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रक्षाबंधन सिर्फ भाई-बहन का पर्व नहीं, नारी-सम्मान और सामाजिक समरसता का भी संदेश: कुलपति

By Malay Ojha | Published: 28 August 2026 at 09:37 AM

संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने रक्षाबंधन को भाई-बहन के प्रेम तक सीमित न मानकर इसे नारी-सम्मान, सामाजिक समरसता, प्रकृति और भारतीय संस्कृति की रक्षा से जोड़ने की बात कही है। रक्षाबंधन एवं श्रावणी पर्व की पूर्व संध्या पर उन्होंने कहा कि भारतीय पर्व केवल खुशी मनाने के मौके नहीं हैं, बल्कि जीवन-मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों को याद करने का अवसर भी देते हैं।

कुलपति ने कहा कि श्रावण पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला रक्षाबंधन मुख्य रूप से भाई-बहन के स्नेह और विश्वास का पर्व है, लेकिन इसका संदेश इससे कहीं बड़ा है। रक्षा का मतलब केवल किसी व्यक्ति की सुरक्षा करना नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति, मर्यादा, प्रकृति और मानवीय मूल्यों को सुरक्षित रखना भी है। उनके अनुसार राखी का धागा रिश्तों में अधिकार के साथ जिम्मेदारी और सम्मान की भावना भी मजबूत करता है।

नारी को सम्मान और सुरक्षित माहौल मिले
प्रो. शर्मा ने कहा कि आज रक्षाबंधन को नारी-सम्मान और समानता के संकल्प से जोड़ना जरूरी है। रक्षा का संकल्प तभी सार्थक होगा, जब समाज की हर महिला को सम्मान, सुरक्षा, समान अवसर और बिना डर के जीने का माहौल मिले। उन्होंने कहा कि यह पर्व समाज में भेदभाव से ऊपर उठकर एक-दूसरे के सहयोग और मानवीय संवेदना को मजबूत करने की प्रेरणा देता है।

श्रावणी पर्व से जुड़ी है पुरानी परंपरा
कुलपति ने भारतीय परंपरा में रक्षा-सूत्र की पुरानी परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि वैदिक काल में श्रावणी पूर्णिमा का संबंध उपाकर्म, स्वाध्याय और ऋषियों के स्मरण से रहा है। पुराणों और महाकाव्यों में भी रक्षा-सूत्र से जुड़े कई प्रसंग मिलते हैं। इन परंपराओं का मूल भाव संकट के समय रिश्तों की गरिमा और एक-दूसरे के संरक्षण के संकल्प को मजबूत करना है।

परिवार से राष्ट्र तक पहुंचता है पर्व का संदेश
प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि रक्षाबंधन का भाव केवल परिवार तक सीमित नहीं है। देश की सांस्कृतिक एकता, संविधान के मूल्यों का सम्मान तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता के प्रति जिम्मेदारी भी इसी व्यापक भावना का हिस्सा है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा में बताए गए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के भाव को जीवन में अपनाने की जरूरत बताई।

प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों की भी रक्षा जरूरी
कुलपति ने कहा कि रक्षा का संकल्प प्रकृति तक भी पहुंचना चाहिए। जल, पेड़-पौधों, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के जीवन के अधिकार की रक्षा आज बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन हमें अपने आसपास की दुनिया के प्रति जिम्मेदार बनने का अवसर भी देता है।

संस्कृत और ज्ञान परंपरा को बचाने पर जोर
उन्होंने कहा कि राखी का महत्व उसकी कीमत में नहीं, बल्कि उससे जुड़े प्यार, विश्वास और आत्मीयता में है। रिश्तों में संवाद और सम्मान किसी भी महंगे उपहार से अधिक महत्वपूर्ण हैं। इसी तरह संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा को सुरक्षित रखना भी हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत की महत्वपूर्ण कड़ी है।

मानवता की रक्षा का संकल्प लेने की अपील
कुलपति ने कहा कि रक्षाबंधन आखिरकार केवल कलाई पर बंधने वाले धागे का पर्व नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना को मजबूत करने का अवसर है। उन्होंने लोगों से अपील की कि इस पर्व पर नारी-सम्मान, सामाजिक समरसता, प्रकृति, भारतीय संस्कृति और राष्ट्र की एकता-अखंडता की रक्षा का संकल्प लें। अंत में उन्होंने देशवासियों को रक्षाबंधन की शुभकामनाएं दीं।

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रक्षाबंधन सिर्फ भाई-बहन का पर्व नहीं, नारी-सम्मान और सामाजिक समरसता का भी संदेश: कुलपति

By Malay Ojha | Published: 28 August 2026 at 09:37 AM

संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने रक्षाबंधन को भाई-बहन के प्रेम तक सीमित न मानकर इसे नारी-सम्मान, सामाजिक समरसता, प्रकृति और भारतीय संस्कृति की रक्षा से जोड़ने की बात कही है। रक्षाबंधन एवं श्रावणी पर्व की पूर्व संध्या पर उन्होंने कहा कि भारतीय पर्व केवल खुशी मनाने के मौके नहीं हैं, बल्कि जीवन-मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों को याद करने का अवसर भी देते हैं।

कुलपति ने कहा कि श्रावण पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला रक्षाबंधन मुख्य रूप से भाई-बहन के स्नेह और विश्वास का पर्व है, लेकिन इसका संदेश इससे कहीं बड़ा है। रक्षा का मतलब केवल किसी व्यक्ति की सुरक्षा करना नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति, मर्यादा, प्रकृति और मानवीय मूल्यों को सुरक्षित रखना भी है। उनके अनुसार राखी का धागा रिश्तों में अधिकार के साथ जिम्मेदारी और सम्मान की भावना भी मजबूत करता है।

नारी को सम्मान और सुरक्षित माहौल मिले
प्रो. शर्मा ने कहा कि आज रक्षाबंधन को नारी-सम्मान और समानता के संकल्प से जोड़ना जरूरी है। रक्षा का संकल्प तभी सार्थक होगा, जब समाज की हर महिला को सम्मान, सुरक्षा, समान अवसर और बिना डर के जीने का माहौल मिले। उन्होंने कहा कि यह पर्व समाज में भेदभाव से ऊपर उठकर एक-दूसरे के सहयोग और मानवीय संवेदना को मजबूत करने की प्रेरणा देता है।

श्रावणी पर्व से जुड़ी है पुरानी परंपरा
कुलपति ने भारतीय परंपरा में रक्षा-सूत्र की पुरानी परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि वैदिक काल में श्रावणी पूर्णिमा का संबंध उपाकर्म, स्वाध्याय और ऋषियों के स्मरण से रहा है। पुराणों और महाकाव्यों में भी रक्षा-सूत्र से जुड़े कई प्रसंग मिलते हैं। इन परंपराओं का मूल भाव संकट के समय रिश्तों की गरिमा और एक-दूसरे के संरक्षण के संकल्प को मजबूत करना है।

परिवार से राष्ट्र तक पहुंचता है पर्व का संदेश
प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि रक्षाबंधन का भाव केवल परिवार तक सीमित नहीं है। देश की सांस्कृतिक एकता, संविधान के मूल्यों का सम्मान तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता के प्रति जिम्मेदारी भी इसी व्यापक भावना का हिस्सा है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा में बताए गए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के भाव को जीवन में अपनाने की जरूरत बताई।

प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों की भी रक्षा जरूरी
कुलपति ने कहा कि रक्षा का संकल्प प्रकृति तक भी पहुंचना चाहिए। जल, पेड़-पौधों, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के जीवन के अधिकार की रक्षा आज बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन हमें अपने आसपास की दुनिया के प्रति जिम्मेदार बनने का अवसर भी देता है।

संस्कृत और ज्ञान परंपरा को बचाने पर जोर
उन्होंने कहा कि राखी का महत्व उसकी कीमत में नहीं, बल्कि उससे जुड़े प्यार, विश्वास और आत्मीयता में है। रिश्तों में संवाद और सम्मान किसी भी महंगे उपहार से अधिक महत्वपूर्ण हैं। इसी तरह संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा को सुरक्षित रखना भी हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत की महत्वपूर्ण कड़ी है।

मानवता की रक्षा का संकल्प लेने की अपील
कुलपति ने कहा कि रक्षाबंधन आखिरकार केवल कलाई पर बंधने वाले धागे का पर्व नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना को मजबूत करने का अवसर है। उन्होंने लोगों से अपील की कि इस पर्व पर नारी-सम्मान, सामाजिक समरसता, प्रकृति, भारतीय संस्कृति और राष्ट्र की एकता-अखंडता की रक्षा का संकल्प लें। अंत में उन्होंने देशवासियों को रक्षाबंधन की शुभकामनाएं दीं।

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