By Malay Ojha | Published: 12 June 2026 at 02:26 PM
राज्यसभा चुनाव से पहले कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपना नामांकन रद्द किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। सर्वोच्च अदालत ने साफ कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद इस तरह के मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप संभव नहीं है और राहत पाने का रास्ता केवल चुनाव याचिका के माध्यम से ही खुलता है।
शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि नामांकन रद्द किए जाने से जुड़े मामले में वर्तमान चरण पर दखल नहीं दिया जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं है और चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के बाद रिट याचिका के जरिए राहत नहीं मांगी जा सकती।
नामांकन रद्द करने के फैसले को सही माना
सर्वोच्च अदालत ने रिटर्निंग अधिकारी द्वारा लिए गए निर्णय को भी उचित माना। अदालत ने कहा कि चुनाव संबंधी विवादों के समाधान के लिए कानून में अलग व्यवस्था है और चुनाव प्रक्रिया के दौरान न्यायालय हस्तक्षेप करने से बचता है। ऐसे मामलों में उम्मीदवार चुनाव याचिका दायर कर अपनी आपत्ति दर्ज करा सकता है।
फॉर्म-26 को लेकर अदालत की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने उम्मीदवारों द्वारा दाखिल किए जाने वाले फॉर्म-26 का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि नियमों के अनुसार उम्मीदवार को अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों से जुड़ी आवश्यक जानकारी हलफनामे के जरिए देनी होती है। यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि केवल उन्हीं मामलों का खुलासा किया जाए जिनमें आरोप तय हो चुके हों या आरोप पत्र दाखिल हो चुका हो।
पुराने फैसले का दिया हवाला
अदालत ने अपने फैसले में एक पुराने संवैधानिक सिद्धांत का भी जिक्र किया, जिसके अनुसार चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद न्यायालय सीधे हस्तक्षेप नहीं करता। न्यायाधीशों ने कहा कि यह सिद्धांत लंबे समय से स्थापित है और चुनावी प्रक्रिया की निरंतरता बनाए रखने के लिए इसका पालन जरूरी है।
कांग्रेस नेता ने जताई नाराजगी
फैसले के बाद मीनाक्षी नटराजन ने चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि उन्हें न्याय नहीं मिला है, लेकिन वे निराश नहीं हैं। उनका कहना था कि आगे की रणनीति पार्टी नेतृत्व के साथ चर्चा के बाद तय की जाएगी और वे जनता के बीच जाकर अपनी बात रखेंगी।
सिंघवी ने फैसले पर उठाए सवाल
मीनाक्षी नटराजन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि रिटर्निंग अधिकारी का आदेश असामान्य और मनमाना प्रतीत होता है। उनके अनुसार जिन मामलों में आरोप तय ही नहीं हुए हों, उन्हें उम्मीदवार के खिलाफ गंभीर आधार नहीं माना जाना चाहिए।
चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल
सिंघवी ने दलील दी कि यदि किसी उम्मीदवार के खिलाफ कोई लंबित आपराधिक मामला नहीं है और आरोप भी निर्धारित नहीं हुए हैं, तो उस जानकारी को अनिवार्य रूप से बताने का प्रश्न नहीं उठता। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग के समक्ष विस्तार से पक्ष रखने के बावजूद आयोग ने कोई प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किया।
परिणाम घोषित होने से पहले मांगी थी राहत
सुनवाई के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि नामांकन रद्द होने के बाद तत्काल चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाया गया था। इसके बाद अदालत का रुख किया गया क्योंकि परिणाम घोषित होने की आशंका थी। उनके अनुसार यदि उम्मीदवार को शुरुआत में ही चुनावी मुकाबले से बाहर कर दिया जाए और बाद में वर्षों तक कानूनी लड़ाई चलती रहे तो न्याय का उद्देश्य प्रभावित होता है।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद फिलहाल मीनाक्षी नटराजन के लिए तत्काल राहत की संभावना खत्म हो गई है। अब उनके पास चुनाव याचिका के माध्यम से कानूनी चुनौती देने का विकल्प बचा है। वहीं इस फैसले को राज्यसभा चुनाव से जुड़ी एक महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है, जो चुनावी प्रक्रिया में न्यायालय के सीमित हस्तक्षेप के सिद्धांत को फिर से मजबूत करती है।

