल
महिला एवं बाल विकास निगम की प्रबंध निदेशक इनायत खान ने कहा कि जेंडर-रिस्पॉन्सिव बजटिंग को प्रभावी बनाने के लिए योजना बनाने से लेकर उसके क्रियान्वयन और मूल्यांकन तक महिलाओं और पुरुषों के आंकड़े अलग-अलग दर्ज किए जाने चाहिए। इससे यह पता लगाने में आसानी होगी कि किसी योजना का लाभ महिलाओं और पुरुषों तक किस अनुपात में पहुंचा।

हर योजना के जेंडर प्रभाव का होगा बेहतर आकलन
उन्होंने कहा कि अलग-अलग लाभार्थियों के आंकड़े उपलब्ध होने पर यह समझना आसान होगा कि किसी योजना का महिलाओं पर क्या असर पड़ा। इसी आधार पर आगे की योजना और बजट में जरूरी बदलाव किए जा सकते हैं। इससे बजट बनाने की प्रक्रिया ज्यादा परिणाम आधारित और वास्तविक जरूरतों के करीब हो सकती है।

विभागों की नियमित बजट प्रक्रिया का हिस्सा बने जेंडर बजटिंग
भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सांख्यिकी ब्यूरो के निदेशक मनोज कुमार ने कहा कि जेंडर बजटिंग को किसी एक विभाग की अलग गतिविधि के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इसे सभी संबंधित विभागों की नियमित योजना और बजट प्रक्रिया का हिस्सा बनाने की जरूरत है।

जेंडर बजट प्रकोष्ठ मजबूत करने पर जोर
उन्होंने विभागों में जेंडर बजट प्रकोष्ठ को मजबूत करने और अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता बताई। साथ ही महिलाओं और पुरुषों के अलग-अलग आंकड़ों का बेहतर इस्तेमाल करने पर जोर दिया गया। उनके मुताबिक इस तरह की व्यवस्था से बजट में किए गए प्रावधानों को महिलाओं और बालिकाओं की जरूरतों तथा अपेक्षित परिणामों से जोड़ना आसान होगा।

तकनीकी सत्र में बजट और विकास लक्ष्यों पर चर्चा
कार्यशाला के तकनीकी सत्रों में बिहार सरकार के विभिन्न विभागों के अधिकारियों और विशेषज्ञों ने जेंडर-रिस्पॉन्सिव बजटिंग के अलग-अलग पहलुओं पर जानकारी साझा की। बिहार इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी की डॉ. बार्ना गांगुली ने परिणाम आधारित बजट, सतत विकास लक्ष्यों और जेंडर बजटिंग के बीच संबंध पर विस्तार से चर्चा की।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी साझा किए गए
कार्यशाला में संयुक्त राष्ट्र महिला संस्था के तकनीकी विशेषज्ञों ने भी हिस्सा लिया। विशेषज्ञों ने जेंडर-रिस्पॉन्सिव बजटिंग को जमीन पर लागू करने के अंतरराष्ट्रीय अनुभव और काम करने के तरीकों की जानकारी दी। इससे बिहार में इस व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए नए दृष्टिकोण सामने आए।

बजट में महिलाओं की जरूरत को जगह देने पर मंथन
पूरे कार्यक्रम के दौरान इस बात पर चर्चा हुई कि सरकारी योजनाओं और बजट में महिलाओं तथा बालिकाओं की जरूरतों को किस तरह बेहतर तरीके से शामिल किया जाए। साथ ही यह भी विचार किया गया कि बजट का महिलाओं पर पड़ने वाला असर कैसे मापा जाए और उसके आधार पर भविष्य की योजनाओं में बदलाव कैसे किया जा सकता है।

स्थानीय योजना से जोड़े जाने पर भी जोर
कार्यशाला में जेंडर बजटिंग को विकेंद्रीकृत योजना निर्माण से जोड़ने पर भी चर्चा हुई। इसका मतलब है कि जिला और प्रखंड स्तर पर योजना तैयार करते समय स्थानीय महिलाओं की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाए। इससे योजनाओं को जरूरत के हिसाब से तैयार करने और उनके परिणाम को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

बिहार में बजट को ज्यादा परिणाम आधारित बनाने की कोशिश
राज्य स्तरीय इस कार्यशाला का मुख्य संदेश यही रहा कि महिलाओं के लिए बजट में राशि तय करना ही पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती यह पता लगाना है कि उस राशि से महिलाओं और बालिकाओं के जीवन में कितना बदलाव आया। योजनाओं में अलग-अलग आंकड़ों के इस्तेमाल और उनके नियमित विश्लेषण से सरकार को यह समझने में मदद मिल सकती है कि कहां बेहतर परिणाम मिल रहे हैं और कहां सुधार की जरूरत है।

महिला सशक्तीकरण को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिश
महिला एवं बाल विकास निगम की ओर से आयोजित इस कार्यशाला में सरकारी विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों, विशेषज्ञों और तकनीकी प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। चर्चा के दौरान सामने आए सुझावों से बिहार में जेंडर-रिस्पॉन्सिव बजटिंग को ज्यादा व्यावहारिक, परिणाम आधारित और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप बनाने की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता तैयार होता दिखा।

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