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रानी पद्मावती के जौहर विवाद पर धनंजय बोले— ‘सिर्फ बाहुबल से किसी सजग स्त्री को नहीं जीता जा सकता’

By aryavartalive | Published: 03 September 2026 at 01:34 PM

पटना। रानी पद्मावती के जौहर को लेकर जारी बहस के बीच सोशलिस्ट नेता और अमन समिति के संस्थापक धनंजय कुमार सिन्हा ने इस पूरे प्रसंग को केवल सही या गलत के पैमाने पर देखने के बजाय तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों और मान्यताओं के संदर्भ में समझने की जरूरत बताई है। सोशल मीडिया पर लिखी अपनी विस्तृत टिप्पणी में उन्होंने इतिहास से जुड़े ऐसे प्रसंगों को वर्तमान समय की सोच से परखने को लेकर भी सवाल उठाए।

सीता और लक्ष्मीबाई के उदाहरण से रखी अपनी बात
धनंजय सिन्हा ने सवाल उठाया कि क्या सीता को कठिन परिस्थितियों से बचने के लिए स्वर्ण लंका में रहने का विकल्प चुन लेना चाहिए था? इसी तरह उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण देते हुए पूछा कि क्या उन्हें अंग्रेजों से संघर्ष करने के बजाय आत्मसमर्पण कर देना चाहिए था। उनके मुताबिक, अलग-अलग दौर में लोगों के सामने मौजूद परिस्थितियां और उनके निर्णयों के पीछे की सोच को समझे बिना किसी ऐतिहासिक प्रसंग का आकलन अधूरा रह सकता है।

तर्क के साथ विवेक जरूरी बताया
उन्होंने कहा कि किसी विषय पर तर्क देना भर किसी व्यक्ति की बात को सही साबित नहीं करता। उनके अनुसार, इतिहास या समाज से जुड़े विवादों को समझने के लिए तर्क के साथ विवेक और संदर्भ की समझ भी जरूरी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी घटना का मूल्यांकन करते समय उस दौर की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

बलात्कार को लेकर भी स्पष्ट की अपनी राय
धनंजय सिन्हा ने अपनी टिप्पणी में बलात्कार जैसे गंभीर अपराध का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी घटना के बाद किसी महिला का जीवन समाप्त नहीं हो जाता। उन्होंने जीवन को शारीरिक संबंधों से कहीं व्यापक बताते हुए कहा कि वे बलात्कार से बचने के लिए मृत्यु को स्वीकार करने की सोच का समर्थन नहीं करते।

जौहर को आज के दौर में नहीं माना अनुकरणीय
हालांकि, पद्मावती के जौहर के संदर्भ में उन्होंने तत्कालीन युद्ध परिस्थितियों और सामाजिक मान्यताओं को अलग नजरिए से देखने की बात कही। उनका कहना है कि उस समय मौजूद परिस्थितियों को समझे बिना जौहर के फैसले को केवल आज के सामाजिक मानकों के आधार पर खारिज कर देना उचित नहीं होगा। साथ ही उन्होंने साफ किया कि आज के समय में जौहर जैसी प्रथा को अनुकरणीय नहीं माना जा सकता।

“सिर्फ बाहुबल से सजग स्त्री को नहीं जीता जा सकता”
धनंजय सिन्हा ने पद्मावती के जौहर से जुड़े प्रसंग से एक प्रतीकात्मक संदेश निकालते हुए कहा कि “सिर्फ बाहुबल से किसी सजग स्त्री को नहीं जीता जा सकता।” उनके मुताबिक, आज इस विचार को जौहर की प्रथा के समर्थन के तौर पर नहीं, बल्कि महिला की इच्छा, स्वायत्तता और स्वतंत्र निर्णय के व्यापक संदर्भ में समझा जा सकता है।

पद्मावती से जुड़ी योद्धा की कथाओं का किया जिक्र
अपनी पोस्ट में उन्होंने पद्मावती से जुड़ी उन लोककथाओं और परंपराओं का भी उल्लेख किया, जिनमें उन्हें युद्ध और शस्त्र संचालन में दक्ष बताया जाता है। हालांकि, पद्मावती से जुड़े कई प्रसंग इतिहास, लोकपरंपरा और साहित्यिक आख्यानों के बीच विवाद का विषय रहे हैं। इसलिए इन कथाओं को प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य और साहित्यिक/लोक परंपरा के बीच अंतर करते हुए देखना जरूरी है।

हार के बाद आत्मसमर्पण या अंतिम संघर्ष का सवाल
धनंजय सिन्हा ने योद्धाओं के उदाहरण देते हुए कहा कि युद्ध में पराजय के बाद हर व्यक्ति की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं होती। कोई आत्मसमर्पण करता है तो कोई अंतिम क्षण तक संघर्ष करने का रास्ता चुनता है। उनके अनुसार, इसी अंतर को समझने के लिए किसी ऐतिहासिक घटना के पीछे मौजूद मानसिक और सामाजिक परिस्थितियों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

मेवाड़ संघर्ष को सिर्फ सैन्य लड़ाई तक सीमित नहीं माना
उनकी टिप्पणी के अनुसार, मेवाड़ और अलाउद्दीन खिलजी के बीच हुए संघर्ष को केवल सैन्य शक्ति और क्षेत्र विस्तार की लड़ाई के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ उस समय की सामाजिक व्यवस्था, सम्मान की अवधारणा और सामूहिक मनोविज्ञान जैसे पहलुओं को भी समझने की जरूरत है।

परंपरा और व्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की बात
धनंजय सिन्हा ने सामाजिक परंपराओं को लेकर भी संतुलित नजरिया अपनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि हर परंपरा को केवल पुराना होने के कारण खारिज करना आधुनिक सोच नहीं है। दूसरी ओर, किसी परंपरा का गलत इस्तेमाल या उसके नाम पर व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करना भी स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।

“वास्तविक स्वतंत्रता” को लेकर दिया संदेश
उन्होंने कहा कि समाज में नकारात्मक और पाखंडपूर्ण परंपराओं को खत्म किया जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ व्यक्ति की स्वतंत्रता और सकारात्मक सामाजिक मूल्यों के बीच संतुलन भी जरूरी है। उनके मुताबिक, इसी संतुलन को वास्तविक स्वतंत्रता के रूप में समझा जा सकता है। उन्होंने यह भी चेताया कि स्वतंत्रता के नाम पर दिया गया हर तर्क जरूरी नहीं कि सामाजिक रूप से उचित हो।

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रानी पद्मावती के जौहर विवाद पर धनंजय बोले— ‘सिर्फ बाहुबल से किसी सजग स्त्री को नहीं जीता जा सकता’

By aryavartalive | Published: 03 September 2026 at 01:34 PM

पटना। रानी पद्मावती के जौहर को लेकर जारी बहस के बीच सोशलिस्ट नेता और अमन समिति के संस्थापक धनंजय कुमार सिन्हा ने इस पूरे प्रसंग को केवल सही या गलत के पैमाने पर देखने के बजाय तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों और मान्यताओं के संदर्भ में समझने की जरूरत बताई है। सोशल मीडिया पर लिखी अपनी विस्तृत टिप्पणी में उन्होंने इतिहास से जुड़े ऐसे प्रसंगों को वर्तमान समय की सोच से परखने को लेकर भी सवाल उठाए।

सीता और लक्ष्मीबाई के उदाहरण से रखी अपनी बात
धनंजय सिन्हा ने सवाल उठाया कि क्या सीता को कठिन परिस्थितियों से बचने के लिए स्वर्ण लंका में रहने का विकल्प चुन लेना चाहिए था? इसी तरह उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण देते हुए पूछा कि क्या उन्हें अंग्रेजों से संघर्ष करने के बजाय आत्मसमर्पण कर देना चाहिए था। उनके मुताबिक, अलग-अलग दौर में लोगों के सामने मौजूद परिस्थितियां और उनके निर्णयों के पीछे की सोच को समझे बिना किसी ऐतिहासिक प्रसंग का आकलन अधूरा रह सकता है।

तर्क के साथ विवेक जरूरी बताया
उन्होंने कहा कि किसी विषय पर तर्क देना भर किसी व्यक्ति की बात को सही साबित नहीं करता। उनके अनुसार, इतिहास या समाज से जुड़े विवादों को समझने के लिए तर्क के साथ विवेक और संदर्भ की समझ भी जरूरी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी घटना का मूल्यांकन करते समय उस दौर की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

बलात्कार को लेकर भी स्पष्ट की अपनी राय
धनंजय सिन्हा ने अपनी टिप्पणी में बलात्कार जैसे गंभीर अपराध का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी घटना के बाद किसी महिला का जीवन समाप्त नहीं हो जाता। उन्होंने जीवन को शारीरिक संबंधों से कहीं व्यापक बताते हुए कहा कि वे बलात्कार से बचने के लिए मृत्यु को स्वीकार करने की सोच का समर्थन नहीं करते।

जौहर को आज के दौर में नहीं माना अनुकरणीय
हालांकि, पद्मावती के जौहर के संदर्भ में उन्होंने तत्कालीन युद्ध परिस्थितियों और सामाजिक मान्यताओं को अलग नजरिए से देखने की बात कही। उनका कहना है कि उस समय मौजूद परिस्थितियों को समझे बिना जौहर के फैसले को केवल आज के सामाजिक मानकों के आधार पर खारिज कर देना उचित नहीं होगा। साथ ही उन्होंने साफ किया कि आज के समय में जौहर जैसी प्रथा को अनुकरणीय नहीं माना जा सकता।

“सिर्फ बाहुबल से सजग स्त्री को नहीं जीता जा सकता”
धनंजय सिन्हा ने पद्मावती के जौहर से जुड़े प्रसंग से एक प्रतीकात्मक संदेश निकालते हुए कहा कि “सिर्फ बाहुबल से किसी सजग स्त्री को नहीं जीता जा सकता।” उनके मुताबिक, आज इस विचार को जौहर की प्रथा के समर्थन के तौर पर नहीं, बल्कि महिला की इच्छा, स्वायत्तता और स्वतंत्र निर्णय के व्यापक संदर्भ में समझा जा सकता है।

पद्मावती से जुड़ी योद्धा की कथाओं का किया जिक्र
अपनी पोस्ट में उन्होंने पद्मावती से जुड़ी उन लोककथाओं और परंपराओं का भी उल्लेख किया, जिनमें उन्हें युद्ध और शस्त्र संचालन में दक्ष बताया जाता है। हालांकि, पद्मावती से जुड़े कई प्रसंग इतिहास, लोकपरंपरा और साहित्यिक आख्यानों के बीच विवाद का विषय रहे हैं। इसलिए इन कथाओं को प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य और साहित्यिक/लोक परंपरा के बीच अंतर करते हुए देखना जरूरी है।

हार के बाद आत्मसमर्पण या अंतिम संघर्ष का सवाल
धनंजय सिन्हा ने योद्धाओं के उदाहरण देते हुए कहा कि युद्ध में पराजय के बाद हर व्यक्ति की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं होती। कोई आत्मसमर्पण करता है तो कोई अंतिम क्षण तक संघर्ष करने का रास्ता चुनता है। उनके अनुसार, इसी अंतर को समझने के लिए किसी ऐतिहासिक घटना के पीछे मौजूद मानसिक और सामाजिक परिस्थितियों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

मेवाड़ संघर्ष को सिर्फ सैन्य लड़ाई तक सीमित नहीं माना
उनकी टिप्पणी के अनुसार, मेवाड़ और अलाउद्दीन खिलजी के बीच हुए संघर्ष को केवल सैन्य शक्ति और क्षेत्र विस्तार की लड़ाई के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ उस समय की सामाजिक व्यवस्था, सम्मान की अवधारणा और सामूहिक मनोविज्ञान जैसे पहलुओं को भी समझने की जरूरत है।

परंपरा और व्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की बात
धनंजय सिन्हा ने सामाजिक परंपराओं को लेकर भी संतुलित नजरिया अपनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि हर परंपरा को केवल पुराना होने के कारण खारिज करना आधुनिक सोच नहीं है। दूसरी ओर, किसी परंपरा का गलत इस्तेमाल या उसके नाम पर व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करना भी स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।

“वास्तविक स्वतंत्रता” को लेकर दिया संदेश
उन्होंने कहा कि समाज में नकारात्मक और पाखंडपूर्ण परंपराओं को खत्म किया जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ व्यक्ति की स्वतंत्रता और सकारात्मक सामाजिक मूल्यों के बीच संतुलन भी जरूरी है। उनके मुताबिक, इसी संतुलन को वास्तविक स्वतंत्रता के रूप में समझा जा सकता है। उन्होंने यह भी चेताया कि स्वतंत्रता के नाम पर दिया गया हर तर्क जरूरी नहीं कि सामाजिक रूप से उचित हो।

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