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आरक्षण खत्म करने की बात नहीं, वंचितों तक हक पहुंचाने के लिए समीक्षा जरूरी: संतोष सुमन

By Malay Ojha | Published: 27 August 2026 at 06:02 PM

हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (से.) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार सरकार के लघु जल संसाधन मंत्री डॉ. संतोष कुमार सुमन ने आरक्षण की समीक्षा को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि आरक्षण की समीक्षा की बात को इसे खत्म करने की मांग समझना गलत है। उनके मुताबिक आरक्षण दलितों, आदिवासियों और वंचित वर्गों का संवैधानिक अधिकार है और समीक्षा का मकसद इसका लाभ उन लोगों तक पहुंचाना है, जो अब तक इससे अपेक्षित रूप से लाभान्वित नहीं हो सके हैं।

डॉ. सुमन ने कहा कि आरक्षण की व्यवस्था का मूल उद्देश्य समाज के वंचित वर्गों को बराबरी का अवसर देना है। इसलिए यह देखना जरूरी है कि लंबे समय से लागू आरक्षण का फायदा किन समुदायों तक पहुंचा और कौन-से समूह अभी भी पीछे रह गए हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की समीक्षा को आरक्षण विरोधी कदम के तौर पर देखना सही नहीं होगा।

एससी-एसटी उप-वर्गीकरण का किया समर्थन
मंत्री ने कहा कि उन्होंने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आरक्षण में उप-वर्गीकरण से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पहले भी समर्थन किया था और अब भी अपने रुख पर कायम हैं। उनका तर्क है कि आजादी के 79 साल बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आरक्षण का लाभ अलग-अलग समुदायों को कितना मिला और किन वर्गों की हिस्सेदारी अभी भी कम है।

‘जिसे हक नहीं मिला, उसे मिलना चाहिए’
डॉ. सुमन ने कहा कि सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन को समझने के लिए अलग-अलग वर्गों के भीतर वर्गीकरण की व्यवस्था की जाती रही है। ऐसे में दलित समाज के भीतर भी आरक्षण के लाभ का समान वितरण सुनिश्चित करने के लिए उप-वर्गीकरण पर चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि समीक्षा का उद्देश्य किसी समुदाय का हक छीनना नहीं, बल्कि उन लोगों तक हक पहुंचाना है, जो अब तक इससे दूर रहे हैं।

समुदायवार आंकड़ों से हो स्थिति साफ
उन्होंने कहा कि दलित समाज को एक जैसा सामाजिक समूह मानकर नहीं देखा जा सकता। इसके भीतर अलग-अलग समुदायों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति में अंतर है। ऐसे में सरकार को समुदायवार आंकड़े जुटाकर अध्ययन कराना चाहिए। इसमें यह देखा जाए कि किस समुदाय को आरक्षण से कितना लाभ मिला, सरकारी नौकरियों और ऊंचे पदों पर किसकी कितनी भागीदारी है और कौन-से समुदाय अभी भी सबसे पीछे हैं।

‘आरक्षण की पहुंच भी न्यायपूर्ण हो’
डॉ. सुमन ने कहा कि आरक्षण को बचाए रखना है तो उसका लाभ भी न्यायपूर्ण तरीके से बांटना होगा। उनके अनुसार व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि समाज के सबसे वंचित व्यक्ति और समुदाय तक आरक्षण का लाभ पहुंच सके। उन्होंने इसे सामाजिक न्याय की वास्तविक भावना बताते हुए कहा कि यही बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के संवैधानिक विचारों का सम्मान भी होगा।

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आरक्षण खत्म करने की बात नहीं, वंचितों तक हक पहुंचाने के लिए समीक्षा जरूरी: संतोष सुमन

By Malay Ojha | Published: 27 August 2026 at 06:02 PM

हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (से.) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार सरकार के लघु जल संसाधन मंत्री डॉ. संतोष कुमार सुमन ने आरक्षण की समीक्षा को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि आरक्षण की समीक्षा की बात को इसे खत्म करने की मांग समझना गलत है। उनके मुताबिक आरक्षण दलितों, आदिवासियों और वंचित वर्गों का संवैधानिक अधिकार है और समीक्षा का मकसद इसका लाभ उन लोगों तक पहुंचाना है, जो अब तक इससे अपेक्षित रूप से लाभान्वित नहीं हो सके हैं।

डॉ. सुमन ने कहा कि आरक्षण की व्यवस्था का मूल उद्देश्य समाज के वंचित वर्गों को बराबरी का अवसर देना है। इसलिए यह देखना जरूरी है कि लंबे समय से लागू आरक्षण का फायदा किन समुदायों तक पहुंचा और कौन-से समूह अभी भी पीछे रह गए हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की समीक्षा को आरक्षण विरोधी कदम के तौर पर देखना सही नहीं होगा।

एससी-एसटी उप-वर्गीकरण का किया समर्थन
मंत्री ने कहा कि उन्होंने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आरक्षण में उप-वर्गीकरण से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पहले भी समर्थन किया था और अब भी अपने रुख पर कायम हैं। उनका तर्क है कि आजादी के 79 साल बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आरक्षण का लाभ अलग-अलग समुदायों को कितना मिला और किन वर्गों की हिस्सेदारी अभी भी कम है।

‘जिसे हक नहीं मिला, उसे मिलना चाहिए’
डॉ. सुमन ने कहा कि सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन को समझने के लिए अलग-अलग वर्गों के भीतर वर्गीकरण की व्यवस्था की जाती रही है। ऐसे में दलित समाज के भीतर भी आरक्षण के लाभ का समान वितरण सुनिश्चित करने के लिए उप-वर्गीकरण पर चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि समीक्षा का उद्देश्य किसी समुदाय का हक छीनना नहीं, बल्कि उन लोगों तक हक पहुंचाना है, जो अब तक इससे दूर रहे हैं।

समुदायवार आंकड़ों से हो स्थिति साफ
उन्होंने कहा कि दलित समाज को एक जैसा सामाजिक समूह मानकर नहीं देखा जा सकता। इसके भीतर अलग-अलग समुदायों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति में अंतर है। ऐसे में सरकार को समुदायवार आंकड़े जुटाकर अध्ययन कराना चाहिए। इसमें यह देखा जाए कि किस समुदाय को आरक्षण से कितना लाभ मिला, सरकारी नौकरियों और ऊंचे पदों पर किसकी कितनी भागीदारी है और कौन-से समुदाय अभी भी सबसे पीछे हैं।

‘आरक्षण की पहुंच भी न्यायपूर्ण हो’
डॉ. सुमन ने कहा कि आरक्षण को बचाए रखना है तो उसका लाभ भी न्यायपूर्ण तरीके से बांटना होगा। उनके अनुसार व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि समाज के सबसे वंचित व्यक्ति और समुदाय तक आरक्षण का लाभ पहुंच सके। उन्होंने इसे सामाजिक न्याय की वास्तविक भावना बताते हुए कहा कि यही बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के संवैधानिक विचारों का सम्मान भी होगा।

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