By Malay Ojha | Published: 15 June 2026 at 06:16 PM
देश में युवाओं के बीच आत्महत्या के बढ़ते मामलों ने चिंता बढ़ा दी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2024 में 14,488 युवाओं ने आत्महत्या की, जो पिछले साल की तुलना में 4.3 प्रतिशत अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया पर खुश दिखाई देने वाला हर व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ हो, यह जरूरी नहीं है। कई लोग अपनी तकलीफों को छिपाकर जीते रहते हैं और समय पर मदद न मिलने पर खतरनाक कदम उठा लेते हैं।
दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. ओमप्रकाश के अनुसार युवाओं में मानसिक तनाव लगातार बढ़ रहा है। करियर का दबाव, नौकरी की चिंता, भविष्य को लेकर असुरक्षा और हर क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा युवाओं को मानसिक रूप से प्रभावित कर रही है।
उम्मीदें बढ़ीं, सहनशक्ति घटी
विशेषज्ञों का कहना है कि आज का युवा कम उम्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल करना चाहता है। कई बार वह अपनी क्षमता से अधिक उम्मीदें पाल लेता है। जब परिणाम मनमुताबिक नहीं मिलते तो निराशा बढ़ने लगती है। यही निराशा धीरे-धीरे अवसाद का रूप ले सकती है।
सोशल मीडिया पर मुस्कान, असल जिंदगी में अकेलापन
डॉ. ओमप्रकाश बताते हैं कि आज हजारों लोगों से ऑनलाइन जुड़े रहने के बावजूद कई युवा भावनात्मक रूप से अकेले हैं। सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले कई लोग अपनी वास्तविक परेशानियां किसी मित्र या परिवार के सदस्य से साझा नहीं करते। ऐसे में तनाव और दुख भीतर ही भीतर बढ़ता रहता है।
हर दुखी दिखने वाला व्यक्ति ही अवसाद में नहीं होता
विशेषज्ञों के मुताबिक आत्महत्या की सोच रखने वाला व्यक्ति हमेशा उदास या परेशान नजर आए, यह जरूरी नहीं है। कई लोग सामान्य व्यवहार करते हुए भी भीतर से गंभीर मानसिक संघर्ष झेल रहे होते हैं। इसलिए केवल बाहरी व्यवहार देखकर किसी की मानसिक स्थिति का अनुमान लगाना मुश्किल होता है।
अवसाद कैसे बढ़ता है?
गाजियाबाद जिला अस्पताल के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. ए.के. विश्वकर्मा बताते हैं कि दिमाग में रासायनिक असंतुलन की वजह से अवसाद विकसित हो सकता है। शुरुआत में व्यक्ति का मन काम में नहीं लगता, वह चिड़चिड़ा हो जाता है और लोगों से दूरी बनाने लगता है। यदि समय रहते इलाज या सलाह न मिले तो स्थिति गंभीर हो सकती है।
आखिरी चरण में खतरनाक हो सकती है स्थिति
विशेषज्ञों के अनुसार गंभीर अवसाद व्यक्ति की सोचने और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है। उसे अपना जीवन निरर्थक लगने लगता है और वह खुद को नुकसान पहुंचाने के बारे में सोच सकता है। हालांकि यह स्थिति अचानक नहीं बनती, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले मानसिक संघर्ष का परिणाम होती है।
ये संकेत दिखें तो सतर्क हो जाएं
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक कुछ संकेत ऐसे हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए—
- हमेशा अकेलापन महसूस करना
- नींद का कम या ज्यादा होना
- भूख में अचानक बदलाव आना
- नकारात्मक विचारों का लगातार आना
- खुद के प्रति सम्मान और लगाव कम होना
- हर समय थकान या सुस्ती महसूस करना
- जीवन खत्म करने जैसी बातें करना या ऐसे विचार आना
परिवार और दोस्तों की भूमिका सबसे अहम
डॉक्टरों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति में ऐसे लक्षण दिखाई दें तो उसकी बात ध्यान से सुनना बेहद जरूरी है। उसे जज करने या डांटने के बजाय भावनात्मक सहयोग देना चाहिए। जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से तुरंत सलाह लेनी चाहिए। समय पर पहचान और उपचार कई जिंदगियां बचा सकता है।
मदद मांगना कमजोरी नहीं है
विशेषज्ञों का कहना है कि मानसिक परेशानी होने पर मदद लेना उतना ही जरूरी है जितना किसी शारीरिक बीमारी में डॉक्टर के पास जाना। यदि किसी व्यक्ति को लगातार निराशा, अकेलापन या आत्महत्या जैसे विचार आ रहे हों तो उसे तुरंत पेशेवर सहायता लेनी चाहिए।
जरूरत पड़ने पर यहां संपर्क करें
- सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय हेल्पलाइन : 1800-599-0019
- इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज : 9868396824, 9868396841, 011-22574820
- नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस : 080-26995000

