By Malay Ojha | Published: 21 October 2026 at 04:56 PM
दिल्ली हाई कोर्ट ने कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने दोनों की उम्र पूछते हुए कहा कि वे जेन-जी (Gen-Z) नहीं हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने बॉन्ड तोड़ने और प्रदर्शन के पीछे संगठन के मकसद को लेकर भी सवाल उठाए।
बॉन्ड तोड़ने पर कोर्ट ने उठाए सवाल
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने दोनों के वकील से पूछा कि जब दो बार बॉन्ड तोड़ा गया, तो पुलिस से नरमी की उम्मीद क्यों की जा रही है? कोर्ट ने कहा कि पुलिस के लिए शांति बनाए रखना जरूरी है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि संबंधित लोगों से नरमी क्यों बरती जानी चाहिए।
संगठन के मकसद पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान दोनों की ओर से पेश वकील अभिक चिमनी ने अपना पक्ष रखना चाहा। इस पर कोर्ट ने सवाल किया कि संगठन क्या है और उसका मकसद क्या है? अदालत ने कहा कि जुलाई में छात्रों के मुद्दे पर प्रदर्शन किया गया था और अब किसी दूसरे मुद्दे पर प्रदर्शन हो रहा है। आगे किसी अन्य मुद्दे पर भी प्रदर्शन हो सकता है। ऐसे में संगठन के उद्देश्य को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कोर्ट ने पूछा- जेन-जी किसे कहते हैं?
सुनवाई के दौरान अदालत ने सौरव दास और आशुतोष रांका की उम्र भी पूछी। उनके वकील ने बताया कि आशुतोष रांका 31 साल और सौरव दास 27 साल के हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि आप लोग जेन-जी नहीं हैं। जब जेन-जी के बारे में पूछा गया, तो बताया गया कि 1997 के बाद जन्मे लोगों को आम तौर पर इस पीढ़ी में शामिल किया जाता है।
वकील ने न्यायिक हिरासत के आदेश को बताया गलत
दोनों की ओर से दलील दी गई कि मजिस्ट्रेट ने 19 अक्टूबर को न्यायिक हिरासत बढ़ाते समय यह स्पष्ट नहीं किया कि उनसे किस तरह का खतरा है। इस पर जस्टिस प्रसाद ने सवाल किया कि एक बॉन्ड तोड़ना क्या पर्याप्त आधार नहीं है? कोर्ट ने कहा कि आजादी पवित्र है, लेकिन कानून में कुछ प्रावधान भी हैं, जिनका पालन करना जरूरी है।
मजिस्ट्रेट के फैसले का इंतजार करने की सलाह
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि 21 अक्टूबर को मजिस्ट्रेट के सामने दोनों की न्यायिक हिरासत के मामले पर सुनवाई होनी है। ऐसे में वे मजिस्ट्रेट के फैसले का इंतजार कर सकते थे। इस पर वकील ने सवाल उठाया कि आखिर दोनों को दो दिन और जेल में क्यों रहना चाहिए?
दो जमानतदार पेश करने का दिया हवाला
सौरव दास और आशुतोष रांका के वकील अभिक चिमनी ने दलील दी कि दो जमानतदार मजिस्ट्रेट के सामने मौजूद थे, लेकिन उन्हें स्वीकार नहीं किया गया। वकील के मुताबिक, मजिस्ट्रेट ने दोनों से बातचीत भी नहीं की। उन्होंने न्यायिक हिरासत बढ़ाने के आदेश को गैरकानूनी बताते हुए उसे चुनौती दी थी।
11 अक्टूबर को पुलिस ने लिया था हिरासत में
सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली पुलिस ने 11 अक्टूबर को हिरासत में लिया था। इसके बाद उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया। बाद में उनकी हिरासत दो दिन के लिए और बढ़ा दी गई। इसी फैसले को चुनौती देते हुए दोनों ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया था।
याचिका वापस लेने की मिली छूट
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट के यहां से राहत मिलने की संभावना भी हो सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि अगर 21 अक्टूबर को राहत नहीं मिलती है, तो दोनों दोबारा आवेदन कर सकते हैं। कोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल करने का विकल्प भी बताया। इसके बाद दोनों के वकील ने हाई कोर्ट से अपनी याचिका वापस ले ली।
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