Friday, June 12, 2026

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अमेरिका-ईरान डील के लीक दस्तावेज में क्या है? होर्मुज स्ट्रेट से लेकर अरबों डॉलर तक, अंदर की शर्तें आईं सामने

By Malay Ojha | Published: 12 June 2026 at 03:59 PM

अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी मेहर की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दोनों देशों के बीच तैयार किए जा रहे समझौते के मसौदे में 14 महत्वपूर्ण शर्तें शामिल हैं। इनमें युद्ध को स्थायी रूप से समाप्त करने, ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंध हटाने और अरबों डॉलर के फंसे हुए फंड को जारी करने जैसे अहम प्रस्ताव रखे गए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार मसौदे का पहला और सबसे महत्वपूर्ण बिंदु सभी मोर्चों पर चल रहे संघर्ष को तुरंत और स्थायी रूप से समाप्त करना है। इसमें पश्चिम एशिया के विभिन्न क्षेत्रों में जारी तनाव के साथ-साथ लेबनान में चल रहा सैन्य टकराव भी शामिल किया गया है। अगर यह प्रस्ताव स्वीकार होता है तो क्षेत्र में लंबे समय से जारी अस्थिरता को कम करने की दिशा में बड़ा कदम माना जाएगा।

होर्मुज जलमार्ग खोलने का प्रस्ताव
मसौदे में यह भी कहा गया है कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज जलमार्ग को 30 दिनों के भीतर दोबारा खोला जाएगा। हालांकि इसके संचालन और निगरानी की जिम्मेदारी ईरान के पास ही रहने का प्रस्ताव रखा गया है। इस मार्ग से दुनिया के बड़े हिस्से में ऊर्जा आपूर्ति होती है, इसलिए इसका खुलना वैश्विक बाजारों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अमेरिका से सैन्य मौजूदगी घटाने की मांग
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान ने अमेरिका से उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने और उसकी संप्रभुता का सम्मान करने की मांग की है। इसके अलावा अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी को 30 दिनों के भीतर समाप्त करने और ईरान के आसपास तैनात सैन्य ताकत को कम करने की शर्त भी रखी गई है।

तेल प्रतिबंध हटाने की मांग
समझौते के मसौदे में ईरानी तेल पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने या अस्थायी रूप से निलंबित करने की बात कही गई है। माना जा रहा है कि यदि ऐसा होता है तो ईरान की अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिल सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी तेल आपूर्ति दोबारा बढ़ सकती है।

300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण पैकेज की मांग
रिपोर्ट के अनुसार ईरान ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों से पुनर्निर्माण के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की आर्थिक योजना तैयार करने का प्रस्ताव रखा है। यह राशि युद्ध और प्रतिबंधों से प्रभावित क्षेत्रों के विकास और आर्थिक गतिविधियों को दोबारा पटरी पर लाने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है।

परमाणु कार्यक्रम पर 60 दिन की बातचीत
मसौदे में यह भी प्रस्तावित किया गया है कि दोनों देश 60 दिनों तक बातचीत जारी रखेंगे। इस दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक प्रतिबंधों से जुड़े मुद्दों पर अंतिम सहमति बनाने की कोशिश होगी। ईरान ने एक बार फिर यह भरोसा दिलाने की बात कही है कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा।

अमेरिका पर नए प्रतिबंध नहीं लगाने का दबाव
बदले में अमेरिका से यह अपेक्षा की गई है कि बातचीत की अवधि के दौरान वह क्षेत्र में अपनी सैन्य ताकत नहीं बढ़ाएगा और ईरान पर कोई नया प्रतिबंध लागू नहीं करेगा। इसे वार्ता को सफल बनाने के लिए भरोसे के उपाय के रूप में देखा जा रहा है।

24 अरब डॉलर का फंड जारी करने की मांग
समझौते के मसौदे में ईरान के लगभग 24 अरब डॉलर के फ्रीज फंड को जारी करने का प्रस्ताव भी शामिल है। साथ ही समझौते के पालन की निगरानी के लिए एक विशेष तंत्र बनाने की बात कही गई है। अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के जरिए अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने की भी योजना बताई गई है।

अंतिम बातचीत से पहले रखी गई शर्तें
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अंतिम दौर की वार्ता तब तक शुरू नहीं होगी, जब तक ईरान के कम से कम आधे फंड जारी नहीं किए जाते, तेल प्रतिबंधों को निलंबित नहीं किया जाता और नौसैनिक नाकाबंदी नहीं हटाई जाती।

मिसाइल कार्यक्रम पर नहीं होगी चर्चा
मसौदे की सबसे अहम बात यह बताई जा रही है कि ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय सशस्त्र संगठनों को दिए जाने वाले समर्थन के मुद्दे को बातचीत के दायरे से बाहर रखा गया है। यह विषय लंबे समय से अमेरिका और उसके सहयोगियों की प्रमुख चिंताओं में शामिल रहा है।

लेबनान की स्थिति पर टिकी है नजर
दूसरी ओर इजराइल पहले ही संकेत दे चुका है कि वह दक्षिणी लेबनान में अपना सैन्य अभियान जारी रखेगा। ऐसे में कई विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी संभावित समझौते की सफलता काफी हद तक लेबनान की मौजूदा स्थिति पर निर्भर करेगी। फिलहाल न तो वाशिंगटन और न ही तेहरान ने इन शर्तों की आधिकारिक पुष्टि की है, लेकिन मसौदे के सामने आने से पश्चिम एशिया की राजनीति में नई हलचल जरूर पैदा हो गई है।

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अमेरिका-ईरान डील के लीक दस्तावेज में क्या है? होर्मुज स्ट्रेट से लेकर अरबों डॉलर तक, अंदर की शर्तें आईं सामने

By Malay Ojha | Published: 12 June 2026 at 03:59 PM

अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी मेहर की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दोनों देशों के बीच तैयार किए जा रहे समझौते के मसौदे में 14 महत्वपूर्ण शर्तें शामिल हैं। इनमें युद्ध को स्थायी रूप से समाप्त करने, ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंध हटाने और अरबों डॉलर के फंसे हुए फंड को जारी करने जैसे अहम प्रस्ताव रखे गए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार मसौदे का पहला और सबसे महत्वपूर्ण बिंदु सभी मोर्चों पर चल रहे संघर्ष को तुरंत और स्थायी रूप से समाप्त करना है। इसमें पश्चिम एशिया के विभिन्न क्षेत्रों में जारी तनाव के साथ-साथ लेबनान में चल रहा सैन्य टकराव भी शामिल किया गया है। अगर यह प्रस्ताव स्वीकार होता है तो क्षेत्र में लंबे समय से जारी अस्थिरता को कम करने की दिशा में बड़ा कदम माना जाएगा।

होर्मुज जलमार्ग खोलने का प्रस्ताव
मसौदे में यह भी कहा गया है कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज जलमार्ग को 30 दिनों के भीतर दोबारा खोला जाएगा। हालांकि इसके संचालन और निगरानी की जिम्मेदारी ईरान के पास ही रहने का प्रस्ताव रखा गया है। इस मार्ग से दुनिया के बड़े हिस्से में ऊर्जा आपूर्ति होती है, इसलिए इसका खुलना वैश्विक बाजारों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अमेरिका से सैन्य मौजूदगी घटाने की मांग
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान ने अमेरिका से उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने और उसकी संप्रभुता का सम्मान करने की मांग की है। इसके अलावा अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी को 30 दिनों के भीतर समाप्त करने और ईरान के आसपास तैनात सैन्य ताकत को कम करने की शर्त भी रखी गई है।

तेल प्रतिबंध हटाने की मांग
समझौते के मसौदे में ईरानी तेल पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने या अस्थायी रूप से निलंबित करने की बात कही गई है। माना जा रहा है कि यदि ऐसा होता है तो ईरान की अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिल सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी तेल आपूर्ति दोबारा बढ़ सकती है।

300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण पैकेज की मांग
रिपोर्ट के अनुसार ईरान ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों से पुनर्निर्माण के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की आर्थिक योजना तैयार करने का प्रस्ताव रखा है। यह राशि युद्ध और प्रतिबंधों से प्रभावित क्षेत्रों के विकास और आर्थिक गतिविधियों को दोबारा पटरी पर लाने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है।

परमाणु कार्यक्रम पर 60 दिन की बातचीत
मसौदे में यह भी प्रस्तावित किया गया है कि दोनों देश 60 दिनों तक बातचीत जारी रखेंगे। इस दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक प्रतिबंधों से जुड़े मुद्दों पर अंतिम सहमति बनाने की कोशिश होगी। ईरान ने एक बार फिर यह भरोसा दिलाने की बात कही है कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा।

अमेरिका पर नए प्रतिबंध नहीं लगाने का दबाव
बदले में अमेरिका से यह अपेक्षा की गई है कि बातचीत की अवधि के दौरान वह क्षेत्र में अपनी सैन्य ताकत नहीं बढ़ाएगा और ईरान पर कोई नया प्रतिबंध लागू नहीं करेगा। इसे वार्ता को सफल बनाने के लिए भरोसे के उपाय के रूप में देखा जा रहा है।

24 अरब डॉलर का फंड जारी करने की मांग
समझौते के मसौदे में ईरान के लगभग 24 अरब डॉलर के फ्रीज फंड को जारी करने का प्रस्ताव भी शामिल है। साथ ही समझौते के पालन की निगरानी के लिए एक विशेष तंत्र बनाने की बात कही गई है। अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के जरिए अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने की भी योजना बताई गई है।

अंतिम बातचीत से पहले रखी गई शर्तें
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अंतिम दौर की वार्ता तब तक शुरू नहीं होगी, जब तक ईरान के कम से कम आधे फंड जारी नहीं किए जाते, तेल प्रतिबंधों को निलंबित नहीं किया जाता और नौसैनिक नाकाबंदी नहीं हटाई जाती।

मिसाइल कार्यक्रम पर नहीं होगी चर्चा
मसौदे की सबसे अहम बात यह बताई जा रही है कि ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय सशस्त्र संगठनों को दिए जाने वाले समर्थन के मुद्दे को बातचीत के दायरे से बाहर रखा गया है। यह विषय लंबे समय से अमेरिका और उसके सहयोगियों की प्रमुख चिंताओं में शामिल रहा है।

लेबनान की स्थिति पर टिकी है नजर
दूसरी ओर इजराइल पहले ही संकेत दे चुका है कि वह दक्षिणी लेबनान में अपना सैन्य अभियान जारी रखेगा। ऐसे में कई विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी संभावित समझौते की सफलता काफी हद तक लेबनान की मौजूदा स्थिति पर निर्भर करेगी। फिलहाल न तो वाशिंगटन और न ही तेहरान ने इन शर्तों की आधिकारिक पुष्टि की है, लेकिन मसौदे के सामने आने से पश्चिम एशिया की राजनीति में नई हलचल जरूर पैदा हो गई है।

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