By Malay Ojha | Published: 14 August 2026 at 07:22 PM
भारत में अच्छी नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं के लिए आने वाले कुछ साल बेहद अहम साबित हो सकते हैं। देश अब सिर्फ दुनिया की कंपनियों के लिए काम करने वाला बैक-ऑफिस नहीं रह गया है, बल्कि बड़े कारोबारी फैसलों, तकनीक, शोध और नए उत्पादों के विकास में भी उसकी भूमिका बढ़ रही है। रियल एस्टेट सलाहकार कंपनी सीबीआरई की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सात राज्यों ने वर्ष 2031 तक करीब 1,380 नए ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर यानी जीसीसी लाने की तैयारी की है। इन केंद्रों के जरिए करीब 11.8 लाख नई नौकरियों का रास्ता खुल सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, केरल, हरियाणा और मध्य प्रदेश ने वैश्विक कंपनियों को आकर्षित करने के लिए अलग-अलग नीतियां और प्रोत्साहन तैयार किए हैं। इन राज्यों की कोशिश केवल कंपनियों को दफ्तर उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीकी काम, शोध, वित्तीय सेवाओं, आंकड़ों के विश्लेषण और नए उत्पादों से जुड़े बड़े काम को अपने यहां लाने की है।
सीबीआरई के अनुसार, वैश्विक कंपनियां अब भारत में ऐसे केंद्र खोल रही हैं जहां केवल सामान्य काम नहीं होता। तकनीक, इंजीनियरिंग, आंकड़ों का विश्लेषण, अनुसंधान और उत्पाद तैयार करने जैसे रणनीतिक काम भी भारत से संचालित किए जा रहे हैं। सीबीआरई की एक अन्य रिपोर्ट भी बताती है कि भारत में जीसीसी का विस्तार तेजी से ऐसे कामों की ओर बढ़ रहा है जिनमें तकनीकी विशेषज्ञता और नवाचार की जरूरत होती है।
कर्नाटक और महाराष्ट्र सबसे आगे
राज्यों की योजनाओं में कर्नाटक सबसे आगे दिखाई देता है। राज्य ने करीब 500 जीसीसी स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। इससे लगभग 3.5 लाख नौकरियां पैदा होने की उम्मीद है। लंबे समय से तकनीकी कंपनियों का बड़ा केंद्र रहे इस राज्य को इस नई दौड़ में अपनी बढ़त और मजबूत करने का मौका मिल सकता है।
महाराष्ट्र ने करीब 200 जीसीसी लाने का लक्ष्य रखा है और इससे लगभग 4 लाख रोजगार के अवसर बनने की संभावना जताई गई है। राज्य में मुंबई और पुणे जैसे बड़े कारोबारी और तकनीकी केंद्र पहले से मौजूद हैं, इसलिए वैश्विक कंपनियों के लिए यहां प्रतिभाशाली कर्मचारियों और मजबूत कारोबारी ढांचे की उपलब्धता एक बड़ा फायदा है।
राजस्थान से लेकर मध्य प्रदेश तक बढ़ी होड़
राजस्थान भी इस दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहा है। राज्य में 200 से अधिक जीसीसी लाने की योजना है, जिससे करीब 1.5 लाख नौकरियां पैदा होने की संभावना है। इसका मतलब यह है कि आने वाले वर्षों में जीसीसी का विस्तार केवल पारंपरिक बड़े तकनीकी शहरों तक सीमित रहने की उम्मीद नहीं है।
गुजरात ने 250 से ज्यादा जीसीसी का लक्ष्य रखा है और करीब 50 हजार रोजगार पैदा होने की उम्मीद जताई है। हरियाणा में 100 से अधिक केंद्रों के जरिए करीब 30 हजार नौकरियां पैदा करने की योजना है। वहीं मध्य प्रदेश ने 50 से अधिक जीसीसी और करीब 37 हजार रोजगार का लक्ष्य रखा है।
केरल का लक्ष्य भी बड़ा
केरल ने करीब 80 जीसीसी स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। राज्य को इससे करीब 1.6 लाख नौकरियां पैदा होने की उम्मीद है। इससे साफ है कि जीसीसी का विस्तार केवल महानगरों तक सीमित नहीं रह गया है। कंपनियां ऐसे नए स्थानों की तलाश कर रही हैं जहां उन्हें कुशल कर्मचारी, बेहतर जीवन-स्तर, अपेक्षाकृत कम लागत और लंबे समय तक काम करने के लिए जरूरी सुविधाएं मिल सकें।
इसी वजह से दूसरे राज्य भी इस क्षेत्र के लिए अपनी नीतियां तैयार कर रहे हैं। तमिलनाडु ने जीसीसी से जुड़े कर्मचारियों के लिए विशेष प्रोत्साहन शुरू किए हैं, जबकि तेलंगाना और दिल्ली ने इस क्षेत्र के विकास के लिए नीतिगत ढांचा तैयार किया है। कई दूसरे राज्य भी ऐसी नीतियों पर काम कर रहे हैं।
आखिर क्या होता है जीसीसी?
आसान भाषा में समझें तो जीसीसी किसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनी का भारत में बनाया गया ऐसा केंद्र होता है जहां कंपनी के महत्वपूर्ण काम किए जाते हैं। पहले इन केंद्रों को मुख्य रूप से लागत कम करने और दूसरे देशों के लिए तकनीकी या प्रशासनिक काम संभालने के नजरिए से देखा जाता था। अब तस्वीर तेजी से बदल रही है।
आज भारत में मौजूद कई जीसीसी में कंपनी के लिए नए उत्पाद तैयार करने, तकनीकी समाधान विकसित करने, आंकड़ों का विश्लेषण करने, कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर काम करने, वित्तीय सेवाओं को संभालने और शोध जैसे महत्वपूर्ण काम किए जा रहे हैं। यही बदलाव भारत को वैश्विक कंपनियों के लिए सिर्फ काम कराने की जगह से आगे ले जाकर उनके रणनीतिक कामकाज का अहम केंद्र बना रहा है।
युवाओं के लिए क्यों खास है यह खबर?
जीसीसी की बढ़ती संख्या का सीधा फायदा कुशल युवाओं को मिल सकता है। तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आंकड़ों का विश्लेषण, वित्त, साइबर सुरक्षा, इंजीनियरिंग, शोध और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वालों के लिए अवसर बढ़ सकते हैं।
खास बात यह है कि जीसीसी में मिलने वाली नौकरियां केवल तकनीकी विशेषज्ञों तक सीमित नहीं होतीं। वित्त, मानव संसाधन, कानूनी काम, बिक्री, विपणन, डिजाइन, शोध और परियोजना प्रबंधन से जुड़े लोगों की भी जरूरत होती है। यानी अलग-अलग शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले युवाओं के लिए रोजगार के रास्ते खुल सकते हैं।
भारत में पहले से दिख रहा है इसका असर
जीसीसी का बढ़ता प्रभाव भारत के कार्यालय बाजार में भी साफ दिखाई दे रहा है। सीबीआरई के मुताबिक वर्ष 2026 की पहली छमाही में देश के कार्यालय बाजार में कुल 4.55 करोड़ वर्ग फुट जगह किराये पर ली गई, जो अब तक की सबसे ऊंची छमाही मांग है। इसी अवधि में जीसीसी ने करीब 1.96 करोड़ वर्ग फुट कार्यालय जगह ली, जो कुल मांग का लगभग 43 प्रतिशत रही।
इससे पहले वर्ष 2025 में भी जीसीसी देश के कार्यालय बाजार की मांग के प्रमुख कारणों में रहे थे। सीबीआरई के अनुसार उस साल जीसीसी ने करीब 3.9 करोड़ वर्ग फुट कार्यालय जगह ली थी। इसका मतलब है कि कंपनियां भारत में केवल कर्मचारी बढ़ाने नहीं, बल्कि लंबे समय के लिए अपना कामकाजी ढांचा भी मजबूत कर रही हैं।
भारत क्यों बन रहा पसंदीदा ठिकाना?
भारत के पास बड़ी संख्या में कुशल कर्मचारी, तकनीकी प्रतिभा और अपेक्षाकृत मजबूत कारोबारी ढांचा है। इसके अलावा देश के प्रमुख शहरों में पहले से मौजूद तकनीकी और वित्तीय कंपनियों का नेटवर्क भी वैश्विक कंपनियों के लिए मददगार है। बेहतर संपर्क व्यवस्था और नए शहरों में विकसित हो रहे कारोबारी ढांचे ने भी इस विस्तार को गति दी है।
सीबीआरई की रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि अब कंपनियां केवल बेंगलुरु, मुंबई और दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र जैसे पारंपरिक केंद्रों तक सीमित नहीं रहना चाहतीं। दूसरे और तीसरे स्तर के शहर भी भविष्य में जीसीसी के विस्तार का हिस्सा बन सकते हैं। इससे रोजगार का दायरा कुछ चुनिंदा महानगरों से बाहर निकलने की संभावना बढ़ती है।
बैक-ऑफिस से आगे निकल रहा भारत
भारत के लिए जीसीसी का यह विस्तार सिर्फ रोजगार की संख्या बढ़ने की कहानी नहीं है। असली बदलाव इस बात में है कि वैश्विक कंपनियां भारत को अब अपने महत्वपूर्ण कारोबारी और तकनीकी फैसलों के लिए इस्तेमाल कर रही हैं। अगर सात राज्यों की योजनाएं तय लक्ष्य के मुताबिक आगे बढ़ती हैं, तो वर्ष 2031 तक भारत के रोजगार बाजार, कार्यालय क्षेत्र और तकनीकी अर्थव्यवस्था पर इसका बड़ा असर दिखाई दे सकता है।
यानी भारत की भूमिका अब सिर्फ दुनिया की कंपनियों के लिए पीछे से काम करने वाले देश की नहीं रह गई है। आने वाले वर्षों में यहां बनने वाले हजारों जीसीसी यह तय कर सकते हैं कि दुनिया की बड़ी कंपनियों के नए उत्पाद, तकनीकी समाधान और कारोबारी रणनीतियां कितनी तेजी से भारत से तैयार होती हैं।
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