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Delhi SIR: वोटर लिस्ट से नाम कटने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग से 2 हफ्ते में मांगा जवाब

By Malay Ojha | Published: 28 October 2026 at 09:10 PM

दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से अहम सवाल पूछा है। कोर्ट ने जानना चाहा कि जिन लोगों के नाम पहले से 2026 की वोटर लिस्ट में दर्ज हैं, लेकिन वे SIR के दौरान गणना फॉर्म नहीं भर पाए, उनसे नए मतदाता की तरह फॉर्म-6 भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को इस मामले में दो हफ्ते के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

पहले से वोटर हैं तो फॉर्म-6 क्यों भरें?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फॉर्म-6 का इस्तेमाल नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए किया जाता है। जिन लोगों का नाम पहले से मतदाता सूची में है और वे केवल अपना निवास स्थान बदलकर दूसरी जगह गए हैं, उन्हें फॉर्म-8 के जरिए पता बदलने की सुविधा मिलनी चाहिए। कोर्ट ने सवाल उठाया कि ऐसे लोगों से यह घोषणा क्यों कराई जाए कि वे पहले किसी मतदाता सूची में शामिल नहीं थे।

कुछ महीने बाहर रहने से खत्म नहीं होता मतदाता का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का कुछ समय के लिए अपने निवास स्थान से बाहर रहना स्थायी रूप से स्थान बदलने के बराबर नहीं है। कोर्ट ने उदाहरण देते हुए कहा कि काम के सिलसिले में एक-दो महीने के लिए बाहर रहने वाले व्यक्ति को स्थायी रूप से दूसरी जगह रहने वाला मतदाता नहीं माना जा सकता।

फॉर्म नहीं भरने वालों का वोट देने का अधिकार खत्म हो जाएगा?
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सवाल किया कि अगर कोई मतदाता तय समय में गणना फॉर्म नहीं भर पाया, तो क्या उसे हमेशा के लिए अपने मताधिकार से वंचित कर दिया जाएगा? उन्होंने इस स्थिति को व्यवस्था से जुड़ी ऐसी विसंगति बताया, जिसे ठीक करने की जरूरत है।

कोर्ट ने कहा कि जब तक अंतिम मतदाता सूची तैयार नहीं हो जाती, तब तक सिर्फ समय-सीमा बीत जाने के आधार पर किसी फॉर्म को खारिज करने का औचित्य नहीं है। इस पर चुनाव आयोग ने कहा कि वह देर से जमा किए गए पंजीकरण फॉर्म स्वीकार करने पर विचार करेगा। जरूरत पड़ने पर 30 अक्टूबर की समय-सीमा बढ़ाने पर भी फैसला लिया जा सकता है।

दिल्ली में करीब 43 लाख नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर
दिल्ली में SIR के तहत तैयार ड्राफ्ट मतदाता सूची से करीब 43 लाख लोगों के नाम हटाए जाने का मामला भी इस विवाद के केंद्र में है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इन लोगों को स्थान बदलने या अनुपस्थित रहने जैसी वजहों से सूची से बाहर किया गया है। इसी के बाद यह सवाल उठ रहा है कि जो मतदाता पहले से पंजीकृत हैं, उनके नाम दोबारा शामिल कराने की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए।

बिहार और बंगाल SIR के फैसलों पर भी कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बिहार और पश्चिम बंगाल में हुए SIR से जुड़े मामलों का भी जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि बिहार SIR मामले में उसने तार्किक विसंगति (लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी) के मुद्दे पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया था। वहीं, पश्चिम बंगाल में इस व्यवस्था को अंतरिम उपाय के तौर पर अनुमति दी गई थी।

जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने तार्किक विसंगति की श्रेणी को मान्यता नहीं दी है, लेकिन लोग बिहार मामले के फैसले का हवाला देकर यह मान रहे हैं कि इस मुद्दे पर पहले ही निर्णय हो चुका है। कोर्ट की इस टिप्पणी से साफ है कि दिल्ली SIR में मतदाताओं के पंजीकरण और नाम हटाने की प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर अभी विचार किया जाना बाकी है।

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Delhi SIR: वोटर लिस्ट से नाम कटने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग से 2 हफ्ते में मांगा जवाब

By Malay Ojha | Published: 28 October 2026 at 09:10 PM

दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से अहम सवाल पूछा है। कोर्ट ने जानना चाहा कि जिन लोगों के नाम पहले से 2026 की वोटर लिस्ट में दर्ज हैं, लेकिन वे SIR के दौरान गणना फॉर्म नहीं भर पाए, उनसे नए मतदाता की तरह फॉर्म-6 भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को इस मामले में दो हफ्ते के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

पहले से वोटर हैं तो फॉर्म-6 क्यों भरें?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फॉर्म-6 का इस्तेमाल नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए किया जाता है। जिन लोगों का नाम पहले से मतदाता सूची में है और वे केवल अपना निवास स्थान बदलकर दूसरी जगह गए हैं, उन्हें फॉर्म-8 के जरिए पता बदलने की सुविधा मिलनी चाहिए। कोर्ट ने सवाल उठाया कि ऐसे लोगों से यह घोषणा क्यों कराई जाए कि वे पहले किसी मतदाता सूची में शामिल नहीं थे।

कुछ महीने बाहर रहने से खत्म नहीं होता मतदाता का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का कुछ समय के लिए अपने निवास स्थान से बाहर रहना स्थायी रूप से स्थान बदलने के बराबर नहीं है। कोर्ट ने उदाहरण देते हुए कहा कि काम के सिलसिले में एक-दो महीने के लिए बाहर रहने वाले व्यक्ति को स्थायी रूप से दूसरी जगह रहने वाला मतदाता नहीं माना जा सकता।

फॉर्म नहीं भरने वालों का वोट देने का अधिकार खत्म हो जाएगा?
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सवाल किया कि अगर कोई मतदाता तय समय में गणना फॉर्म नहीं भर पाया, तो क्या उसे हमेशा के लिए अपने मताधिकार से वंचित कर दिया जाएगा? उन्होंने इस स्थिति को व्यवस्था से जुड़ी ऐसी विसंगति बताया, जिसे ठीक करने की जरूरत है।

कोर्ट ने कहा कि जब तक अंतिम मतदाता सूची तैयार नहीं हो जाती, तब तक सिर्फ समय-सीमा बीत जाने के आधार पर किसी फॉर्म को खारिज करने का औचित्य नहीं है। इस पर चुनाव आयोग ने कहा कि वह देर से जमा किए गए पंजीकरण फॉर्म स्वीकार करने पर विचार करेगा। जरूरत पड़ने पर 30 अक्टूबर की समय-सीमा बढ़ाने पर भी फैसला लिया जा सकता है।

दिल्ली में करीब 43 लाख नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर
दिल्ली में SIR के तहत तैयार ड्राफ्ट मतदाता सूची से करीब 43 लाख लोगों के नाम हटाए जाने का मामला भी इस विवाद के केंद्र में है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इन लोगों को स्थान बदलने या अनुपस्थित रहने जैसी वजहों से सूची से बाहर किया गया है। इसी के बाद यह सवाल उठ रहा है कि जो मतदाता पहले से पंजीकृत हैं, उनके नाम दोबारा शामिल कराने की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए।

बिहार और बंगाल SIR के फैसलों पर भी कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बिहार और पश्चिम बंगाल में हुए SIR से जुड़े मामलों का भी जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि बिहार SIR मामले में उसने तार्किक विसंगति (लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी) के मुद्दे पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया था। वहीं, पश्चिम बंगाल में इस व्यवस्था को अंतरिम उपाय के तौर पर अनुमति दी गई थी।

जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने तार्किक विसंगति की श्रेणी को मान्यता नहीं दी है, लेकिन लोग बिहार मामले के फैसले का हवाला देकर यह मान रहे हैं कि इस मुद्दे पर पहले ही निर्णय हो चुका है। कोर्ट की इस टिप्पणी से साफ है कि दिल्ली SIR में मतदाताओं के पंजीकरण और नाम हटाने की प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर अभी विचार किया जाना बाकी है।

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